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03 Apr 2012 12:13:39 PM IST
Last Updated : 03 Apr 2012 12:20:25 PM IST

अटूट आस्था के प्रतीक है लातेहार का मां उग्रतारा मंदिर

मां उग्रतारा मंदिर
शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां उग्रतारा मंदिर

 

शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां उग्रतारा मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रतीक है. यहां मनोकामनाओं के फूल झड़ते हैं.

झारखण्ड के लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले नगर गांव स्थित मां उग्रतारा मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रतीक है. शक्तिपीठ के रूप में विख्यात यह मंदिर करीब पांच हजार साल पुराना बताया जाता है, जिसमें मां उग्रतारा विराजती हैं.

रांची से करीब 100 किलोमीटर दूर प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण एवं पहाड़ियों के बीच बसे नगर गांव में रहने वाले हिंदुओं, मुसलमानों सहित सभी जाति-धर्म के लोगों की आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई है. मां के मंदिर का संचालन आज भी शाही परिवार के लोग ही कर रहे हैं.

इस मंदिर में झारखण्ड ही नहीं, देश के विभिन्न राज्यों के सैकड़ों श्रद्धालु पूरे वर्ष पूजा-अर्चना के लिए आते हैं. इस मंदिर में रामनवमी व दुर्गा पूजा का त्योहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है.

यहां 16 दिन का होता है दशहरा पूजा


स्थानीय पत्रकार सुजीत कुमार गुप्ता बताते हैं कि इस मंदिर की सबसे दिलचस्प और रहस्यमय बात यह है कि यहां दशहरा पूजा का आयोजन 16 दिन तक होता है.

यहां प्रत्येक महीने की पूर्णिमा के दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. टुढ़ामु गांव के मिश्रा परिवार के वंशज अब भी इस मंदिर के पुजारी हैं जबकि इसकी देखरेख का जिम्मा चकला गांव स्थित शाही परिवार के सुपुर्द है. वैसे इसके लिए एक समिति भी बनाई गई है.

अवश्य पूर्ण होती है मनोकामनाएं

श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां सच्चे दिल से पूजा करने वालों की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं. मंदिर के पुजारी गोविंद वल्लभ मिश्र बताते हैं कि प्राचीन मंदिरों में से एक इस मंदिर के पुजारी गर्भगृह में खड़े होकर मां भगवती को भोग लगाते हैं.

प्रसाद के रूप में मां को नारियल व मिसरी चढ़ाई जाता है. मंदिर परिसर में ही श्रद्धालुओं द्वारा बकरे की बलि भी दी जाती है. यहां चावल, दाल और सब्जी का भोग लगाया जाता है. दिन में मां की दो बार आरती उतारी जाती है.

दी जाती है भैंसों की बलि

उन्होंने बताया कि मंदिर के पश्चिमी भाग में स्थित मंदारगिरि पर्वत पर मदार साहब का मजार है. किंवदंतियों के मुताबिक मदार साहब मां भगवती के बहुत बड़े भक्त थे. तीन वर्षों में एक बार इनकी पूजा की जाती है और काडा (भैंसा) की बलि दी जाती है और उसी भैंसें की खाल से मां के मंदिर के लिए नगाड़ा बनाया जाता है. इसी नगाड़े को बजाकर मंदिर में आरती की जाती है.

फूल झड़ते हैं मां के चरणों से

मंदिर के पुराने श्रद्धालुओं के मुताबिक माता की कृपा से यहां फूल गिरने की अनोखी परम्परा है. मंदिर के गर्भगृह के चबूतरे पर भक्त अपनी मनौती को लेकर फूल चढ़ाते हैं, अगर फूल तुरंत नीचे गिर जाए तो यह तय होता है कि आपने मन में जिस कार्य के पूर्ण होने की कामना को लेकर फूल चढ़ाया है, वह जल्द पूरा होने वाला है. अगर कार्य पूरा नहीं होने वाला हो, तो आपके घंटों इंतजार करने पर भी फूल नहीं गिरेगा. श्रद्धालु बताते हैं कि मां की कृपा से ही यहां ऐसा नजारा दिखाई देता है.

वर्तमान में मंदिर के उत्तरी भाग में एक विशाल विवाह मंडप है जहां प्रतिवर्ष हजारों लोगों का विवाह सम्पन्न होता है. मंदिर के दक्षिणी भाग के ऊपरी छोर पर एक धर्मशाला है जहां शादी-विवाह होते हैं. इसके अलावा श्रद्धालु भी इसी धर्मशाला में ठहरते हैं.

उल्लेखनीय है कि मां उग्रतारा मंदिर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए राज्य सरकार से वित्तीय सहायता की मांग स्थानीय लोगों द्वारा बराबर की जाती रही है.

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