बाढ़ से तबाही : तबाही की वजह तलाशनी जरूरी
बारिश और बाढ़ के कारण भारत के कई राज्यों में भारी तबाही हुई है। एक तरफ नदियां उफान पर हैं, तो दूसरी तरफ पहाड़ टूट रहे हैं। महाराष्ट्र में पिछले कई दिनों से बारिश का कहर जारी है।
![]() |
मूसलाधार बारिश के बाद बाढ़ के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। देश के अनेक हिस्सों में बाढ़ के कारण कई लोगों की मौत हो चुकी है। राजस्थान में कई जगहों पर भारी बारिश के कारण स्थिति खराब हो गई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी कई जगहों पर गंगा का जलस्तर खतरे के निशान से पार पहुंचने के कारण हालात खराब हैं। हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश से भूस्खलन होने के कारण कई सड़कें बंद हैं। त्रिपुरा में भी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और नगालैंड में भी यही हाल हैं।
भारी बारिश की वजह से देश के कई हिस्सों में बाढ़ के हालात हैं। विकास परियोजनाओं के लिए जिस तरह जंगलों को नष्ट किया गया, उसने स्थिति को और भयावह बना दिया है। इसके कारण मानसून तो प्रभावित हुआ ही, भू-क्षरण एवं नदियों द्वारा कटाव किए जाने की प्रवृत्ति भी बढ़ी। बाढ़-सूखा जमाने से जीवन को परेशानी में डालते रहे हैं। बाढ़-सूखा प्राकृतिक आपदाएं भर नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की चेतावनियां भी हैं। सवाल है कि क्या हम पढ़-लिख लेने के बावजूद प्रकृति की चेतावनियों को समझ पाते हैं। विडम्बना ही है कि पहले से अधिक पढ़े-लिखे समाज में प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठा कर जीवन जीने की समझदारी अभी भी विकसित नहीं हो पाई है।
\बाढ़-सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं पहले भी आती थीं लेकिन उनका अपना अलग शास्त्र और तंत्र था। इस दौर में मौसम विभाग की भविष्यवाणियों के बावजूद हम बाढ़ का पूर्वानुमान नहीं लगा पाते। दरअसल, प्रकृति के साथ जिस तरह का व्यवहार हम कर रहे हैं, उसी तरह का व्यवहार प्रकृति भी हमारे साथ कर रही है। पिछले कुछ समय से भारत को जिस तरह सूखे-बाढ़ का सामना करना पड़ा है, वह आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन पर आधारित उस रिपोर्ट का ध्यान दिलाता है, जिसमें जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़-सूखे जैसी आपदाओं की चेतावनी दी गई थी।
आज ग्लोबल वार्मिग जैसा शब्द इतना प्रचलित हो गया है कि इस मुद्दे पर हम बनी-बनाई लीक पर ही चलना चाहते हैं। यही कारण है कि कभी हम आईपीसीसी की रिपोर्ट को संदेह की नजर से देखने लगते हैं, तो कभी ग्लोबल वार्मिग को अनावश्यक हौव्वा मानने लगते हैं। विडंबना ही है कि हम इस मुद्दे पर बार-बार सच से मुंह मोड़ना चाहते हैं। दरअसल, प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा जलवायु परिवर्तन के किस रूप में हमारे सामने होगा, यह नहीं कहा जा सकता। जलवायु परिवर्तन का एक ही जगह पर अलग-अलग असर हो सकता है। यही कारण है कि हम बार-बार बाढ़-सूखे का ऐसा पूर्वानुमान नहीं लगा पाते जिससे लोगों की जान-माल की समय रहते पर्याप्त सुरक्षा हो सके।
शहरों और कस्बों में होने वाले जल-भराव के लिए काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ वर्षो में कस्बों और शहरों में जो विकास और विस्तार हुआ है, उसमें पानी की समुचित निकासी की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। गंदे नालों की पर्याप्त सफाई न हाने से उनकी पानी बहा कर ले जाने की क्षमता लगातार कम हो रही है। यही कारण है कि अधिकतर कस्बों और शहरों में थोड़ी बारिश होने पर ही सड़कों पानी भर जाता है। गौरतलब है कि 1950 में हमारे यहां लगभग ढाई करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी थी जहां पर बाढ़ आती थी लेकिन अब लगभग सात करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिस पर बाढ़ आती है। हमारे देश में केवल चार महीनों के भीतर ही लगभग अस्सी फीसद पानी गिरता है। उसका वितरण इतना असमान है कि कुछ इलाके बाढ़ और बाकी इलाके सूखा झेलने को अभिशप्त हैं।
ऐसी भौगोलिक असमानताएं हमें बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं। पानी का सवाल जैविक आवश्यकता से भी जुड़ा है। हमें यह सोचना होगा कि बाढ़ के पानी का सदुपयोग कैसे किया जाए। बाढ़ के संबंध में विशेषज्ञ चेतावनी देते रहते हैं कि भविष्य में बाढ़ की प्रवृत्ति और प्रकृति लगातार बदलती रहेगी। इसलिए हमें एक तरफ अपने आपदा प्रबंधन तंत्र को सक्रिय बनाना होगा तो दूसरी तरफ अपने पारंपरिक जल स्रेतों पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा।
गौरतलब है कि देश में बाढ़ से होने वाले नुकसान का लगभग साठ फीसद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, असम और आंध्र प्रदेश में बाढ़ के माध्यम से होता है। बाढ़ केवल हमारे देश में ही कहर नहीं ढा रही है, बल्कि चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं। हालांकि हमारे देश में सूखे-बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए अनेक घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन मात्र घोषणाओं के सहारे ही पीड़ितों का दर्द कम नहीं होता है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन घोषणाओं का लाभ वास्तव में पीड़ितों तक भी पहुंचे।
(लेख में विचार निजी हैं)
| Tweet![]() |