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25 Dec 2019 07:21:50 AM IST
Last Updated : 25 Dec 2019 07:24:34 AM IST

कचरा प्रबंधन : अनदेखी से बिगड़ जाएगी बात

कचरा प्रबंधन : अनदेखी से बिगड़ जाएगी बात
कचरा प्रबंधन : अनदेखी से बिगड़ जाएगी बात

कचरे का ढेर आज एक विकट समस्या बन गई है। जनता के साथ-साथ सरकारों के लिए भी कचरों से होने वाले प्रदूषण और अन्य दुारियों को दूर करना बड़ी चुनौती बन गई है।

दिनों-दिन कचरे का प्रबंधन नहीं होने से यह जमीन, नदी, तलाब, कुंओं और झीलों को प्रदूषित करता जा रहा है। ठोस कचरा दरअसल मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न अवांछित या बेकार ठोस सामग्री है। एक आंकड़े के मुताबिक देश भर में प्रतिदिन लगभग 1.43 लाख टन नगरपालिका का ठोस कचरा उत्पन्न होता है, जिसे निपटाने की विशेष जरूरत है। अभी दिक्कत यह हो रही है कि जितना भी कचरा इकट्ठा हो रहा है, उसमें से महज 25-26 फीसद ही निस्तारित हो पा रहा है। बाकी बिना निस्तारण के या तो उसी जमीन में पड़ा रह जाता है या लैंडफिल साइट पर चला जाता है। कूड़े के ढेर बिना किसी शक-सुबहा के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। खासतौर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में काफी बढ़ोतरी होती है।
विश्व के बाकी मुल्कों की तुलना हमारे देश में ठोस कचरा को ठिकाने लगाने की नीति परवान नहीं चढ़ पा रही है। कई जतन के बावजूद अभी सरकार और इस पर काम करने वाली संस्थाओं के सामने ढेर सारी बाधाएं मुंह बाये खड़ी है। शहरों की बात करें तो यहां ठोस कचरा प्रबंधन को केंद्रीकृत तरीके से करने की कोशिश की जा रही थी, जहां कि सारा कचरा एक जगह एकत्रित कर उसका निस्तारण कर सकें। मगर इसमें सबसे बड़ी दिक्कत नागरिकों द्वारा कचरा का पृथक्करण (अलग-अलग) करना है।

अगर आमजन कचरे को पृथक्करण करने के कार्य को स्पष्ट तरीके से नहीं जानता और समझता है तो फिर सारी कवायद धरी-की-धरी रह जाएगी। यह समझ इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कचरों की भी कई श्रेणियां होती है। अगर कचरे में से प्रदूषणकारी तत्वों को छांटकर अलग करने का सलीका आमजन को हो जाए तो काफी हद तक समस्या का समाधान हो जाएगा। चूंकि हमारा देश विशाल है। इसमें 5 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े शहर हैं। सो, धीरे-धीरे बाकी शहरों में जागरूकता आएगी और चीजें बेहतर होनी की संभावना है। हालांकि कई मेट्रोपोलिटन में रेजीडेंट वेलफेयर सासाइटी और अन्य संस्थाएं स्थानीय स्तर पर अपने यहां ही कचरे के निस्तारण का काम कर रही हैं, उससे खाद बनाया है जो कि अच्छी बात है। बाकी कचरे को जो रिसाइकिल होने योग्य होता है, उसे वहां भेज दिया जाता है। तो कहने का मतलब है कि अगर लोकल लेवल पर कचरे के निस्तारण की विधि अमल में लाई जाए तो प्रदूषण की समस्या से निजात मिल सकता है। जहां तक बात सरकार की जिम्मेदारियों की है तो यह अकेले उनका काम नहीं है। सरकार के साथ-साथ जनता की भूमिका भी बेहद अहम है। जनता में जागरूरकता का भान जब तक नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं हो सकता है। हमारी नीति और वैश्विक संदर्भ में भी नीति साफ तौर पर यही कहती है कि पॉल्यूटर्स पे यानी प्रदूषण फैलाने वाले को ही संसाधन जुटाने होंगे। और संसाधन सिर्फ सरकार जुटाए, यह संभव नहीं है। लिहाजा जनता को आगे बढ़कर इस काम को अंजाम तक पहुंचाना होगा। कचरा प्रबंधन को ‘मिशन मोड’ में लेना होगा। अधिकांश अपशिष्टों में अत्यंत निष्क्रिय पदार्थ मौजूद होते हैं, जो संयंत्र में अपशिष्ट को पृथक करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
 हमारे गांवों व शहरों में जगह-जगह लगे कचरे के ढेर और उनमें पनपते रोग आज गंभीर खतरा बन चुके हैं। पशु-पक्षियों की मृत्यु भी आज कचरा खाने के साथ ही कचरे में उत्पन्न विषैली गैसों और कीटाणुओं से हो रही है। ऐसे में आज कचरे का प्रबंधन उचित तकनीक के माध्यम से होना समय की मांग है। विश्लेषकों के अनुसार भारत में लगभग 32 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है और इसका 60 फीसद से भी कम इकट्ठा किया जाता है और केवल 15 फीसद ही संसाधित होता है। भारत में अपशिष्ट प्रबंधन की बढ़ती समस्याओं के कारण ग्रीनहाउस गैस का बढ़ता प्रभाव तथा लैंडफिल के साथ भारत ऐसे मामलों में तीसरे स्थान पर है। अपशिष्ट दिन-प्रतिदिन गम्भीर समस्या बनते जा रहे हैं, जैसे-अपशिष्टों का समुद्र में प्रवाह तथा कचरे को नदियों या खुले क्षेत्रों में फेंकना आदि। यदि अपशिष्ट प्रबंधन वैज्ञानिक विधि से किया जाए तो प्रदूषण का स्तर कम हो सकता है। साथ ही सरकार को आमजन को यह समझाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे कि कचरे का पृथक्करण करना हर किसी के लिए उपयोगी है। जनता को यह समझाना होगा कि कचरे के पड़े होने का नुकसान कितना भयावह है। इसलिए जनता को इसे हाथ में लेना होगा।


डॉ. सुनील पांडे
 

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