आयोजन : पुस्तकों के बारे में कुछ बातें

Last Updated 26 Sep 2021 12:12:52 AM IST

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बार फिर राष्ट्रीय पुस्तक मेला के आयोजन की तैयारी है।


आयोजन : पुस्तकों के बारे में कुछ बातें

लखनऊ में पिछले पुस्तक मेला और इसके बीच महज छह महीने का अंतर है और यह भी याद रखने की जरूरत है कि इसके बीच के दो-तीन महीने वे थे, जब कोरोना का भयावह रूप सामने आया था।
यहां पिछला पुस्तक मेला पांच से 14  मार्च को आयोजित हुआ था और अब इसे एक से 10 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। अक्टूबर का मेला अपने आयोजन के 18 वे वर्ष में है और इसमें बड़ी संख्या में प्रकाशकों और वितरकों के शामिल होने की बात कही जा रही है। कोरोना से लड़खड़ाए व्यापार को संभालने में हर कोई लगा है और प्रकाशन उद्योग को भी इस संकट से जूझना है, लेकिन पुस्तक मेला और उनकी सफलता बताती है कि पुस्तकों का बाजार वैसे कष्ट में नहीं है जैसे कष्ट का हम अनुमान लगाते हैं। पुस्तक, प्रकाशन और बिक्री को लेकर यह एक पक्ष है।
एक दूसरा पक्ष भी है जो पठनीयता के सवालों से जुड़ा है। सवा सौ करोड़ के अधिक आबादी के इस देश में हिंदी की साहित्यिक पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं की पठनीयता का हाल कैसा है, इसे लेकर भी कुछ बातें सामने आती रहती हैं। मसलन किसी साहित्यिक पुस्तक का संस्करण अमूमन एक हजार प्रतियों तक ही सिमटा रहता है और कविताओं के बारे में बताया जाता है कि चार-पांच सौ प्रतियों के संस्करण के प्रकाशन और विक्रय से ही कवि खुश हो लेते हैं। जिन साहित्यिक पत्रिकाओं की स्थिति काफी अच्छी है उनके संस्करण अधिकतम तीन-चार हजार तक का आंकड़ा ही छू पाते हैं, जिनमें बहुत सारी प्रतियां नि:शुल्क बंटती हैं। यह सब कुछ पुस्तक मेलों के निरंतर आयोजन और उनकी व्यावसायिक सफलता के समानान्तर है। आखिर इन मेलों के निरंतर आयोजन हो रहे हैं और प्रकाशक भी खूब जुटते हैं, वे किराया देकर स्टॉल लेते हैं, पुस्तकों को लाने-ले जाने में, अपने प्रतिनिधियों के ठहरने-मार्गव्यय में धनराशि खर्च करते हैं।

दूसरी ओर साहित्य के पुस्तकों के प्रकाशन की यह स्थिति कि हजार-पांच सौ प्रतियां छापना और बेचना ही प्रतिष्ठापरक बन जाता है तो आखिर यह विरोधाभास क्यों है? कोरोना के समय को छोड़ दें तो पिछले दशक में लखनऊ पुस्तक मेले के आयोजन के एक महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरा है। जिन तीन आयोजकों ने मिलकर यहां राष्ट्रीय पुस्तक मेला की शुरुआत की थी, बाद के वर्षो में उन्होंने न सिर्फ अपने अलग-अलग मेले शुरू कर दिए बल्कि नगर के ‘लखनऊ महोत्सव’ जैसे उत्सवों में भी छोटे रूप में इसके आयोजन करने लगे। इतना ही नहीं इन्हीं आयोजकों द्वारा आसपास के नगरों में भी पुस्तक मेलों की शुरुआत कर दी गई। तीनों ही पुस्तक मेलों में हर साल स्टॉलों की संख्या, भाग लेने वाले प्रकाशकों-वितरकों की संख्या, विक्रय के आंकड़े भी लगातार बढ़ते गए हैं। वैसे भी इस प्रकार के आयोजन व्यावसायिक लाभ के बिना नहीं होते हैं, लेकिन यह भी एक सचाई है कि हिंदी का प्रकाशन उद्योग हाल के वर्षो में बहुत बदलने लगा है। खासकर साहित्य के संदर्भ में देखें तो इसके निकष बदल गए हैं। जिस साहित्य को महत्त्व मिलना चाहिए वह हाशिए पर चला गया है और ऐसे साहित्य को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा जो साहित्य की श्रेष्ठता के निकष पर कमतर हैं। लोकप्रिय किस्म की रचनाएं, जिन्हें कुछ समय पहले तक साहित्य मानने से भी गुरेज था, प्रकाशकों के लिए न सिर्फ  अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है बल्कि उन्हें ही साहित्य बताकर परोसा जाने लगा है। प्रकाशन जगत में भी कुछ ऐसे लोग सक्रिय हो गए हैं, जो रचनाओं पर अपना निर्णय गुणवत्ता या साहित्य की श्रेष्ठता के आधार पर नहीं करते बल्कि इस आधार पर करते हैं कि इन रचनाओं का बाजार क्या है?
किसी अभियान की तरह ऐसी पुस्तकें लाई जाती हैं, सोशल मीडिया पर उनका प्रचार होता है, कुछ लोग उनके बारे में लिख भी देते हैं और उसे स्थापित करने की कोशिश की जाती है। आप इस प्रचार से प्रभावित होकर जब इन्हें खरीदते हैं और अगर अच्छा साहित्य पढ़ने का आपका अभ्यास है तो कुछ ही पृष्ठों बाद आप उसे छोड़ देते हैं, लेकिन प्रकाशक का काम तो हो चुका होता है। बहुत सारे वे लोग जो बाजार में किताबें खरीदवाने की ताकत रखते हैं, पुस्तकों के प्रकाशन में गहरा हस्तक्षेप कर रहे हैं। ऐसा कोई नौकरशाह भी हो सकता है या किसी व्यावसायिक घराने से जुड़ा व्यक्ति भी। एक अच्छा रचनाकार पहले तो किसी प्रकार प्रकाशक तक अपनी पहुंच बना पाता है, लेकिन फिर उसे यह कहकर और डरा दिया जाता है कि आपकी पुस्तकें बिकती नहीं हैं। यह सब कुछ पाठकों की रुचि बदलने का एक षड्यंत्र और अपराध भी है। ऐसा लगता है कि जैसे श्रेष्ठ साहित्य को बेदखल करने की किसी साजिश पर कार्य चल रहा है। जैसे सोशल मीडिया पर रोज-रोज नये-नये लेखक और कवि जन्म लेते हैं तथा इस भ्रम के साथ जीते रहते हैं कि वे भी साहित्यकार हैं। डर रहा हूं, लखनऊ में एक अक्टूबर से शुरू हो रहे पुस्तक मेले में ऐसी कई पुस्तकों से फिर सामना होने वाला है!

आलोक पराड़कर


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