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24 Feb 2009 06:03:11 PM IST
Last Updated : 30 Nov -0001 12:00:00 AM IST

लिट्टे का युद्धविराम प्रस्ताव हास्यास्पद


कोलंबो। लिट्टे के युद्धविराम की पेशकश को हास्यास्पद बताते हुए श्रीलंका की सरकार ने इसे षड्यंत्र बताया है। सरकार का कहना है कि हार की कगार पर पहुंचे तमिल टाइगर्स युद्धविराम की बात कर रहे हैं। रक्षा मामलों के प्रवक्ता केहेलिया रांबुकवेला ने कहा लिट्टे का काम करने का यह तरीका है कि वह हमेशा अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर दबाव में लाता है और फंसे नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिये चल रहे मानवीय कार्यों को बाधित करता है। उन्होंने कहा अंतरराष्ट्रीय समुदाय लिट्टे की प्रवृत्ति से पूरी तरह वाकिफ है। विश्व समुदाय को लिट्टे पर दबाव बनाकर उनसे आत्मसमर्पण करवाने और नागरिकों की रिहाई की कोशिश करनी चाहिए। रांबुकवेला ने डेली न्यूज को बताया देश और दुनिया लिट्टे की प्रवृत्ति से पूरी तरह वाकिफ है। लिट्टे इस तरह का षड्यंत्र दो दशकों से भी ज्यादा समय से करता आ रहा है। जब भी वह हार की कगार पर पहुंचता है और उसके हथियार एवं उपकरण खत्म होने लगते हैं तो युद्धविराम का आह्वान करने लगता है। लिट्टे ने संयुक्त राष्ट्र ब्रिटेन जापान नार्वे और अमेरिका को पत्र लिखकर सरकार के साथ युद्धविराम के संकेत दिये हैं। साथ ही उसने आत्मसर्पण करने और हथियार डालने से इंकार किया है। रांबुकवेला ने कहा लिट्टे के राजनीतिक प्रमुख बी नदेशन को पहले यह समझना चाहिए कि युद्धविराम क्या होता है। रांबुकवेला वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री भी हैं। रांबुकवेला ने कहा कि कई बार लिट्टे के साथ शांति समझौता किया गया लेकिन लिट्टे ने इन सभी समझौतों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा लिट्टे के समर्पण एवं हथियार छोड़ने के लिए पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भारत-लंका शांति समझौता किया। इसके अलावा 13वां संविधान संशोधन किया गया। लेकिन वह फिर जंगलों में लौट गये और युद्ध छेड़ दिया। उन्होंने कहा कि लिट्टे ने राजीव गांधी की भी हत्या कर दी। अखबार ने रांबुकवेला के हवाले से कहा जब तक आतंकवाद परास्त नहीं होता तब तक युद्धविराम नहीं होगा। अखबार के अनुसार 11 जून 1990 को लिट्टे ने रणसिंघे प्रेमदासा की सरकार के साथ वार्ता खत्म कर दी और इलम युद्ध फिर शुरू कर दिया। इसके बाद 19 अप्रैल 1995 को टाइगर विद्रोहियों ने चंद्रिका भंडारनायके कुमारतुंगा की सरकार के साथ वार्ता खत्म कर दी और इलम युद्ध तृतीय में लग गये। अखबार के अनुसार 21 अप्रैल 2003 को लिट्टे रानिल विक्रमसिंघे सरकार के साथ वार्ता से हट गया और दिसंबर 2005 में वह चौथे इलम युद्ध में लग गये।


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