मुद्दा : विज्ञान एवं नवाचार नीति से अपेक्षा

Last Updated 22 Jan 2021 02:23:17 AM IST

इस में कोई दुविधा नहीं कि कोरोना के चलते साल 2021 पर विकास का बड़ा दबाव रहेगा। इसके लिए विज्ञान और अनुसंधान एवं विकास की राह सशक्त करनी होगी।


मुद्दा : विज्ञान एवं नवाचार नीति से अपेक्षा

इसी दिशा में राष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति (एसटीआईपी), 2020 का मसौदा देखा जा सकता है, जो 2013 की ऐसी ही नीति का स्थान लेगी। गौरतलब है कि यह मसौदा अनुसंधान और नवाचार क्षेत्र से संबंधित है, जिसके चलते लघु, मध्यम तथा दीर्घकालिक मिशन मोड परियोजनाओं में भी महत्त्वपूर्ण बदलाव संभव है।
देश के सामाजिक, आर्थिक विकास को प्रेरित करने के लिए शक्तियों और कमजोरियों की पहचान करना और उनका पता लगाना और साथ ही भारतीय एसटीआईपी पारिस्थितिकी तंत्र पर वैश्विक स्पर्धा में खड़ा करना आदि इसके उद्देश्यों में शामिल हैं। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने, विज्ञान और तकनीक व नवाचार को लेकर कोर्स पर जोर देने के साथ ही अकादमिक व पेशेवर संस्थाओं में लैंगिक एवं सामाजिक ऑडिट जैसे कई महत्त्वपूर्ण संदर्भ इस नीति में देखे जा सकते हैं। जाहिर है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने का यह मसौदा एक अवसर भी है। बीते वर्षो में भारत वैश्विक अनुसंधान एवं विकास हब के रूप में तेजी से उभर रहा है। देश में मल्टीनेशनल रिसर्च एंड डवलपमेंट केंद्रों की संख्या 2010 में 721 थी जो अब 1150 तक पहुंच गई है, और वैश्विक नवाचार के मामले में 57वें स्थान पर है।

एसटीआईपी की नई नीति के मसौदों के प्रमुख बिंदुओं में निर्णय करने वाली सभी इकाइयों में महिलाओं का कम-से-कम 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व व लैंगिक समानता से जुड़े संवाद में लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समुदाय को शामिल किए जाने का संदर्भ भी है। नीति में इस बात पर जोर है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के तंत्र में समानता और समावेश और बुनियादी तत्व होंगे। इसमें महिला वैज्ञानिकों पर जोर है। नीति के प्रारूप के मुताबिक सरकार का इरादा है कि दुनिया की बेहतरीन मानी जाने वाली 3-4 हजार विज्ञान पत्रिकाओं पर एकमुश्त सब्सक्रिप्शन ले ले और देशवासियों को मुफ्त उपलब्ध कराए जो ‘एक नेशन, एक सब्सक्रिप्शन’ तर्ज पर होगा। फिलहाल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की इस पहल से विज्ञान सबके लिए संभव होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि विकास के पथ पर कोई देश तभी आगे बढ़ सकता है, जब उसकी भावी पीढ़ी के लिए सूचना, ज्ञान और शोध आधारित वातावरण बने। साथ ही, उच्च शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार और अनुसंधान के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों। इसका हालिया उदाहरण भारत में कोविड-19 की रोकथाम के दो टीके का निर्माण देखा जा सकता है। बावजूद इसके शोध और नवाचार की अनवरत यात्रा प्रत्येक स्थान पर नहीं हुई है, जिसे लेकर देश को नये सिरे से नवाचार और विज्ञान को सरपट दौड़ाना ही होगा। इसी दिशा में उक्त मसौदा देखा जा सकता है।
शोध को लेकर दो प्रश्न मानस पटल पर उभरते हैं।  प्रथम, क्या विश्व परिदृश्य में तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच शोध और नवाचार के विभिन्न संस्थान स्थिति के अनुसार बदल रहे हैं, दूसरा, क्या अर्थव्यवस्था, दक्षता और प्रतिस्पर्धा के प्रभाव में हाईटेक होने का लाभ शोध को मिल रहा है। वैसे विभिन्न विश्वविद्यालयों में शुरू में ज्ञान के सृजन का हस्तांतरण भूमंडलीय सीख और भूमंडलीय हिस्सेदारी के आधार पर हुआ था। 40-50 साल पहले की बात करें तो भारत में लगभग 50 प्रतिशत वैज्ञानिक अनुसंधान विश्वविद्यालयों में ही होते थे, लेकिन धीरे-धीरे धन की कमी होती चली गई। नतीजन, शोध भी पिछड़ गया।
पड़ताल बताती है कि अनुसंधान और विकास में भारत के सकल व्यय में वित्तीय वर्ष 2007-08 की तुलना में साल 2017-18 तक लगभग 3 गुना वृद्धि हुई। मगर अन्यों की तुलना में यह अधिक नहीं रहा। गौरतलब है कि ब्रिक्स देशों में भारत ने अपने जीडीपी का 0.7 फीसद ही अनुसंधान और विकास पर व्यय किया है जबकि अन्य देशों में ब्राजील ने 1.3 फीसद, रूस ने 1.1, चीन ने 2.1 और दक्षिण अफीका ने 0.8 फीसद खर्च किया। दक्षिण कोरिया व इजराइल इस मामले में 4 फीसद से अधिक खर्च कर रहे हैं और अमेरिका को 2.8 फीसद पर देखा जा सकता है। बावजूद इसके भारत को अगले दशक में विज्ञान के क्षेत्र में तीन महशक्तियों में शामिल कराना नई नीति का लक्ष्य है। साथ ही, यह स्थानीय अनुसंधान और विकास क्षमताओं को बढ़ावा देने तथा चुनिंदा क्षेत्रों मसलन घरेलू उपकरणों, रेलवे, स्वच्छ तकनीक, रक्षा आदि में बड़े स्तर पर होने वाले आयात को कम करके बुनियादी ढांचा स्थापित करेगा।

डॉ. सुशील कु. सिंह


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