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11 Dec 2019 12:09:10 AM IST
Last Updated : 11 Dec 2019 12:10:45 AM IST

कैब : माना दो कौमी नजरिया!

अरविन्द मोहन
कैब : माना दो कौमी नजरिया!
कैब : माना दो कौमी नजरिया!

नागरिकता संशोधन बिल पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि यह बिल पेश करने की जरूरत इसलिए पड़ी कि कांग्रेस ने धर्म के आधार पर विभाजन स्वीकार कर लिया था।

अगर कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया होता तो इस बिल की जरूरत नहीं पड़ती। यह विभाजन और उसमें कांग्रेस की भूमिका की बिल्कुल नई व्याख्या है क्योंकि अभी तक धार्मिंक आधार पर विभाजन का दोषी जिन्ना और मुस्लिम लीग को ही माना जाता है।
आजादी के काफी बाद आई मौलाना आजाद की किताब से सरदार पटेल और नेहरू के ऊपर भी छींटे आए तो इसे उनकी कुंठा या नेहरू-सरदार से पिछड़ने का गुस्सा भर माना गया। उसका काफी खंडन-मंडन चला और अभी तक चल रहा है। पर आजादी की लड़ाई में कोई भी खास क्या आम भूमिका भी न निभाने वाले आरएसएस-जनसंघ वाली धारा की तरफ आए अमित शाह की यह बात भाजपा की राजनीति और इस बिल पर जीत-हार से बढ़कर मुद्दे उठाती है। और हैरानी नहीं कि अनेक लोग इसे अपनी पाकिस्तान यात्रा में पूर्व गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा जिन्ना को सेकुलर कहने जैसी बड़ी बात मानते हैं। अब इस पर खुद को आजादी के आन्दोलन का एकमात्र उत्तराधिकारी बताने वाली कांग्रेस, देश में पहली बार ‘दो कौम सिद्धांत’ देने वाले सावरकर के उत्तराधिकारी और संघ तथा भाजपा के लोग इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं, यह देखने की चीज होगी। और अभी तक सेकुलर राजनीति में काफी गुड़ खाकर इस विधेयक रूपी गुलगुले से परहेज करने वाले रामविलास पासवान, नवीन पटनायक और नीतीश कुमार जैसों को छोड़ भी दें तो खुद कांग्रेस की प्रतिक्रिया काफी कमजोर है।

