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04 Jul 2012 01:00:50 AM IST
Last Updated : 04 Jul 2012 01:00:50 AM IST

पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी

जयंतीलाल भंडारी
लेखक
पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी
पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी

 

यूरो संकट यूरोजोन के साथ-साथ भारत सहित पूरी दुनिया के लिए ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है.

संबंधित नए सव्रेक्षण बता रहे हैं कि यूरोजोन के संकट के चलते दुनिया की आर्थिक मुश्किलें बढ़ने की आशंकाएं बढ़ रही हैं. वैिक क्रेडिट रेटिंग ऐजेंसी मूडीज ने जून 2012 में यूरोजोन के कई बड़े-बड़े बैंकों की क्रेडिट रेटिंग घटाकर बैंकों की सेहत बिगड़ने की घंटी बजा दी है.

यद्यपि ग्रीस के जून माह के चुनाव परिणामों ने ग्रीस को यूरोजोन में बने रहने के पक्ष में वोट दिया है और यूरोजोन के सभी देशों को संदेश दिया है कि इस समय सभी की भलाई यूरोजोन में बने रहने में है, लेकिन ग्रीस, आयरलैंड, स्पेन, पुर्तगाल, इटली जैसे कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों के साथ जर्मनी और फ्रांस में भी आर्थिक सुधारों के तहत कठोर कदमों का विरोध हो रहा है. ऐसा विरोध यूरोजोन के आर्थिक संकट को बढ़ाता दिख रहा है. पूरी दुनिया चिंतित है कि कहीं यूरोजोन वैिक अर्थव्यवस्था को न ले डूबे. यही कारण है कि 20 जून, 2012 को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने यूरोजोन के बेलआउट के लिए 430 अरब डॉलर का फंड बनाया है. इसमें भारत का भी दस अरब डॉलर का योगदान है.

गौरतलब है कि यूरोपीय यूनियन दुनिया का सबसे शक्तिशाली आर्थिक संगठन है और इसके सदस्य देशों की संख्या 27 है लेकिन साझी मुद्रा यूरो अपनाने वाले देशों की संख्या 17 है. यूरो मुद्रा के चलन वाले इन देशों के क्षेत्र को यूरोजोन कहा जाता है.

1 जनवरी, 2002 से अस्तित्व में आई यूरो ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आयरलैंड, इटली, लक्जेमबर्ग, नीदरलैंड्स, पुर्तगाल, स्पेन, माल्टा, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, साइप्रस तथा एस्टोनिया की साझी मुद्रा है. दरअसल जब यूरो मुद्रा ने दुनिया की अर्थव्यवस्था में कदम रखा था, तो माना जा रहा था कि यूरो जोन अमेरिका की चमक घटा देगा और डॉलर को पीछे करते हुए यूरो दुनिया पर राज करेगी.

लेकिन 2008 में अमेरिका के लीमन ब्रदर्स से शुरू हुई वैिक मंदी के बाद यूरोजोन में भी गहरे वित्तीय संकट खड़े हो गए. खासतौर से ग्रीस, आयरलैंड, इटली, स्पेन और पुर्तगाल की हालत इतनी खराब होती गई कि ये देश यूरोपीय केन्द्रीय बैंक ईसीबी और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के सबसे बड़े कर्जदार होते गए.

आज यूरोजोन के कर्जग्रस्त देशों में बेरोजगारी बढ़ गई है तथा सामाजिक सुरक्षा घट गई है. ज्यादातर सार्वजनिक उद्योगों में छंटनी की गई है. इन देशों के ब्रांड्स बिक नहीं रहे हैं. लोग बुरी तरह डरे हुए और चिंतित हैं कि भविष्य में क्या होगा. यूरोजोन के कर्जग्रस्त देशों की अर्थव्यवस्थाओं को चरमराने से बचाने के लिए यूरोपीय केन्द्रीय बैंक (ईसीबी) और आईएमएफ ऋण देते समय आर्थिक सुधारों की कठोर शत्रे लागू कर रहे हैं. ऐसी कठोर नीतियों से यूरोजोन के कर्जग्रस्त देश कर्ज के कुचक्र और नई आर्थिक मुश्किलों में फंसते जा रहे हैं.

यूरोजोन की अर्थव्यवस्था क्योंकि अमेरिकी और ग्लोबल अर्थव्यवस्था से काफी गहरे जुड़ी है इसलिए यूरोजोन के संकट में फंसने से ग्लोबल अर्थव्यवस्था का माहौल बिगड़ रहा है. यहां यह भी गौरतलब है कि यूरोजोन के देश भारत के प्रमुख व्यापार साझीदार हैं. भारत के कुल कारोबार में यूरोपीय यूनियन की 20 फीसद हिस्सेदारी है और भारत की निर्यात आय में इसका सबसे बड़ा योगदान है. इस संकट से भारतीय निर्यात प्रभावित हो रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.

दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि यूरोप में हालात और खराब होते हैं या यूरोपीय यूनियन में किसी प्रकार का बिखराव आता है तो यह भारतीय निवेशकों के लिए अच्छी खबर नहीं होगी. भारत से जुड़े अनेक विदेशी निवेशक देश के लगातार खराब होते आर्थिक हालात देखते हुए पिछले कुछ समय में काफी पैसा देश के बाजारों से निकाल चुके हैं.

