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18 Jan 2010 10:21:55 AM IST
Last Updated : 30 Nov -0001 12:00:00 AM IST

देश को जीएम फसलों की जरूरत: आईएआरआई


इंदौर। देश में विवादास्पद बीटी बैंगन के प्रभावों को लेकर जारी गर्मागर्म बहस-मुबाहिसों के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) ने जीन संवर्धित (जीएम) फसलों को अपनाए जाने की जबर्दस्त वकालत की है। भारत में कृषि अनुसंधान के अग्रणी संस्थान का कहना है कि खाद्य सुरक्षा की स्थिति को बेहतर करने के लिये देश को जीएम फसलों की जरूरत है। लिहाजा उन लोगों की बातों को दरकिनार किया जाना चाहिये, जो निहित स्वार्थ या अज्ञानता के चलते जीएम फसलों पर भ्रंतियां फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। आईएआरआई ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी उस वक्त की, जब बीटी बैंगन के विरोध के बाद पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश देश में जीन संवर्धित फसल पर अलग-अलग समूहों से सार्वजनिक चर्चाएं कर रहे हैं। आईएआरआई के निदेशक डॉ. हरिशंकर गुप्त ने खास बातचीत में कहा, ’जीएम फसलों पर हमें भ्रंतियों का शिकार नहीं होना चाहिये, बल्कि वैज्ञानिक सच को स्वीकार करना चाहिये। डॉ. गुप्त ने तर्क दिया, ’आधुनिक तकनीक की बदौलत विज्ञान अब जाकर जीएम फसलें ईजाद कर पा रहा है, जबकि कुदरत यह काम पिछले हजारों बरसों से करती आ रही है। जो गेहूं-चावल हम आज खा रहे हैं, वे कुदरत के हजारों बरसों के जीन संवर्धन की ही उपज है।’ आईएआरआई निदेशक के मुताबिक जीएम फसलों में कुछ भी ’अप्राकृतिक’ नहीं है। फसलों की जीएम किस्में विकसित करके वैज्ञानिक एक कुदरती प्रक्रिया की गति को बढ़ा भर रहे हैं। देश में जीएम फसलों को लेकर खासकर पर्यावरणविदों का विरोध तेज होने के बीच डॉ. गुप्त ने कहा, ’कुछ लोग निहित स्वार्थ या अज्ञानता के चलते जीएम फसलों पर भ्रंतियां फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।’ जीएम फसलों से पर्यावरण और मानवीय स्वास्थ्य पर बुरे असर की आशंका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ’जोखिम कहां नहीं है। अगर आप हवाई जहाज में सफर करते हैं तो वहां भी जोखिम है। जरूरत बस पूरी सावधानी बरतने की है।’ उन्होंने कहा कि जीएम फसलों के विषय में जोखिम के आकलन और प्रबंधन तथा वैज्ञानिक प्रयोगों के बाद यदि सबकुछ ठीक पाया जाता है तो इस बात का कोई कारण नहीं रह जाता कि देश के लोग जीन संवर्धित फसलों का उपभोग न करें। आईएआरआई निदेशक कहते हैं, ’अगर जीन संवर्धित फसलों के उपभोग से अमेरिकी नागरिकों को कुछ नहीं होता है तो हमें क्यों होगा। वैसे भी इन फसलों की ज्यादा जरूरत हमें है, अमेरिका को नहीं।’ डॉ. गुप्त ने कहा कि पश्चिमी जगत के पास कृषि भूमि इफरात में है और खाने वाले कम हैं। भारत में कृषि भूमि घटती जा रही है, जबकि आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि यह जीएम बीजों का ही कमाल है कि देश में कपास की पैदावार में खासा इजाफा हुआ है। डॉ. गुप्त ने बताया कि आईएआरआई भी पर्यावरण मंत्रालय की देख-रेख में जीएम फसलों पर काम कर रहा है।


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