सामयिक : बदलती भू-राजनीतिक स्थिति
यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि राजनीति तथा कूटनीति में कोई स्थायी मित्र एवं स्थायी शत्रु नहीं होता।
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जैसा कि आखिरकार, अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लागू करने की योजना का विवरण देते हुए नोटिस जारी किया जिससे अमेरिका को भारत के लगभग 48 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य के निर्यात पर प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से पड़ेगा। अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाना उसके दबाव, दमन एवं दादागिरी का ही अविवेकपूर्ण निर्णय कहा जा सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप की इस टेढ़ी चाल अथवा टैरिफ टेरर से अमेरिकी अर्थशास्त्री, रणनीतिकार एवं राजनेता तक हतप्रभ हैं। अमेरिका के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन के प्रति आकस्मिक प्रेम का उभार आखिरकार, वैश्विक व्यवस्था की भू-राजनीति की दिशा को किस ओर ले जाएगा?
भारत एवं चीन एशिया की दो सबसे प्रमुख शक्तियां हैं, जो वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा सामरिक संतुलन स्थापित करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। तियानजिन (चीन) में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का शिखर सम्मेलन इस संगठन के इतिहास का सबसे बड़ा शिखर सम्मेलन होगा। इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी सहभागिता कर रहे हैं। पीएम मोदी 31 अगस्त से 1 सितम्बर तक चीन में रहेंगे। एससीओ की शिखर बैठक के साथ ही अनेक द्विपक्षीय बैठकों में भी भाग लेंगे। इनमें ट्रंप के टैरिफ का तोड़ भी तय हो सकने की संभावना है। चीन भली-भांति जानता है कि अस्थिर सोच वाले डोनाल्ड ट्रंप की अगली चाल क्या होगी? अत: अमेरिकी आर्थिक व्यवस्था का मुकाबला करने के लिए चीन भी अपनी नई पैंतरेबाजी तैयार करने में चूकेगा नहीं।
अमेरिका को भी पता है कि भारत और चीन को एक साथ अपना व्यापारिक दुश्मन बनाना खतरे से खाली नहीं है। चीन-रूस मित्रता की बात जगजाहिर है ही, जिससे चीन पर नकेल लगाने की चाल में अमेरिका चूक नहीं करेगा। चीन-पाकिस्तान मित्रता को भी अमेरिका तोड़ने के लिए अपना आर्थिक हस्तक्षेप करने के कथकंडे अपना रहा है। चतुर चीन के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए अमेरिका फूंक-फूंक कर कदम उठा रहा है। अमेरिका का दोहरा चरित्र जगजाहिर हो चुका है। एक ओर चीन पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान के साथ भारत क्वाड का हिस्सा बन कर समुद्री सुरक्षा और चीन की विस्तारवादी नीति का संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरी ओर चीन के साथ आर्थिक व्यापार पर चुप्पी भी मार रखी है, जबकि चीन के विरुद्ध न केवल जोरदार गर्जना की थी, बल्कि दुनिया का सबसे दुष्ट देश भी कहा था।
चीन रूस से सबसे अधिक तेल खरीदता रहा है जो अमेरिकी विदेश नीति के खिलाफ नहीं नजर आया। इसका सरल सा जवाब है कि अब ट्रंप के पास इतनी हिम्मत नहीं है कि चीन पर भी भारत की भांति टैरिफ लगा सकें। इसी कारण डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी तरह-तरह के तमाम कुतर्क कर रहे हैं। रूस से तेल खरीद तो बहाना मात्र है, ट्रंप को भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम का झूठा श्रेय भारत द्वारा न देना, उनकी हां में हां न मिलाना, ट्रंप को रास नहीं आया।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस टैरिफ को अनुचित, अन्यायपूर्ण और असंगत करार देते हुए देश को स्वदेशी अपनाने और देशवासियों में आत्मनिर्भरता की भावना बढ़ाने में विशेष बल दिया है। सरकार ने 40 विदेशी बाजारों जैसे-जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप, यूके तथा मध्य पूर्व आदि की ओर निर्यात विविधीकरण की पहल कर दी है। आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के तहत घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है ताकि अपने आयात को सीमित करके निर्यात में वृद्धि की जा सके।
टैरिफ भारत के लिए आपदा भी है, और अवसर भी है, जहां आत्मनिर्भरता, डिजिटल व्यापार और वैश्विक समझौतों के माध्यम से उभरती शक्तियों में अग्रणी बना जा सकता है। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा है-राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दुनिया के साथ व्यवहार करने का तरीका पारंपरिक तरीके से बहुत अलग है। संपूर्ण विश्व इस स्थिति का सामना कर रहा है। हमने ऐसा कोई राष्ट्रपति नहीं देखा जिसने वर्तमान राष्ट्रपति की तरह सार्वजनिक रूप से विदेश नीति का संचालन किया हो। यह अपने आप में ऐसा बदलाव है जो भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका को पता होना चाहिए कि भारत अमेरिका को घुड़की देने मात्र के लिए अपने निर्णय पर नहीं अड़ा है, बल्कि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के प्रति दृढ़संकल्प भी है।
ट्रंप की टैरिफ नीति से आर्थिक- व्यापारिक स्थिति में ही बदलाव नहीं आएगा, बल्कि इसके प्रभाव से भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक एवं भू-सामरिक स्थितियां भी बदलेंगी। चूंकि अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति बढ़ता लगाव और वहां के आईएसआई प्रमुख रहे और नये नवेले फील्ड मास्टर आसिम मुनीर जैसे लोगों के साथ साठ-गांठ, चीन के साथ टैरिफ बढ़ाने के मामले में चुप्पी, यूक्रेन को युद्ध भुगतने की धमकी, रूस के साथ अलास्का समझौते जैसे अनेक सामुयिक मुद्दे, भू-राजनीतिक स्थितियां बदलने की राह दिखा रहे हैं। कहा जा सकता है कि भारत एवं चीन के साथ संबंध सुधरते हैं, या बेहतर हो जाते हैं, तो ‘ग्लोबल साउथ’ मजबूत होगा।
ट्रंप का टैरिफ टेरर विश्व को नई भू-राजनीति की ओर मोड़ रहा है। वस्तुस्थिति यह है कि टैरिफ लागू होने के बाद वैश्विक गठबंधनों में पुर्नसंतुलन शुरू हुआ है, और भारत व चीन जैसे परंपरागत प्रतिद्वंद्वी भी अमेरिकी नीतियों का विरोध करने के लिए साथ आ रहे हैं। चीन ने हाल के महीनों में भारत के साथ न केवल दोस्ती बढ़ाई है, बल्कि लिपुलेख दर्रे के माध्यम से दोबारा व्यापार शुरू करने में भी सक्रिय सहायता की। बदलते टैरिफ ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया है, जिसमें भारत, चीन और रूस जैसे पश्चिमी देशों के विकल्प बन रहे हैं। भारत और चीन की बढ़ती नजदीकी स्थायी या अस्थायी होगी, यह तो भविष्य में ज्ञात होगा, किंतु ट्रंप की टैरिफ नीति ने साबित कर दिया है कि आर्थिक निर्णयों का प्रभाव व्यापार तक ही नहीं होता, बल्कि वैश्विक गठबंधनों तक जाता है।
(लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
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