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नयी दिल्ली। खगोलविदों और आकाशीय परिघटना प्रेमियों ने जब धरती के बेहद करीब आये धूमकेतु लुनिन को नंगी आंखों से देखा तो उनके लिये यह विस्मय भरा नजारा था।
नेहरू तारामंडल की निदेशक एन रत्नश्री ने बताया धूमकेतु धरती के बहुत करीब था और उसे नंगी आंखों से देखा गया। अग्र भाग हरा रंग लिये होने के कारण ग्रीन कामेट के नाम से भी जाना जाने वाला लुलिन पूर्व दक्षिणपूर्व दिशा में आकाश में बहुत नीचे पौ फटने से पहले नजर आया।
खगोलशास्त्र के क्षेत्र में काम कर रही निजी संस्था एसपीएसीई के निदेशक सी बी देवगन ने कहा कि धूमकेतु स्वर्णिम आभा लिये शनि के ठीक बगल में तैरती गैस की एक धुंधली चादर सा नजर आया।
इस धूमकेतु का दिलचस्प लक्षण रही उसकी कक्षा। लुनिन ग्रहों की तरह विपरीत दिशा में घूमता है इसलिए उसकी रफ्तार काफी है। इसका मार्ग पेराबोलिक है इसके मायने हैं कि यह इस रास्ते पहले नहीं गुजरा और हो सकता है कि अंदरूनी सौर्य प्रणाली में यह इसकी पहली यात्रा रही हो। साइंस पापुलेशन एसोसियेशन आफ कम्युनिकेटर्स एण्ड एड्यूकेटर (एसपीएसीई) ने नेहरू तारामंडल के साथ मिलकर जनता को यह नजारा दिखाने की व्यवस्था की।
लुनिन का पता सन् 2007 में संयुक्त रूप से एशियाई खगोलविदों ने लगाया था। चीन के क्चानझी ये ने सबसे पहले ताइवान स्थित लु लिन वेधशाला से चिशेंग लिन से प्राप्त तस्वीरों से इसका पता लगाया।
यह खोज लुलिन स्काई सर्वे प्रोजेक्ट का हिस्सा है। परियोजना का मकसद सौर प्रणाली में मौजूद विभिन्न छोटे छोटे पिंडों का पता लगाना है। खासकर उन पिंडों का जो धरती के लिये खतरनाक हैं। धूमकेतु धूल एवं बर्फ का वह मलबा है जो करीब चार अरब साठ करोड साल पहले हमारी सौर्य प्रणाली बनने से पहले से अस्तित्व में हैं। धरती तथा अन्य ग्रहों की तरह ये आकाशीय पिंड भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं लेकिन उनके विपरीत कुछ धुमकेतु लाखों साल में यह परिक्रमा पूरी कर पाते हैं। निर्भर करता है कि कहां से उन्होंने सफर शुरू किया।
कुछ धूमकेतु नेपच्यून ग्रह की कक्षा से परे सौर प्रणाली के मलबे के घेरे से आते हैं जिसे कूपर बेल्ट के नाम से भी जाना जाता है। इसकी दूरी धरती से करीब आठ खरब किलोमीटर है। इस बेल्ट के धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा करीब 200 साल में कर पाते हैं।
अन्य धूमकेतु ओर्ट क्लाउड नाम से प्रचलित क्षेत्र से सफर करते हैं जिसकी दूरी धरती से सूर्य तक की दूरी का करीब 100000 गुना अधिक है। इसके धूमकेतु को सूर्य की परिक्रमा करने में करीब तीन करोड साल लगते हैं।