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07 Apr 2009 06:03:50 PM IST
Last Updated : 30 Nov -0001 12:00:00 AM IST

...जब दीदी ने लगाया भगत सिंह के माथे पर तिलक

आठ अप्रैल को सेंट्रल असेंबली बम कांड पर विशेष: स्वाधीनता संग्राम में अनुपम योगदान देने वाली सुशीला दीदी को बहुत कम लोग ही जानते हैं लेकिन यह वही महिला थीं जिन्होंने आठ अप्रैल 1929 को भगत सिंह द्वारा सेंट्रल असेंबली में बम फेंके जाने से पहले उनके माथे पर अपने खून का तिलक लगाया था। शहीद ए आजम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कई शोधपरक पुस्तकें लिख चुके प्रोफेसर चमन लाल के अनुसार चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एचएसआरए.ने पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में सेंट्रल असेंबली वर्तमान संसद भवन में बम फेंकने की घटना को बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया था। उन्होंने बताया कि ये दोनों बिल आठ अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में पारित किए जाने थे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अपनी योजना को अंजाम देने के लिए काफी पहले ही दिल्ली पहुंच गए। फरवरी और मार्च दो महीने तक वे नयी सड़क के सीताराम बाजार स्थित एक मकान में रहे। सात अप्रैल की रात सुखदेव भगवती चरण वोहरा दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी को लाहौर से लेकर दिल्ली पहुंचे ताकि वे अंतिम बार भगत सिंह से मिल सकें क्योंकि शहीद ए आजम ने यह पहले ही कह दिया था कि सेंट्रल असेंबली में धमाका करने के बाद वह आत्मसमर्पण कर देंगे। आठ अप्रैल की सुबह सभी साथियों ने दिल्ली के कुदसिया गार्डन पहुंचे भगत सिंह को उनके पसंदीदा रसगुल्ले और संतरे खिलाए। सुशीला दीदी ने वहां भगत सिंह के माथे पर अपने खून से तिलक लगाकर उनके सफल होने की कामना की। इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त सेंट्रल असेंबली पहुंच गए और दोपहर 12 बजे के करीब जैसे ही पब्लिक सेफ्टी व ट्रेड डिस्प्यूट बिल पेश किए गए भगत सिंह ने दर्शक दीर्घा से दो बम फेंक कर धमाके कर दिए। असेंबली भवन इंकलाब जिन्दाबार्दं और साम्राज्यवाद मुर्दाबार्दं के नारों से गूंज उठा। इसके बाद दोनों ने आत्मसमर्पण कर दिया। चमन लाल ने बताया कि दोनों बम भगत सिंह ने ही फेंके थे लेकिन एक बम फेंकने की जिम्मेदारी बटुकेश्वर दत्त ने अपने ऊपर इसलिए ले ली ताकि भगत सिंह को जेल में अकेले न रहना पड़े। क्रांतिकारियों ने असेंबली में जानबूझकर कम तीव्रता के बम फेंके जिससे किसी की जान न जाए और बहरे अंग्रेजों को अपनी आवाज भी सुना दी जाए। दोनों साथी घटना से एक दिन पहले भी सेंट्रल असेंबली गए थे और वहां का मुआयना करके आए थे। इस घटना की गूंज दुनियाभर में सुनाई दी और विश्व के लगभग सभी अखबारों में भगत सिंह के इस साहसी कारनामे के बारे में खबरें छपीं। इस मामले में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्रकैद की सजा सुनाई गई लेकिन इस दौरान अपनों की ही गद्दारी से सांडर्स हत्याकांड का राज भी खुल गया जिसमें राजगुरु सुखदेव और भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।

 
 

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