भारत में क्योंकि विदेशी फंडों का काफी निवेश है अत: इसके यूरोजोन संकट के कारण यहां ग्लोबल फंडों से जुड़े सभी प्रकार के जोखिम भी बने हुए हैं. यदि यूरोजोन में स्थितियां बिगड़ती हैं तो देश की आर्थिक वृद्धि तो प्रभावित होगी ही, साथ ही नगदी भुगतान संकट की समस्या भी उत्पन्न हो जाएगी.

भारत सरकार का चालू खाता घाटा लगातार बढ़ रहा है जिससे पूंजी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है. ऐसे में यदि पूंजी प्रवाह पर रोक लगती है या इसमें कुछ मुश्किल आती है तो धीरे-धीरे संभल रहे रुपये की कीमत में फिर  गिरावट आ सकती है. यूरोप में हालात खराब होते हैं तो यूरो के मुकाबले डॉलर में काफी मजबूती देखी जाएगी और डॉलर से जुड़े एसेट्स की वैल्यू काफी बढ़ जाएगी.

उल्लेखनीय है कि लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने के चलते देश की आर्थिक वृद्धि 2.6 प्रतिशत तक घट गई थी. यदि देश की अर्थव्यवस्था को यूरोजोन का फिर कोई झटका लगता है तो आर्थिक वृद्धि दर 4 प्रतिशत के स्तर पर आ सकती है. वर्ष 2012 के लिए देश की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमानित लक्ष्य 6.5 प्रतिशत तय किया गया है. 

यूरोजोन के संकट में भारत के लिए कई सबक भी छिपे हैं. भारत ने भी लंबे समय से लगातार सब्सिडी और सरकारी खर्च बढ़ाने की नीतियों का अनुसरण किया है. लेकिन इससे राजकोषीय घाटे और महंगाई में भारी इजाफा हुआ है. स्टैंर्डड एंड पुअर्स और मूडीज जैसी वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने भारत की साख घटा दी है.

ऐसे में हमें यूरोजोन से आगे बढ़ रहे खतरे के मद्देनजर समझना होगाकि देश में मंदी की आहट रोकना सरल नहीं है. 2012 में एक के बाद एक आर्थिक और औद्योगिक सव्रेक्षण अर्थव्यवस्था की मुश्किलों का आभास देते आ रहे हैं. दरअसल, वैिक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा भारत के लिए रेटिंग संबंधी जो चेतावनी दी गई है, उसका सीधा संबंध भारत के आर्थिक सुधारों के चिंताजनक परिदृश्य से है.

यह भी कहा जाता रहा है कि भारत में गठबंधन सरकार की राजनीतिक विवशताओं के कारण विकास के नीतिगत मोचरे पर आर्थिक फैसले लेने में भारत ने तत्परता नहीं दिखाई है. यही कारण है कि पिछले तीन सालों के दौरान सरकार में आर्थिक सुधारों के सवाल पर ठहराव देखने को मिला है.

इंश्योरेंस, पेंशन और दूसरे वित्तीय सुधारों पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ी. घरेलू बाजार में ब्याज की ऊंची दरों की वजह से औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई. भारत विदेशी निवेशकों द्वारा विशेष पसंदगी वाले देश की श्रेणी से दूर हो गया. अर्थ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि भारत में घरेलू मोच्रे पर राजकोषीय घाटे और महंगाई जैसी आर्थिक बुराइयों को नियंत्रित नहीं किया गया तो स्थिति और बिगड़ सकती है और देश में कर्ज संकट पैदा हो सकता है.

ऐसे चुनौतीपूर्ण आर्थिक परिवेश में प्रधानमंत्री द्वारा वित्तमंत्री का प्रभार संभाल लिए जाने के बाद यूरोजोन के आसन्न संकट के मद्देनजर नए खतरों से बचने हेतु कारगर आर्थिक एवं वित्तीय कदम जरूरी होंगे. यद्यपि 25 जून को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) द्वारा रुपए को संभालने और विदेशी निवेश को आकषिर्त करने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं लेकिन इनका तात्कालिक रूप से अर्थव्यवस्था को पर्याप्त लाभ नहीं मिला है. ऐसे में वित्तीय व आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाना होंगे. 

सब्सिडी नियंत्रित करनी होगी और विनिवेश प्रक्रिया में तेजी लानी होगी. वित्तीय सुधार की दिशा में आगे बढ़ते हुए पेंशन सुधार, कंपनी विधेयक, वित्त एवं अन्य क्षेत्रों में सुधार के लिए निर्णायक स्थिति में पहुंचना होगा तथा कर सुधार लागू करने होंगे. ब्याज दरों में कटौती कर कर्ज सस्ता करना होगा. क्या  सरकार अर्थव्यवस्था को यूरोजोन के आर्थिक खतरों से बचाने के लिए सुनियोजित रणनीति पर आगे बढ़ेगी ?


 

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