पूर्वाचल को विकास के नक्शे पर चमकाने की पहल करने वाले मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह इस सीट की रहनुमाई करते थे.
यह सीट लाइमलाइट में रही है, कभी चौंकाऊ परिणाम से तो कभी यहां की रहनुमाई करने वाले जनप्रतिनिधि की शासन में मजबूत पकड़ के दम पर.अबकी भूगोल बदल गया है लिहाजा बयार अपने पक्ष में करने के लिए प्रत्याशी मतदाताओं के दरबार में लगातार हाजिरी लगा रहे हैं
गोरखपुर मंडल के तहत आने वाली 28 विधानसभा सीटों में महराजगंज जिले की पनियरा विधानसभा सीट ऐतिहासिक परिणाम देने के लिए जानी जाती है.
लहरों के विपरीत परिणाम देने वाली यह सीट सीएम सीट के नाम से भी जानी जाती है.पूर्वाचल को विकास के नक्शे पर आगे लाने की सोच को धरातल पर लाने वाले मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह इस सीट की रहनुमाई करते थे.
अति प्रभावशाली पिता के सियासी उत्तराधिकारी के रूप में पहली बार चुनावी वैतरणी पार करने उतरे वीर बहादुर सिंह के पुत्र की नैया डूबने और फिर लहरों के विपरीत जाकर पार उतारने की इबारत भी इसी सीट पर लिखी गयी है.
चूंकि अबकी भूगोल बदल गया है सो इतिहास का नया सिलेबस कैसा होगा, इसके लिए प्रत्याशी मतदाताओं के दरबार में अपना चुनावी पाठ्यक्रम दिखा रहे हैं.
पनियरा विधानसभा लाइमलाइट में बना रहता है.कभी चौंकाऊ परिणाम से तो कभी यहां की रहनुमाई करने वाले जनप्रतिनिधि की शासन में मजबूत पकड़ के दम पर.पहले चर्चा चौंकाऊ परिणामों की.1975 की इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनावों में जब पूरे प्रदेश में जनता पार्टी ने कांग्रेस को जबरदस्त पटखनी दी थी तब यहां जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में कमला सहाय को तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा था.
यहां हार कांग्रेस से नहीं बल्कि निर्दल प्रत्याशी गुंजेर से मिली थी और दूसरे स्थान पर कांग्रेस के वीर बहादुर सिंह थे.वीर बहादुर यदि जीतते तो जीत का चौका लगाने का रिकार्ड बनाते.
1980 के चुनाव में कांग्रेस के वीर बहादुर सिंह चुनाव जीतने में सफल हुए जबकि पिछले चुनाव में 54 प्रतिशत मत पाकर जीतने वाले गुंजेर इस बार 23 फीसद मतों तक सिमट गए.1985 के चुनाव में भी इस सीट पर इतिहास लिखा गया.
कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में वीर बहादुर सिंह ने 42543 वोटों के भारी अंतर से सफलता हासिल कर इस सीट का और गोरखपुर-बस्ती मंडल में उस चुनाव का आधिकारिक रिकार्ड बनाया था.1989 के चुनाव में इस क्षेत्र में सियासी विरासत संभालने आए वीर बहादुर सिंह के पुत्र फतेह बहादुर सिंह को जोरदार झटका लगा.पार्टी और प्रत्याशी दोनों ही वीर बहादुर सिंह की कद्दावर छवि के चलते परिणाम को लेकर आस्त थे लेकिन परिणाम चौंकाने वाला आया.
फतेह बहादुर सिंह 20 फीसद से अधिक मतों के मार्जिन से निर्दल प्रत्याशी गनपत सिंह से चुनाव हार गए.1991 में राममंदिर का लहर था लेकिन इस लहर का जादू पनियरा में नहीं चला और कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में फतेह बहादुर सिंह जीतने में कामयाब हुए.
