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यांगून। भारतीय उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के मकबरे पर जाकर खिराज-ए-अकीदत पेश करते हुए कहा कि भारत और म्यांमा के अंतिम राजाओं का दुखद भाज्ञ दोनों देशों के इतिहास को एक दूसरे से जोड़ता है।
अंसारी ने एक मशहूर शेर ‘मरने वाले मरते हैं लेकिन फना नहीं होते, वो हमसे कभी जुदा नहीं होते' के साथ अपनी जज्बात भरी बात खत्म की।
बहादुर शाह की मजार पर फातेहा पढ़ने के बाद उपराष्ट्रपति ने अतिथि पुस्तिका में लिखा कि अंतिम मुगल बादशाह एक संत जैसी शख्सियत थे जो विदेशी शासन के विरोध का प्रतीक बन गए।
अंग्रेजों द्वारा अपदस्थ और प्रतिबंधित किये जाने के पांच साल बाद वर्ष 1862 में बहादुर शाह का यहां निधन हो गया था। अंसारी ने कहा भारत के लोग उस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को आज भी गर्व से याद करते हैं जिसके केन्द्र बिन्दु बहादुर शाह जफर थे।
उन्होंने इस मौके पर म्यांमा के आखिरी राजा थेबाव के भी ऐसे ही अंत को याद किया। वर्ष 1885 में अंग्रेजों द्वारा महाराष्ट्र के रत्नागिरि लाए गए थेबाव का वहीं निधन हो गया था।
अंसारी ने कहा कि यांगून में बहादुर शाह की मजार और मांडले में राजा थेबाव की अंतिम स्मृति म्यांमा और भारत के एक दूसरे से जुड़े इतिहास का दुखद पहलू है। ये दोनों तीर्थ हमारी साझा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।