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अर्श भगंदर जिससे आज भारत की लगभग 60 प्रतिशत आबादी पीड़ित है। इस रोग का मुख्य कारण तामसिक खान-पान है। तेज मिर्च मसालों, मांस, मछली, शराब, तली हुई चीजों आदि का सेवन इस रोग में इजाफा करता है। पहले के समय में यह बीमारी राजा महाराजाओं व धनपतियों को ही होती थी पर अब तामसिक भोजन का प्रचलन बढ़ने से यह बीमारी किसी को भी हो सकती है।
इस बीमारी का इलाज एलोपैथी से ज्यादा आयुर्वेद में कारगर साबित हुआ है। आयुर्वेद में क्षार सूत्र पद्धति से इस रोग को जड़ से मिटाया जा सकता है। विश्व भर में अर्श भगंदर की यह एकमात्र सफलतम चिकित्सा तकनीक है। एलोपैथी में सर्जरी करवा चुके मरीजों को भी अर्श भगंदर फिर घेर लेता है पर क्षार सूत्र पद्धति से जीवन भर की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
अर्श भगंदर ऐसे रोग हैं जिनके लिए आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अत्यन्त कारगर साबित हुई है। इसमें सफलता का प्रतिशत सौ फीसद है। वहीं इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। देश भर में इस विधा का प्रयोग इन रोगियों के लिए रामबाण साबित हो रहा है।
इस विधि में सर्वप्रथम सूती धागे को डाण्डा थूहर के दूध तथा पीएच वेल्यू के अनुसार हल्दी चूर्ण, अपामार्ग क्षार, तूत्थ, वमन कुठार रस, सजीक क्षार आदि क्षार तत्वों के आधार पर 29 बार सूतकर, औषधीय धागा तैयार किया जाता है। इसे ही क्षार सूत्र कहते हैं।
मरीज की वात, पित्त और कफ प्रकृति के आधार पर ही यह क्षार सूत्र तैयार होता है। इसका प्रयोग अर्श, पाईल्स, भगंदर, फिस्चूला व परिकर्तिका फिशर में होता है। इसके साथ ही गुद भ्रंश रेक्टम प्रोलेप्स का भी इलाज किया जाता है। लेकिन शल्य कर्म से पूर्व मरीज को दवाइयां देकर ठीक करने का प्रयास किया जाता है।
शल्य कर्म सबसे अंतिम क्रिया है। शल्य कर्म के लिए मरीज को 10 दिन भर्ती रहना होता है। फिर जांच की जाती है। अर्श, भगंदर से बचाव के लिए खान-पान पर ध्यान देना जरूरी है। पहले के लोगों में घी, दूध, छाछ, दही का प्रचलन खूब था इससे शरीर को स्नेहन के लिए पर्याप्त तत्व उपलब्ध होने की वजह से यह रोग कम होता था पर अब इनका स्थान अन्य चीजों ने ले लिया है।
इस वजह से शरीर में स्निग्धता की कमी तथा कब्जियत से यह रोग बढ़ा है। मिर्च व मक्की की रोटी का ज्यादा सेवन भी इन रोगों को जन्म देता है। कई बार खान-पान में तामसिकता की वजह से अर्श भगंदर या पाईल्स का रेक्टम कैंसर में भी तब्दील हो जाना सम्भव है। भोजन में छाछ, हरी रेशेदार सब्जी का भरपूर उपयोग, मौसमी फल आदि के सेवन को बढ़ावा देना जरूरी है। कब्ज के सभी कारणों को खत्म करना चाहिए। इसके लिए नियमित शौच की आदत जरूरी है।