अगर शाह कुछ कहते हैं तो यह उस धारा के प्रतिनिधि का बयान है, जिसका आजादी की लड़ाई में खास योगदान नहीं था और जिसके तब के काम दो कौमी नजरिए को मानते हुए ‘हिन्दू हित’ में उत्पात मचाकर जिन्ना के तर्क को भी बल देना माना जाता था। तब गांधी को ही हिन्दुओं का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता था, जो सर्वधर्म समभाव को मानते हुए हिन्दुस्तान को धर्मनिरपेक्ष रखने की वकालत करते थे। कांग्रेस भी यही मानती थी जो आजादी की लड़ाई चला रही थी। अब उनकी प्रतिक्रिया चाहे जो हो जिन्ना की आत्मा अगर कहीं होगी तो बहुत खुश होगी (निश्चित रूप से खुद को सेकुलर कहे जाने से भी ज्यादा) कि आजादी के 72 साल बाद सही हिन्दुस्तान की संसद ने भी हिन्दू-मुसलमान भेद को कानूनी रूप में मान लिया और हिन्दुस्तान में गैर-मुसलमानों को खास दरजा दे दिया। और गैर मुसलमान की संघ परिवार की व्याख्या क्या है और वह किस तरह मुसलमान विरोधी राजनीति को सूट करती है यह बताने की जरूरत नहीं है। और अमित शाह इतिहास बदलने के लिए नहीं अपनी घोर हिन्दूवादी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए ही यह कानून लेकर आए हैं। बाकी सभी मजबूरी में समर्थन कर रहे हैं।
कम लोग जानते हैं कि ‘दो कौम सिद्धांत’ अल्लामा इकबाल ने दिया, मुस्लिम लीग ने स्वीकार किया और भारी हंगामे और मारकाट तथा करोड़ों लोगों के जीवन में उथल-पुथल मचाते हुए इसे अंगरेजों के सहयोग से मोहम्मद अली जिन्ना ने लागू करवा लिया, लेकिन तथ्य यही है कि इस सिद्धांत के जनक विनायक दामोदर सावरकर थे। सावरकर हिन्दू महासभा के नेता थे और भले आजादी की लड़ाई में हिन्दुवादी और इस्लामी धारा हाशिए पर ही रही पर हिन्दुवादी धारा के प्रमुख सावरकर ही थे, जो इस सिद्धांत के अमल होने, दंगों और विभाजन वाले दौर तक जेल से बाहर आ चुके थे। पर दो कौमी नजरिया और दंगे तथा विभाजन के लिए सावरकर और उनकी हिन्दुवादी मंडली (जिसमें तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक छोटा खिलाड़ी था) भर को जिम्मेवार बताना उनको ज्यादा ही ‘यश’ देना हो जाएगा। इसका मुख्य श्रेय तो जिन्ना को, लीग को और सत्ता के लिए बेचैन हो गए कांग्रेसियों को ही देना होगा, जिसके आगे गांधी और खुद को उनका अनुयायी बताने वाले कांग्रेसी भी (जिनमें तब के कांग्रेस अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी भी शामिल हैं) भी विभाजन मानने को विवश हुए और अकेले खान अब्दुल गफ्फर खान ने ही विभाजन के खिलाफ मत दिया। जिन्ना-लियाकत के खिलाफ तो ग्रंथ ही ग्रंथ लिखे गए हैं, कांग्रेसियों में कौन कहां था, किसने बड़ा गुनाह किया-किसने छोटा, यह भी मौलाना आजाद की किताब ‘इंडिया विंस फ्रीडम’ आने के बाद चर्चा का विषय बना।
पर लीग कांग्रेस के अलावा भी दुअन्नी-चवन्नी हैसियत वाले विभाजनकारी या दो कौमी नजरिए को बढ़ाने वाले लोग हैं। इनमें ही संघ परिवार है, रजवाड़े थे, हमारे कम्युनिस्ट भाई थे, सिखों का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले कुछ थे। रजवाड़े आखिर तक दांव-पेच चलते रहे और आज तक कश्मीर के सवाल के उलझे रहने में उसके राजा की भूमिका की ढंग से चर्चा भी नहीं होती-अन्य दसियों रजवाड़े भी खेल करते रहे, जिसे सरदार पटेल ने बखूबी सम्भाला। कामरेड लोग भी दो कौमी नजरिया को सही मानते थे, अब चाहे उसे ऐतिहासिक भूल बताएं। और यह दिलचस्प ‘संयोग’ है कि जिन्ना-लियाकत-लीग की सक्रियता बढ़ना और कांग्रेस के अन्दर गांधी का अनादर-विरोध बढ़ना, संघ परिवार, कुछ दलित गुटों की सक्रियता, रजवाड़ों का षड्यंत्र जैसी सारी बातें नमक सत्याग्रह में गांधी के प्रयोग की सफलता के बाद ही शुरू हुई। इस सत्याग्रह में गांधी के लोगों को काफी कष्ट उठाना पड़ा, फौज-हवाई बमबारी तक झेलनी पड़ी पर यह साफ हो गया कि अब ब्रिटिश हुकूमत चलाना कठिन हो गया है। इसके दो नतीजे आए। गांधी इर्विन समझौता और ऐसे सारे समूहों की गतिविधियां बढ़ना जिसमें कांग्रेस के अन्दर के सत्ता के लोभी लोगों का व्यवहार बदलना भी शामिल है। और साफ लगता है कि इन सबको उन ब्रिटिश अधिकारियों और तंत्र से मदद और उकसावा मिला।
गांधी के अपने लोग उनसे दूर होने लगे और शासन ने गांधी-इर्विन समझौते को (जो कहीं-न-कहीं ब्रिटिश सत्ता द्वारा गांधी और कांग्रेस को मुल्क के लोगों का प्रतिनिधि कबूल कर लेना था) तो दरकिनार किया ही ऐसी हर ताकत को उकसाना शुरू किया जो गांधी, कांग्रेस और मुल्क को नुकसान पहुंचाती। आजादी के बाद कांग्रेसी हुकूमत ने तब दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए वरना इन सबके चेहरे सामने आ गए होते। अगर भारत सरकार और संसद मजहब के आधार पर नागरिकता देने में भेदभाव करने वाला बिल पास करे तो यह उसी दो कौमी नजरिए का एक राष्ट्रीय स्वीकार्य है। जाहिर है जिन्ना के साथ विभाजनकारी ब्रिटिश हुकूमत के लोगों की आत्मा बहुत खुश होंगी।


 
 

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