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मंगलवार, 22 मई, 2012 |
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08 Feb 2012 11:10:48 AM IST
Last Updated : 08 Feb 2012 11:10:48 AM IST

हर तरफ जातीय सियासत की गंध

 जातीय सियासत की गंध (फाइल फोटो)
जातीय सियासत की गंध (फाइल फोटो)

 

इलाहाबाद से लौटकर रेखा सिन्हा बुद्धिजीवियों के शहर इलाहाबाद में भी इन दिनों जातीय सियासत की गंध फैली हुई है.

शहरी पॉश इलाके ममफोर्डगंज, जार्ज टाऊन, एलनगंज से लेकर बारा विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले गाढ़ा कटरा गांव तक यानी पढ़े-लिखे वर्ग से लेकर निरक्षर तक सभी की जुबान पर जातीय गणित है.

यह जरूर है कि इस गणित का पक्ष लेने की दोनों वर्ग की अलग-अलग वजहें हैं लेकिन लक्ष्य यही है कि किसी तरह अपनी जाति के उम्मीदवार के सिर पर ही जीत का सेहरा बंधे.

लखनऊ से इलाहाबाद तक के लगभग दो सौ किलोमीटर के सफर में हम जिस बाजार व कस्बे में रुके और बात चुनाव की चली तो विकास और भ्रष्टाचार का मुद्दा हवा होता लगा.टूटी सड़कें, बिजली कटौती, उद्योगों की बदहाली आदि को छोड़कर आम लोग जातीय गणित सुलझाते मिले.

हमने सोचा कि बुद्धिजीवियों के शहर में तो कम से कम मुद्दों पर बात होगी लेकिन हमारा यह भ्रम फाफामऊ से ही टूटने लगा.एक इंजीनियरिंग कॉलेज में काम करने वाले सुनील कुमार से हमने पूछा कि कैसा चुनाव चल रहा है, उन्होंने तुरन्त हमें जातीय समीकरण समझाना शुरू कर दिया.

बकौल सुनील जिसको पटेल और मुस्लिम वोट मिल जाएंगे, उसका जीतना तय है.वैसे मौर्य बिरादरी भी निर्णायक है.यहां पहले भी बिरादरी के नाम पर वोट पड़ता रहा है, इसलिए इस बार भी पड़ेगा.हमने गड्ढों में तब्दील सड़कों की ओर इशारा किया तो वह बोल पड़े ये समस्या तो है ही.

फिर ठसक के साथ बोले कि अपनी जाति का एमएलए बना तो अपने इलाके की सड़कें ठीक हो ही जाएंगी.फाफामऊ में प्रवेश करते ही दाहिने तरफ लगे एक बैनर पर नजर गयी, जिस पर लिखा था ‘न बिजली न पानी न रोड, फिर क्यों मांगने आये वोट’, यहां के निवासी अमर मौर्य कहते हैं कि हमने चुनाव का बहिष्कार करने का मन बनाया है.

उनकी बात काटते वहीं के परचून दुकानदार राम प्रसाद कहते हैं कि अगर मतदान के पहले किसी नेता ने आस्त कर दिया कि क्षेत्र की समस्याएं दूर होंगी तो वोट देंगे.खरीदारी कर रहे शिवमूरत पटेल से हमने पूछा कि कौन सी पार्टी के पक्ष में हैं.

पहले तो उन्होंने टालमटोल की फिर दबी जबान बोले-स्वजातीय समाज की कल बैठक है, जो तय होगा वही किया जाएगा.तेलियरगंज में एक बुक स्टॉल चलाने वाले नितिन से चुनाव की चर्चा चली तो उन्होंने कहा कि इस बार आयोग की कड़ाई से ऊपर-ऊपर कुछ नहीं दिख रहा.

अंदर क्या चल रहा है, इसके जवाब में वह कहते हैं कि सबने तय कर ही लिया है कि किसे चुनना है.अपनी जाति के उम्मीदवार को जानते हैं, इसलिए उन पर भरोसा किया जा सकता है.

ममफोर्डगंज में एडवोकेट अनिल मिश्र से बात चली तो छूटते ही उन्होंने कहा कि जो ब्राह्मण स्वाभिमान की बात करेगा, हमारा वोट तो उसी को जाएगा.हमने टोका कि क्या जाति ही चुनाव हारने-जीतने का आधार है, उन्होंने कहा कि सब तरफ यही चल रहा है तो हम ही क्यों आदर्श स्थितियों की बात करें.

एक डिग्री कालेज में शिक्षक दिग्विजय प्रताप कहते हैं कि भ्रष्टाचार में सभी पार्टियों के नेता लिप्त हैं, कोई कम तो कोई ज्यादा, ऐसे में चुनाव में ये मुद्दा बनता नहीं लगता है.हमारे दिमाग में बचपन से जो जातीय भावनाएं डाली गयी हैं, वह कहीं न कहीं वोट देते समय हावी रहती हैं.

