नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत अत्याचार से जुड़े एफआईआर में आरोपी की जाति का उल्लेख करने की जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा और न्यायमूर्ति एच एल दातू की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने कहा कि पुलिस पीड़ित की शिकायत के आधार पर जांच शुरू कर सकती है चाहे उसने आरोपी व्यक्ति की जाति का उल्लेख किया हो अथवा नहीं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा आरोपी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का है यह मामले की जांच के बाद तय किया जा सकता है।
उच्चतम न्यायलय ने यह निर्देश बम्बई उच्च न्यायालय के उस निर्णय को दरनिकार कर दिया जिसमें पीड़ित अशाबाई मचिन्द्र अधागले के आरोपी की जाति का उल्लेख नहीं करने पर मामले की सुनवाई रद्द दी गई थी। उच्च न्यायालय ने पूर्व के निर्णय के आधार पर अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत सुनवाई रद्द की दी थी।
अधागले ने उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की थी।