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19 Dec 2017 03:10:04 AM IST
Last Updated : 19 Dec 2017 03:19:03 AM IST

त्वरित टिप्पणी : जिताने के साथ चेताया भी गुजरात ने

डॉ विजय राय
समूह संपादक, राष्ट्रीय सहारा
त्वरित टिप्पणी : जिताने के साथ चेताया भी गुजरात ने
भाजपा को जिताने के साथ चेताया भी गुजरात ने

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की विजय निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ब्रांड मोदी का करिश्मा है.

दिल्ली और बिहार की बात जानें दें तो आम चुनाव के बाद एक लाइन से असम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और हिमाचल को केसरियामय करने तथा लगातार छठी बार गुजरात को अपने पास रखने का ऐतिहासिक श्रेय मोदी के खाते में दर्ज हो गया है. यहां आकर ‘मोदी ही भाजपा और भाजपा ही मोदी’ की स्थिति बन गई है-हालांकि इसके अपने खतरे भी हैं. जुझारू पार्टी संगठन, मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य में किये गए विकास कामों की गिनतियां और केंद्रीय योजनाएं; सब की सब धरी रह जातीं अगर भाजपा के पास एक मोदी न होते. खासकर उनके गढ़ में कांग्रेस जिस तरह ललकार रही थी, वह और बेहतर होमवर्क के साथ उससे गुजरात छीन ले सकती थी. पर जूझारू मोदी के धुंआधार प्रचार,15 दिनों में 34 रैलियां करने का उनका माद्दा, सही टाइमिंग की कलाबाजियां और इस तरह समूचे चुनाव-परिदृश्य को अपने पक्ष में करने की उनकी महारत ने कांग्रेस को बाजी पलटने से रोक दिया. हालांकि प्रधानमंत्री ने अपने बड़प्पन से इसका श्रेय अपने कद और कप्तानी को नहीं, ‘विकास’ को दिया है, लेकिन उनका कथन गुजरात के बजाय हिमाचल प्रदेश के लिए सटीक बैठता है-जहां के वोटरों ने ‘भ्रष्टाचारमुक्त विकास’ के पक्ष में अपना वोट दिया है.

हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी को अमित शाह के रूप में एक मेहनती पार्टी अध्यक्ष की अचूक बूथ रणनीति का तगड़ा सपोर्ट मिला. शाह ने जून में ही बूथ स्तर पर वोटरों को मैनेज करने के लिए 7,500 पार्टी कार्यकर्ता तैयार कर दिये थे. इन सबका शाह से सीधा संवाद था. इस व्यूह रचना का सामना करने के लिए राहुल गांधी की कांग्रेस कहीं नहीं थी. दो-दो आंदोलनों-पाटीदार और दलित आंदोलन-का साथ मिलने पर भी यहां कांग्रेस चुनौती बनने या देने की हैसियत में नहीं थी. तो संगठन का अपना महत्त्व तो है ही. वह हिचकिचा रहे या नाराज चल रहे वोटरों को अपने पक्ष में एक स्पष्ट राय बना कर बूथ पर भेजना आसान कर देता है. इस फैक्टर ने मोदी की ‘गुजरात की अस्मिता या प्रतिष्ठा’ बचाने के नारे को भाजपा के पक्ष में लाने का जबर्दस्त काम किया. भाजपा की जीत में उन नाराज वोटरों का निर्णयकारी हाथ है, जो पार्टी के अन्य विकल्प पर विचार करने के बावजूद आखिर में ‘कमल’ पर ही बटन दबाया है. सूरत में नाराज कारोबारियों की रैलियों के बावजूद उनका भाजपा के साथ रह जाने से जाहिर हुआ कि जीएसटी और विमुद्रीकरण कोई मुद्दा नहीं है. आशय यह कि वोटरों ने भाजपा की नीतियों से नाराजगी दिखाई है पर उसकी विचारधारा से नहीं.

फिर भी ऐसी कांग्रेस, जिसने हवा का रुख भांपने में पर्याप्त देरी से, वह भी अस्त-व्यस्त हालत में और दूसरों-हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर एवं जिग्नेश मेवानी की तैयार की गई जमीन पर खड़ी होकर भाजपा को ‘पानी पिलाने’ की हालत में रख दिया. इस तरह कि पीएम मोदी को जिला दर जिला रैली पर रैली करनी पड़ी. अपनी पूरी सरकार गुजरात में उतारनी पड़ गई. प्रचार में पर्याप्त समय पाने के लिए उन्हें संसद का शीतकालीन सत्र तक आगे खिसकाना पड़ा. इतना ही नहीं, ‘गुजरात मॉडल’ यानी काम पर वोट पाने के अपने व्यावहारिक विश्वास को आखिर में संवेदनात्मक मुद्दों-अस्मिता (खुद की और गुजरात की), हिंदुत्व के सच्चे और फर्जी पैरोकारों की पहचान करने, मुसलमान और पाकिस्तान पर टिकाना पड़ा तो इसके असल संकेत भाजपा के लिए व्यापक और गहरे हैं. इसलिए भी कि यह सब करके भी भाजपा गुजरात में जातीय विभाजन की साढ़े तीन सालों में गहरी पड़ती गई दरारों को पाटने, पिछड़ों-दलितों के अपने प्रति खोये विश्वासों को फिर से पाने, बेरोजगारी दूर करने और गांवों को अपने साथ जोड़ने में पुन: विफल रही है. चिंता के ये सबब इस तथ्य के बावजूद हैं कि भाजपा गुजरात में लगातार छठी बार सत्ता में काबिज होने जा रही है-एंटी इनकम्बेसी को पटखनी देती हुई. हालांकि आजादी के आंदोलन की सव्रेसर्वा और सत्तर सालों में लगभग साठ सालों तक केंद्रीय शासन में रही कांग्रेस के पास लगातार छठी बार शासन में रहने का किसी राज्य में अब तक कोई रिकार्ड नहीं है. चाहे छत्तीसगढ़ हो या मध्य प्रदेश, त्रिपुरा हो या पश्चिम बंगाल, इसके रिकार्ड क्रमश: भाजपा और वाममोच्रे के नाम ही हैं.