परिणाम के उठापठक का दौर अगले चुनाव में फिर नजर आ गया.फतेह बहादुर सिंह को दो साल बाद 1993 में हुए चुनाव में भाजपा के गनपत सिंह ने पराजित कर तीसरे स्थान पर धकेल दिया था.इसके बाद 1996, 2002 और 2007 के चुनाव में जीत हासिल कर फतेह बहादुर सिंह ने इस सीट पर अपने पिता द्वारा लगातार तीन चुनाव जीतने के रिकार्ड की बराबरी जरूर की.
हालांकि इन तीनों चुनावों में वह अलग-अलग दलों की नाव पर सवार रहे.हालांकि परिसीमन के बाद वह कैम्पियरगंज विधानसभा क्षेत्र में शिफ्ट हो गए.परिणाम से इतर पनियरा विधानसभा क्षेत्र से जीतने वाले विधायक ने शासन-सत्ता में भी प्राय: मजबूत पकड़ बनायी.
1967 में सृजित इस विधानसभा क्षेत्र से सर्वाधिक रहनुमाई वीर बहादुर सिंह व उनके पुत्र फतेह बहादुर सिंह ने की.वीर बहादुर इस सीट से पांच बार तथा उनके सुपुत्र फतेह बहादुर चार बार विधायक रहे.
स्व. वीर बहादुर 1970 से 1974 तक उपमंत्री, और 1980 से 1985 तक कैबिनेट मंत्री के रूप में प्रतिष्ठित हुए.24 सितम्बर 1985 को जब उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली तो पनियरा विधानसभा क्षेत्र का इतराना स्वाभाविक था.
मंत्री पद से हटाए जाने के पहले तक इस सीट के वर्तमान विधायक फतेह बहादुर सिंह की गिनती भी कद्दावर कैबिनेट मंत्रियों में होती रही.नए परिसीमन के बाद हो रहे चुनाव में इस क्षेत्र में पूर्व के श्यामदेरवा विधानसभा क्षेत्र का काफी हिस्सा आने की वजह से सपा विधायक जनार्दन ओझा, पूर्व भाजपा विधायक ज्ञानेंद्र सिंह यहां शिफ्ट हो चुके हैं.
बसपा ने सहजनवां के पूर्व विधायक देवनारायण उर्फ जीएम सिंह को यहां शिफ्ट किया है जबकि कांग्रेस की तलत अजीज को पनियरा में पहले से लड़ने का अनुभव है.
इनके अलावा पनियरा के चुनावी मैदान में पीस पार्टी से डीके सिंह, बहुजन संघर्ष पार्टी से अजय कुमार, इंजपा से अमरजीत, आरपीआई ए से अमरनाथ पांडेय, असपा से अवध नारायण, कौमी एकता दल से उस्मा नगनी, सोशित समाज दल से कैलाश, लोकमंच से गुड्डी, लोकदल से जवाहर साहू, टीएमसी से तबारक हुसैन, जक्रांपा से प्रदीप, लोजशपा से राजेश त्रिपाठी, जदयू से रामपाल, आराविपा से विरेंद्र कुमार सिंह, भाएपा से शत्रुघ्न सिंह निषाद, जनहित किसान पार्टी से श्यामसुंदर, व निर्दल तुफैल, सुधीर किस्मत आजमा रहे हैं.देखना है कि इस विस क्षेत्र में क्या चौंकाऊ गुल खिलता है।
1977 में जनता पार्टी के पक्ष में जबरदस्त लहर के बावजूद पनियरा में निर्दल प्रत्याशी ने कांग्रेस को दूसरे और जपा प्रत्याशी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया, इसके पहले लगातार तीन चुनाव जीतने वाले वीर बहादुर को मिली पटखनी 1985 में वीर बहादुर सिंह ने निकाला 42543 का बिगेस्ट मार्जिन, सीएम सीट बनी पनियरा अति प्रभावशाली पिता के पुत्र फतेह बहादुर सिंह को 1989 के पहले चुनाव में नहीं मिली सियासी विरासत, मंडल लहर में जद प्रत्याशी भी हारा 1996, 2002 व 2007 में लगातार जीत दर्ज कर फतेह बहादुर ने पिता के हैट्रिक बनाने के रिकार्ड की बराबरी की इन परिणामों ने खींचा ध्यान.