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नागपुर। नागपुर में आरएसएस मुख्यालय होने के बावजूद मीठे रसीले संतरों की यह नगरी भाजपा के लिए अब तक खट्टी ही साबित हुई है।
संघ का गढ होने के बावजूद लोकसभा चुनाव के इतिहास में भाजपा यहां से केवल एक बार 1989 में बनवारी लाल पुरोहित के रूप में जीत दर्ज करने में सफल हो सकी थी। कहा जाता है कि पुरोहित के पूर्व कांग्रेस सासंद होने के कारण ही भाजपा को यह सफलता मिल पाई थी।
इस एक बार के अलावा कांग्रेस ही हमेशा नागपुर सीट जीतती आई है। संतरों की इस नगरी में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए पांच सीट है लेकिन इसमें भी भाजपा केवल एक सीट निकालने में सफल रही है वह भी केवल पिछले एक-दो बार से।
ब्राह्मणों और व्यापारियों की पार्टी माने जाने वाली भाजपा ने वर्ष 2002 में पहली बार सोशल इंजीनियरिंग के तहत किसी दलित को अपना अध्यक्ष बनाने का फैसला नागपुर में ही किया था। नागपुर में 2000 में पार्टी की केंद्रीय परिषद की बैठक में बंगारू लक्ष्मण को अध्यक्ष बनाने का फैसला हुआ था और अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं नीचे आकर बंगारू का हाथ पकड़ कर उन्हें मंच पर ले कर गये थे और उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन किया था लेकिन नागपुर में किया गया यह साहसिक फैसला भी खट्टा ही निकला।
बंगारू एक साल बाद ही रिश्वत लेते कैमरे में कैद कर लिये गए और इस तरह भगवा पार्टी की नयी सोशल इंजीनियरिंग का चक्का चलने से पहले की जाम हो गया।