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14 Nov 2017 03:29:27 AM IST
Last Updated : 14 Nov 2017 03:33:20 AM IST

आरक्षण : भिन्न प्रस्तावना के साथ

अनिल चमड़िया
आरक्षण : भिन्न प्रस्तावना के साथ
आरक्षण : भिन्न प्रस्तावना के साथ

केंद्र में 1991 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा बीपी मंडल आयोग की अनुशंसा के अनुसार सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के सदस्यों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण देने के फैसले ने भारतीय राजनीति की धुरी बदल गई.

इसके बाद से संसदीय राजनीति के लिए आरक्षण पर बातचीत के बिना आगे बढ़ने की गुंजाइश लगभग खत्म-सी हो गई. यदि आरक्षण के इस फैसले की यात्रा का विश्लेषण करें तो यह सामने आता है कि संसदीय पार्टियां आरक्षण के इर्द-गिर्द नये-नये आइडिया का ईजाद करने में सक्रिय रही हैं. इसी क्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी एक नया आइडिया सामने आया है कि आउटसोर्सिंग में आरक्षण की नीति को लागू किया जाएगा.

पहली बात तो नीतीश के इस आइडिया को निजी क्षेत्र में आरक्षण के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जो गलत है. मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने के फैसले के वक्त निजी क्षेत्र में आरक्षण की जो मांग की गई थी, उस संदर्भ में नीतीश कुमार का आउटसोर्सिंग में आरक्षण का प्रस्ताव बिल्कुल भिन्न है. ये निजी क्षेत्र में आरक्षण कतई नहीं है. आउटसोर्सिंग का मतलब है कि सरकार द्वारा कर्मचारियों की बहाली की प्रक्रियाओं व जिम्मेदारियों से मुक्त होने की व्यवस्था करना. सरकार के लिए मानव संसाधनों का चयन करने वाली निजी क्षेत्र की कंपनियों की प्रक्रिया में महज ये फर्क आएगा कि वह सरकार के लिए सरकार की आरक्षण की नीति को पालन करने की जिम्मेदारी को पूरा करेगी. नीतीश कुमार के इस प्रस्ताव का कतई अर्थ यह नहीं है कि निजी कंपनियां अपने ढांचे के लिए मानव संसाधन जुटाने की प्रक्रिया में आरक्षण की नीति को लागू करेगी.

भारतीय राजनीति में आरक्षण वास्तव में महात्मा गांधी के छुआछूत विरोधी आंदोलन का ही एक दूसरा रूप हैं. गांधी ने वर्ण व्यवस्था को स्वीकारते हुए अछूतों के साथ खाने-पीने, उन्हें कुएं से पानी लेने और मंदिर में जाने की वकालत की थी. जाहिर है कि वह जातिवाद और जाति आधारित व्यवस्था को खत्म करने का अभियान नहीं था. ठीक उसी तरह, नीतीश कुमार आर्थिक नीतियों को कोई खरोंच नहीं लगने की शर्त पर सामाजिक न्याय के सिद्धांत के पक्षधर के रूप में वंचित जातियों को संबोधित करते दिखना चाहते हैं. सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं. ऐसे में आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाता है.

केन्द्र सरकार की नौकरियों के लिए मंडल आयोग की अनुशंसाओं को जब लागू किया गया था तो उसी समय निजीकरण की नीति को भी लागू करने का फैसला किया गया था. उस वक्त मंडल आयोग की अनुशंसाओं से लाभावान्वित होने वाली जातियों को नई आर्थिक नीतियों के पक्ष में खड़ा करने के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण का शिगूफा चुनावी पार्टयिों ने फेंका था. यह संभव नहीं है कि आर्थिक ढांचे के निजीकरण की नीति और सामाजिक रूप से पिछड़े-दलितों के लिए आरक्षण की नीति एक साथ लागू हो जाए. इसीलिए निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग और उस पर आधारित राजनीति ने दूसरी करवट ली.

