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21 Feb 2015 12:37:09 AM IST
Last Updated : 21 Feb 2015 12:39:24 AM IST

मातृभाषा हमारा मानव अधिकार

गिरीश्वर मिश्र
लेखक
मातृभाषा हमारा मानव अधिकार

भाषा की सत्ता उसके प्रयोग से बनती है और उससे आदमी इस कदर जुड़ जाता है कि वह उसके अस्तित्व की निशानी बन जाती है.

इसी की याद दिलाने के लिए यूनेस्को ने इक्कीस फरवरी को ‘मातृभाषा दिवस’ घोषित किया है. इसकी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जिसे जान लेना जरूरी है. आज का ‘पाकिस्तान’ बनने के पहले ही यह बहस छिड़ गई थी कि वहां की राष्ट्रभाषा क्या होगी? उस बहस की परवाह किए बगैर पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने 1948 में उर्दू को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया. पूर्वी पाकिस्तान में इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई. वहां बांग्ला को राजभाषा बनाने की मांग को लेकर आंदोलन छिड़ गया. ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘राष्ट्रभाषा संग्राम परिषद’ का गठन कर 11 मार्च 1949 को ‘बांग्ला राष्ट्रभाषा दिवस’ मनाने का ऐलान कर दिया. उस ऐलान के साथ ही विरोध में सड़क पर उतरे आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ और आंसू गैस के गोले छोड़े गए. इससे भाषा आंदोलन दबने के बजाय और तेज हुआ और तीन वर्ष बीतते-बीतते छात्रों का वह संघर्ष वृहद राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया. 21 फरवरी 1952 को ढाका में कानून सभा की बैठक होनी थी. उस सभा में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को ज्ञापन देने का फैसला भाषा आंदोलनकारियों ने किया.

उन्होंने जैसे ही ढाका विश्वविद्यालय से निकलकर राजपथ पर आना शुरू किया, पुलिस ने फायरिंग कर दी जिसमें कई लोग मारे गए. इस घटना के बाद पूर्वी पाकिस्तान के लोग हर वर्ष 21 फरवरी को ‘भाषा शहीद दिवस’ के रूप में मनाने लगे. यह दिन जीवन संग्राम की प्रेरणा का प्रतीक बन गया. भाषा से संस्कृति, संस्कृति से स्वायत्तता और स्वायत्तता से स्वाधीनता की मांग उठी. इस तरह पूर्वी पाकिस्तान के भाषा आंदोलन ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का रूप लिया और एक नए देश का जन्म हुआ. बांग्लादेश के भाषा शहीद दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कुछ वर्ष पहले ‘मातृभाषा दिवस’ की मान्यता दी.

मातृभाषा से आदमी की एक खास पहचान बन जाती है. ‘अंग्रेज’, ‘जर्मन’, ‘चीनी’, या फिर ‘बंगाली’, ‘मैथिल’ और ‘पंजाबी’ जैसे शब्द जितना भाषा के साथ जुड़े हैं, उतनी ही शिद्दत से समुदाय-विशेष का भी बोध कराते हैं. भाषा को आदमी गढ़ता जरूर है, पर यह भी उतना ही सही है कि भाषा आदमी को रचती है और उसमें तमाम विशेषताओं, क्षमताओं, मूल्य दृष्टियों को भी स्थापित करती है. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि जीवन के सारे व्यापार- अपना दुख-दर्द, हास-परिहास, लाभ-हानि, यश-अपयश- सब कुछ हम भाषा के जरिए खुद महसूस करते हैं और दूसरों को भी उसका अहसास दिलाते हैं. भाषा के साथ यह रिश्ता इतना गहरा और अटूट हो जाता है कि वह जीवन का ही पर्याय बन जाता है. स्वाभाविक परिस्थितियों में जन्म के साथ हर बच्चे को एक खास तरह की ध्वनियों और उनसे बनी भाषा का वातावरण पहले से तैयार मिलता है.

उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भाषा के उपयोग का उपकरण भी बच्चे के शरीर के अन्य अंगों की तुलना में ज्यादा तैयार और सक्रिय रहता है. एक तरह से भाषा के लिए तत्परता या ‘रेडीनेस’ से लैस होकर ही इस दुनिया में बच्चे का पदार्पण होता है. उसकी पहली भाषा मातृभाषा होती है. सोते-जागते बच्चे को हर समय मातृभाषा की गूंज सुनाई पड़ती है. उस भाषा का सीखना सहज ढंग से और एक तरह अनायास होता है. वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि आठ महीने की आयु में ही बच्चा बहुतेरे ध्वनि रूपों को ग्रहण करने में सक्षम हो जाता है. बारह महीने का होते-होते पहला शब्द बोलता है पर उस समय भी लगभग पचास शब्दों को समझता है. अठारह महीने में वह 50-60 शब्द बोलने लगता है पर उसके दुगुने-तिगुने शब्दों को समझता है. इस तरह लिखने-पढ़ने, यहां तक कि बोलने की क्षमता आने के पहले ही बच्चा उस भाषा के अनेकानेक शब्दों के अर्थ समझने लगता है. यह सब स्वाभाविक रूप से होता है.

मातृभाषा में सीखना सरल होता है क्योंकि बच्चा उस भाषा के साथ सांस लेता है और जीता है. वह उसकी अपनी भाषा होती है और उस भाषा को व्यवहार में लाना उसका मानव अधिकार है. परंतु भारत में राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी कारणों से भाषा और मातृभाषा का सवाल उलझता ही चला गया. आज की कटु हकीकत यही है कि भाषाई साम्राज्यवाद के कारण अंग्रेजी प्रभु भाषा के रूप में स्थापित है और आज के प्रतिस्पर्धी और वैीकरण के जमाने में हम उसी का रुतबा स्वीकार बैठे हैं. हम भूल जाते हैं कि भाषा सीखने का बना-बनाया आधार मातृभाषा होती है और उसके माध्यम से विचारों, संप्रत्ययों (कांसेप्ट) आदि को सीखना आसान होता है. ऐसा न कर हम शिशुओं का समय विषय को छोड़ कर एक अन्य (विदेशी!) भाषा को सीखने में लगा देते हैं और उसके माध्यम से विषय को सीखना केवल अनुवाद की मानसिकता को ही बल देता है. साथ ही हर भाषा किसी न किसी संस्कृति और मूल्य व्यवस्था की वाहिका होती है. हम अंग्रेजी को अपना कर अपने आचरण और मूल्य व्यवस्था को भी बदलते हैं और इसी क्रम में अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भी विस्मृत करते जा रहे हैं.

आज अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की पौ बारह है क्योंकि उससे जुड़ कर उच्च वर्ग में शामिल हो पाने की संभावना दिखती है. दूसरी ओर हिंदी समेत सभी भारतीय मातृभाषाओं की स्थिति कमजोर होती जा रही है. सम्मान न मिलने के कारण उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है. यहां तक कि उनका उपयोग करने पर कई विद्यालयों में बच्चों को दंडित भी किया जाता है. इस स्थिति में न मूल भाषा की प्रवीणता आ पाती है, न ही अंग्रेजी के प्रयोग की क्षमता. बच्चे ही नहीं इस परंपरा में दीक्षित प्रौढ़ लोग भी सोच-विचार और मौलिक चिंतन से कहीं ज्यादा अनुवाद के काम में ही लगे रहते हैं. सृजनात्मकता की दृष्टि से हमारा मानस अधकचरा ही बना रहता  है. इस तरह की भाषिक अपरिपक्वता का खमियाजा जिंदगी भर भुगतना पड़ता है और पीढ़ी की पीढ़ी इससे प्रभावित होती है.

इस प्रसंग में यह जान लेना जरूरी है कि अंग्रेजी का हौवा केवल भ्रम पर टिका है. अनेक देशों में वैज्ञानिक अध्ययन यह स्थापित कर चुके हैं कि मातृभाषा में सीखना प्रभावी तरीके से सीखने का आधार होता है. आज ‘सबके लिए शिक्षा’ का लक्ष्य सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना  जा रहा है. इस लक्ष्य की प्राप्ति मातृभाषा के द्वारा ही संभव होगी. यूनेस्को द्वारा और अनेक देशों में हुए शोध से यह प्रमाणित है कि छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि, दूसरी भाषा की उपलब्धि, चिंतन की क्षमता, जानकारी को पचा कर समझ पाने की क्षमता, सृजनशक्ति और कल्पनाशीलता, इनसे उपजने वाला अपनी सामथ्र्य का बोध मातृभाषा के माध्यम से ही उपजता है. कुल मिलाकर मातृभाषा के माध्यम से सीखने का बौद्धिक विकास पर बहुआयामी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे में मातृभाषा को आरंभिक शिक्षा का माध्यम न बनाना एक गंभीर सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौती है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती.

(लेखक अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति हैं)


 
 

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