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07 Dec 2021 12:12:22 AM IST
Last Updated : 07 Dec 2021 12:14:56 AM IST

दलित समाज : राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना होगा

दलित समाज : राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना होगा
दलित समाज : राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना होगा

बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वतंत्रता के समय एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण चेतावनी के माध्यम से देश को सावधान किया था।

उन्होंने कहा कि 26 जनवरी 1950 को हम संविधान को अपना रहे हैं जो राजनीति में एक व्यक्ति और एक वोट के नीति से समानता तो सुनिश्चित करेगा, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता का प्रचंड प्रकोप रहेगा। उसी प्रकार महात्मा गांधी ने भी अपने देहांत से पहले जो अंतिम चिट्ठी लिखी, उसमें भी उनका कहना था कि हम स्वतंत्र भले ही हो रहे हैं, लेकिन देश के सात लाख गांव में रहने वाले मेरे भाई और बहन आज भी सामाजिक और नैतिक रूप से पराधीन हैं।

आज जब हम बाबासाहेब को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण कर रहे हैं और देश आजादी का अमृत महोत्सव भी मना रहे हैं तो ये असमानता का प्रवचन भी मुंह बाये हमारे समाज के समक्ष खड़ा है। आजादी के बाद के सात दशक से अधिक की यात्रा में हमने अस्पृश्यता के खिलाफ काननू बनाया और आरक्षण के द्वारा समाज के वंचित समूहों को प्रतिनिधित्व देने का भी प्रयास किया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सामाजिक भेदभाव को हथियार बना कर राजनीतिक रोटी सेंकने का भी भरसक प्रयास किया गया।

आजादी के अमृत महोत्सव के माध्यम से हाशिये के समाज के बहुत सारे ऐसे महानायक और महनायिकाओं को स्मरण किया जा रहा है, जिनको इतिहास के पन्नों में निरंकुशता से भुला दिया गया। 1857 की संग्राम की बात होती है तो मंगल पांडे के साथ मातादीन भंगी की भी बात होनी आवश्यक है। समाज में ऐसे महापुरुषो के होने से आत्मसम्मान और स्व का भाव पैदा होता है। रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ उसी स्वर में रानी झलकारीबाई की भी बात होनी चाहिए।

स्वतंत्रता के बाद इतिहास लिखनेका काम जिनके जिम्मे था, उन्होंने बहुत बड़ा अन्याय किया है। दरअसल, बात यह है की कांग्रेस पाटी और वामपंथी बुद्धिजीवियों में एक अघोषित गठबंधन सा प्रतीत होता है। और तया कार्र हो सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम का पूरा श्रेय एक ही व्यक्ति और परिवार को दिया गया। आजादी के बाद के दशकों में भी यही ट्रेंड देखा गया। 1971 की लड़ाई के पचास वर्षो को संयुक्त रूप से भारत और बांग्लादेश के द्वारा अनेकों कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जा रहा है और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि 1971 का युद्ध एक युगांतकारी परिवर्तन का समय था।

सम्पूर्ण मानव जाति के इतिहास में वह एकमात्र ऐसा युद्ध रहा जिसके पणिामस्वरूप एक नवीन राष्ट्र का जन्म हुआ जिसका नाम बांग्लादेश हुआ। जब भी उस युद्ध को याद किया जाता है तो जाहिर तौर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम लिया जाता है जिसके कारण स्वाभाविक हैं, लेकिन तब के रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम का योगदान शायद ही वर्तमान पीढ़ी को ज्ञात होगा। गैरे बॉस तब ढाका के अमेरिकन एम्बेसी में काम करते थे और उन्होंने एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम ‘दी ब्लड टेलीग्राम’ है। इसमें उन्होंने एक रक्षा मंत्री के रूप में बाबू जगजीवन राम के उल्लेखनीय नेतृत्व का वर्णन करते हुए कहा है कि शायद ही विश्व में कोई ऐसा रक्षा मंत्री था जो कि सामरिक रूप से इतना परिपक्व निर्णय ले सकता था। हेनरी किसिंजर भी बाबू जगजीवन राम को एक अग्रणी प्रशासक की श्रेणी में रखते हैं।

स्वाभाविक ही ये प्रश्न खड़ा होता है कि क्यों उनके योगदान और तपस्या को इतिहासकारों ने भुला दिया? यह अब भी यह संदेह मन में रह जाता है कि उन बुद्धिजीवियों का काम सिर्फ एक परिवार का महिमामंडन था। इस विषय पर एक गहन विचार और चिंतन की आवश्यकता है। आजादी के अमृत महोत्सव के साथ-साथ राजा सुहेलदेव पासी के नाम पर बहराइच में एक स्मारक का निर्माण होना भी वंचित समूहों में एक आशा की लौ जगाने का काम करता है। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने अपना पूरा जीवन वंचित समाज के सम्मान और प्रतिनिधित्व पर समर्पित किया। आज की तारीख में स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में दलित समाज को शासन और प्रशासन में उचित भागीदारी मिली है। कैबिनेट के साथ-साथ अन्य निर्णायक स्थानों पर भी भागीदारी की बात हो रही है। बाबासाहेब आंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो दलितों को नेतत्ृव और राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना होगा। ये एक अनवरत चलने वाली यात्रा है।


गुरु प्रकाश पासवान
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पटना विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर
 

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