वह यह थी कि सरकारी नौकरियों में जिन जातियों के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण सीमित है, उन्हीं के बीच आरक्षण के नये-नये आइडिया खोजें जाएं. पचास प्रतिशत की सीमा को खत्म किया जाए, गरीब सवर्णो को आरक्षण देने, जिन जातियों को आरक्षण मिल रहा है, उन्हें अति पिछड़ा और महा दलित के रूप में विभाजित करना, आरक्षण पाने वाली जातियों की सूची में हेर-फेर करने , पिछड़ों को दलितों की सूची में डालने, पिछड़ों को अति पिछड़ों की सूची में डालने, आरक्षण का लाभ उठाने वाली पिछड़ी दलित जातियों में क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू करने आदि के रूप में संसदीय राजनीति अपनी गति बनाए हुए हैं जबकि तथ्य है कि निजीकरण की प्रक्रिया ने सरकारी नौकरियों की संख्या आधे से भी कम हो गई हैं. विश्व बैंक केंद्रित आर्थिक नीतियों ने स्थायी रोजगार की अवधारणा को ही खारिज कर दिया है.

ठेका प्रथा और आउटसोर्सिंग विश्व बैंक की आर्थिक नीतियों की ही परिकल्पना है. हालांकि नीतीश अपने इस आइडिया को सामाजिक न्याय की राजनीति की एक उपलब्धि के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण लागू करने से बचने के लिए सरकारी मशीनरी उसे आउटसोर्सिंग कर देती है.लिहाजा, सरकारी मशीनरी आरक्षण की नीति लागू करने से बच जाती है. नीतीश संकेत देते हैं कि सामाजिक स्तर पर वर्चस्व रखने वाला ढांचा किस तरह से वंचितों को सामाजिक न्याय से वंचित कर देता है. डा. अम्बेडकर ने संविधान को लागू करते वक्त  यह कहा था कि राजनीतिक समानता तो हमने हासिल कर ली, लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्तर पर गहरी खाई है.

इसकी व्याख्या इस रूप में की जाती है कि राजनीतिक सत्ता सभी सत्ताओं की कुंजी है. लेकिन राजनीतिक सत्ता तभी कुंजी है, जब उसी के समकक्ष और उसके अनूकूल ताकत सामाजिक-आर्थिक सत्ता में विकसित हो गई हो. आर्थिक- सामाजिक स्तर पर वर्चस्व की स्थिति कमजोर नहीं हुई है. अत: सामाजिक न्याय के तहत आरक्षण के सिद्धांत पर लगातार उंगुलियां उठती रही हैं.
आरक्षण वास्तव में सामाजिक न्याय का एकसूत्री कार्यक्रम नहीं है. यह सामाजिक न्याय के संपूर्ण कार्यक्रमों से जुड़ा हुआ है. इसको अलग-थलग कर देने की वजह से ही आरक्षण के लिए लड़ने की जमीन कमजोर होती चली गई है. यहां तक कि आरक्षण का लाभ उठाने वाले लोग व समूह भी आर्थिक-सामाजिक हैसियत हासिल कर लेने के बाद आरक्षण के विरोध में खड़े हो जाते हैं. इसीलिए आरक्षण को केवल गांधीवादी छुआछूत विरोधी आंदोलन से ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर पेश करने से परहेज बरतने की सलाह दी जाती रही है.

आउटसोर्सिंग में आरक्षण के प्रस्ताव से मुख्यमंत्री नीतीश ने मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरी करने का काम निजी कंपनियों को सौप दिया है और पार्टी के अध्यक्ष से अपेक्षा के अनुरूप इस प्रस्ताव के संदेश से वोटों का इंतजाम करने की कोशिश की है. कोटा किसी शर्त के साथ नौकरी देने की व्यवस्था का नाम नहीं है. संवैधानिक व्यवस्था में मिलने वाले संपूर्ण अधिकारों का निचोड़ है.


 
 

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