सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि असामान्य और अप्राकृतिक सेक्स में फर्क है.
समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से अलग करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की.
जस्टिस जीएस सिंघवी और सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय की बेंच ने कहा कि समलैंगिकता को बदलते सामाजिक परिवेश के साथ देखने की जरूरत है. 20-25 साल पहले जिन चीजों को अनैतिक कहा जाता था, अब स्वीकार्य हैं.
अदालत ने अविवाहित जोड़ों के एकसाथ रहने की बात कही. ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ को सामाजिक और कानूनी मान्यता मिल गई है. कुछ साल पहले समाज इस तरह के रिश्तों को स्वीकार नहीं करता था.
सिंगल पैरेंट का चलन भी समाज में तेजी से बढ़ रहा है. बहुत से लोग शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते लेकिन पिता बनना चाहते हैं. कृत्रिम गर्भ के जरिए बच्चे को हासिल करके वह पिता होने का सुख प्राप्त कर लेते हैं.