तो मोदी की अगुवाई में भाजपा की सारी कवायद, संगठन की ताकत और रिकार्ड शासन की बची प्रतिष्ठा में राहुल गांधी के कड़े अभ्यास के बावजूद उनकी पार्टी नेताओं के सेल्फ गोल कर देने वाले बयानों की बड़ी भूमिका है. इसने ही अंतिम दौर में भाजपा के पक्ष में चुनाव की फिजां बदल दी. कपिल सिब्बल का सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर की सुनवाई को 2019 तक स्थगित करने की दलील हो या मणिशंकर अय्यर का ‘नीच-दोनों ने मोदी का काम आसान कर दिया. मोदी ने घूम-घूम कर सिब्बल की दलील के जरिये कांग्रेस को ही हिंदुत्व यानी बहुसंख्यकों के विरुद्ध सिद्ध कर दिया तो अय्यर के ‘नीच’ को गुजरात के ‘भूमि-पुत्र’ (मोदी) का सहन न किया जा सकने वाले अपमान से जोड़ दिया. इस पर गुजरात, जिसके बहुसंख्यक वोटर मध्यवर्गीय हिंदू हैं और उनकी बुनावट एंटी मुस्लिम हैं, वे मोदी के साथ खड़े हो गए जबकि चुनाव के पहले चरण में ‘गुजरात की अस्मिता’ पर मोदी की चिंता को कोई तवज्जो नहीं दे रहा था. उन दो बयानों ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उन ब्योरों से पैदा हुई आंच पर भी पानी पटा दिया, जो वह जीडीपी और जीएसटी को जोड़कर लहकाये हुए थे. उल्टे उनको प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने के लिए पाकिस्तान के साथ मिल कर साजिश रचने के आरोप लगाकर सुरक्षात्मक बना दिया. आज भी कांग्रेस इस पर संसद को नहीं चलने दे रही है जबकि वह चुनाव हार गई है. दूसरी बात, कांग्रेस की छवि परिवर्तन के लिए राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर भगवान के दर्शन करने को भी वोटरों ने नहीं बहुत महत्त्व नहीं दिया. उसने हिंदुत्व की मुख्य संरक्षक भाजपा को ही माना है.

बर्बरीक की तरह यह कहते हुए कि मौजूदा चुनावी ‘महाभारत’ में अकेले मोदी ही मोदी लड़ रहे थे. फिर भी गुजरात में उनकी पार्टी के कुछ मुश्किलातों की ओर ध्यान दिलाने की जरूरत है. यहां भाजपा को अपनी कार्यकुशलता पर ध्यान देना होगा. उसको बेरोजगारी, गांवों की खस्ताहालत को दूर करनी होगी. उज्ज्वला जैसी केंद्रीय योजनाओं के अलावा, नौकरी और आरक्षण का हल निकालना होगा. इनके सबसे बढ़कर मोदी को गुजरात और केंद्रीय स्तर पर पार्टी की दूसरी कतार के नेताओं को सामने लाना होगा. अन्यथा भाजपा, ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ जैसी आरामतलब स्थिति की तरफ बढ़ती हुई काहिल हो जाएगी. केवल एक नेता पर ही समूची निर्भरता के खतरे से कांग्रेस अब तक उबर नहीं पाई है. कहीं वही हाल भाजपा का न हो जाए! लिहाजा, नरेन्द्र मोदी को इसमें योजनाबद्ध तरीके से सुधार करना होगा.

अलबत्ता, गुजरात में राहुल गांधी के साहसिक और महत्त्वाकांक्षी प्रचार ने खुद उनको व कांग्रेस को बहुत कुछ दिया है. वह जीत भले न सकी है तो उसे हारा हुआ भी नहीं कहा जा सकता. अब तो उसे राहुल के रूप में एक आत्मविश्वासी नेता मिल गया है. विपक्ष भी राहुल गांधी को केंद्रीय भूमिका में रख कर 2019 के आम चुनाव की संयुक्त रणनीति तैयार कर सकता है. अलबत्ता, यहां से राहुल को नरेन्द्र मोदी की रणनीतिक चतुराई के साथ-साथ उनकी गलतियों से भी सीखना है. ऐसा करते वह लगते भी हैं- जब वह कहते हैं, ‘क्रोध और घृणा को हमें प्यार से जीतना है. कांग्रेस वह नहीं करेगी, जो भाजपा करती या कर रही है.’ यह विकल्प की समर्थ लाइन बनने की उम्मीद जगाती है. गुजरात के परिणाम को इन्हीं सब संदभरे में देखा जा सकता है.


 
 

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