चुनाव में जाति के बोलबाले की बात चलने पर इंजीनियर रमेशचन्द्र कहते हैं कि यह सच स्वीकारने से परहेज नहीं करना चाहिए कि लोगों में जातीय एकता की भावना कूट- कूट कर भरी है.

आमतौर पर यह दबी रहती है लेकिन चुनावी दौर में जब अपनी जाति के स्वाभिमान और एकजुटता की बात आती है तो यह मुखर हो जाती है.इस बार भी ऐसा ही दिख रहा है, इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए.

आईएएस की तैयारी कर रहे हरिकेश कुमार, मान्या सिंह और अखिलेश त्रिपाठी गोविन्दपुर में मिले.इनसे बात कर यह लगा कि कम से कम युवा जातीय प्रभाव से मुक्त हैं.इन तीनों ने एक स्वर में कहा कि हम तो उसे चुनेंगे जो विकास और शिक्षा की बात करेगा.एडवोकेट राजीव तिवारी तंज करते हैं-

आज जनता से ज्यादा जागरूक नेता हैं ,तभी तो वे जातीय चाल चल कर मतदाताओं को अपने अनुसार इस्तेमाल करते हैं.वह फरमूद इलाहाबादी के एक शेर से अपनी बात समेटते हैं- ‘रहनुमा अपना जुगाड़ी है तो है, जाति मजहब का खिलाड़ी है तो है/ हर इलेक्शन में ठगी जाती है, देश की जनता अनाड़ी है तो है।’

जब हमने ग्रामीण इलाके की तरफ रुख किया तो लगा कि राजीव सच कह रहे थे.

बुनियादी जरूरतों से महरूम ग्रामीण जनता को सियासत ने जातीय खानों में बांट दिया है.कुर्मी वोट कुर्मी को ही जाएगा, कोल वोट कोल के अलावा किसी को जा ही नहीं सकता है, मुस्लिम तो एक साथ एक तरफ हो जाएंगे, दलितों का वोट बैंक कहां जुड़ेगा सब तय है, बस सवर्ण बंटे दिख रहे हैं, करछना, बारा, सोरांव और कोरांव विधानसभा क्षेत्र में हर तरफ यही सुनने को मिला.

एक पेट्रोल पम्प की व्यवस्था देखने वाले करछना के रामसागर गांव निवासी जनकप्रताप कहते हैं कि हर गांव में हर प्रत्याशी नहीं पहुंच सकता, इसलिए अपनी जाति बहुल गांव में प्रत्याशी जा रहे हैं, वहां कम मेहनत में ज्यादा वोट निकल सकते हैं.

हम भी कुर्मी प्रत्याशी को ही चुनेंगे, जो क्षेत्र का ही हो.इरादतगंज बाजार के दुकानदार दिनेश कुमार केसरवानी कहते हैं कि एक को छोड़ सब नये चेहरे हैं.किस पर भरोसा करें कि विकास करवायेगा, इसलिए जाति के आधार पर ही वोट बटेंगे.

गोहनियां चौराहे पर जीप के इंतजार में खड़े गिरजाशंकर त्रिपाठी कहते हैं कि सीट सुरक्षित होने से ब्राह्मण समाज में चुप्पी है.

अब सवर्ण तो खड़ा हो नहीं सकता और सवर्णो की आदत किसी के पीछे चलने की नहीं है, इसलिए पशोपेश में है.

क्या क्षेत्र का विकास मुद्दा नहीं है, इसके जवाब में सेन्हुड़ा के श्यामनन्दन कहते हैं कि इतनी सरकारें बनीं कोई विकास नहीं हुआ तो अब क्या उम्मीद करें.शंकरगढ़ के गांव गन्ने की रानी कोल कहती हैं कि जो काम दिलाता है, उसी के कहने पर वोट डलेगा.

काम कौन दिलाता है, इस सवाल के जवाब में वह अपने जाति के मजबूत आदमी की ओर इशारा करती है यानी आदिवासी भी अपनी जाति के उम्मीदवार पर ही भरोसा जताते हैं.

सोनबरसा के राजू कोल अनपढ़ हैं.उनका कहना है कि अपनी बिरादरी का नेता ही, हमारा दर्द समझ सकता है.इसलिए उसे ही चुनेंगे.

राजू कोल का समर्थन करते हुए रमता आदिवासी भी कहते हैं कि दूसरी जाति के नेता तो हमें दरेरेंगे (दबायेंगे) उन्हें क्यों चुनें.

इलाहाबाद शहर से लेकर सूदूर गांव तक के दौरे में हर तरफ जातीय गुणा-गणित की पहेलियां बुझाते लोग मिले, जिसने इस भ्रम को तोड़ा कि पढ़-लिख कर लोग विवेकशील- प्रगतिशील हो जाते हैं और अनपढ़ जाति के झमेले में फंसे रहते हैं.

 


 

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