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20 Mar 2017 04:55:14 AM IST
Last Updated : 20 Mar 2017 04:57:09 AM IST

विश्लेषण : मुख्यमंत्री आदित्यनाथ

अवधेश कुमार
लेखक
विश्लेषण : मुख्यमंत्री आदित्यनाथ
विश्लेषण : मुख्यमंत्री आदित्यनाथ

जैसे ही यह खबर आई कि योगी आदित्यनाथ चार्टर्ड जहाज से दिल्ली आए हैं, वैसे ही यह समझ में आने लगा कि उनको कोई बड़ी जिम्मेवारी मिलने वाली है.

उसके बाद जब वे लखनऊ में विधायक दल की बैठक में गए तो यह ज्यादा साफ होने लगा कि शायद उनको उत्तर प्रदेश की कमान दी जाने वाली है. आखिर एक ही सांसद उस बैठक में क्यों गया? हालांकि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के चयन पर बहुत सारे लोग अचंभित हैं. उनको लगता है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने यह क्या कर दिया? इसमें उनके समर्थक भी शामिल हैं. वे कह रहे हैं कि कहां ‘सबका साथ और सबका विकास’ और कहां योगी आदित्यनाथ?

हमारी समस्या है कि हम कई बार तथ्यों से ज्यादा निर्मिंत धारणाओं पर विचार करते हैं. एक व्यक्ति जो भगवावस्त्रधारी संन्यासी है, जो हिन्दुत्व पर खुलकर बोलता है वह अच्छा मुख्यमंत्री नहीं हो सकता, वह कुशल प्रशासक नहीं हो सकता, वह सबको साथ लेकर नहीं चल सकता..ऐसी हमारी धारणा बनी हुई है. यह सच नहीं है. मोदी सरकार की आप चाहे जितनी आलोचना कर लीजिए लेकिन उसके बारे में यह सच कोई नकार नहीं सकता कि अभी तक उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिसे मुस्लिम विरोधी कहा जा सके. तो विरोधियों और आलोचकों की तमाम आशंकाओं के बावजूद करीब तीन साल में जिस प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कोई मुस्लिम विरोधी कदम नहीं उठा उसके मार्गदशर्न में चलने वाली किसी प्रदेश सरकार में ऐसा हो जाएगा यह निष्कर्ष हम किस आधार पर निकाल रहे हैं?

थोड़ा धैर्य रखिए, उनको काम करने दीजिए और फिर उसके आधार पर मूल्यांकन करिए. योगी के बयानों को जरूर विवादित बनाया गया, लेकिन वह संगठन के अंदर और समर्थकों के बीच एक लोकप्रिय नेता हैं. उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ जिस तरह भाजपा और संघ परिवार के समर्थकों ने जश्न मनाया है यह उसका प्रमाण है. हम यहां कुछ बातें शायद भूल रहे हैं. जब नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री बने तो वे विधायक भी नहीं थे. मुख्यमंत्री बनने के पहले वे विधान सभा में भी कभी नहीं गए थे. उनका संघ और पार्टी के काम करने का अनुभव तो था लेकिन किसी तरह का जन प्रतिनिधि या प्रशासन का अनुभव नहीं था. उन्होंने अपने को साबित किया और गुजरात मॉडल लोगों के सिर चढ़कर इस तरह बोला कि उसके आधार पर वे देश के प्रधानमंत्री हो गए. योगी आदित्यनाथ तो पांच बार सांसद निर्वाचित हो चुके हैं.

अपने 45 वर्ष की उम्र में पांच बार लोक सभा चुनाव जीतना कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है. दूसरे, संसद में उनकी उपलब्धियां अनेक सांसदों से बेहतर है. उनकी उपस्थिति 77 प्रतिशत और प्रश्न पूछने एवं मुद्दे उठाने के मामले में उनको प्रथम श्रेणी का सांसद माना जाता है. उनकी छवि के विपरीत संसद में उनका व्यवहार बिल्कुल नियमों के तहत भूमिका निभाने वाले सांसद की है. वे कभी वेल में नहीं जाते. कभी किसी सभापति ने न उनके किसी शब्द को असंसदीय कहकर निकाला न ही उनके विरुद्ध कोई प्रतिकूल टिप्पणी की. तो उनका एक यह भी रूप है, जिसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता.

यह भी न भूलिए कि उत्तर प्रदेश चुनाव में स्टार प्रचारक के रूप में योगी ने काफी सभाएं कीं. लेकिन चुनाव आयोग को उनकी कोई पंक्ति आपत्तिजनक या आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली नहीं दिखी. जहां तक कट्टरता का आरोप है तो नरेन्द्र मोदी से ज्यादा कट्टर की छवि तो किसी को मिली ही नहीं थी. 2002 के बाद से लगातार उनके विरुद्ध अभियान चला और उन्हें घोर सांप्रदायिक एवं मुस्लिम विरोधी नेता बनाकर प्रचारित किया जाता रहा. आज वह देश के प्रधानमंत्री हैं और इन आधारों पर आलोचना करने वाले अनेक लोग उनके समर्थक भी हो चुके हैं. इसमें दो राय नहीं कि भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े और सांप्रदायिक  रूप से संवेदनशील प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर कुछ स्पष्ट संदेश दिया है. इनको मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने यह संदेश दिया है कि हिन्दुत्व और विकास के बीच समन्वय और संतुलन बनाकर चलना होगा. यानी हम देश को आधुनिक बनाना चाहते हैं, विकास के पथ पर देश को सरपट दौड़ाना चाहते हैं, पर अपने परंपरागत सिद्धांतों से भी परे नहीं जाने वाले. भाजपा नेता इसके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि परंपरागत विचारधारा और विकास दोनों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है.

जरा भाजपा के इस फैसले पर भाजपा की दृष्टि से विचार करिए. भाजपा की दृष्टि से विचार करेंगे तो यह फैसला सहज और स्वाभाविक लगेगा. भाजपा अपनी यह छवि तो निर्मिंत कर रही है कि वह शासन करने वाली पार्टी है. यानी उसको शासन करना आता है, लेकिन वह  यह भी मानती है कि हिन्दुत्व उसको वोट दिलाने का एक प्रमुख आधार है. उनके सामने 2019 का लोक सभा चुनाव है और उस दृष्टि से यह फैसला अनुकूल है. 2014 में भाजपा की विजय के बारे में यह सोच भी सही नहीं है कि केवल विकास के नारे ने उसे बहुमत के आंकड़े से भी आगे कर दिया. मोदी की आक्रामक हिन्दुत्व और प्रखर राष्ट्रवादी की छवि की उसमें बड़ी भूमिका थी. जो लोग इसे नहीं समझ पाते वही भाजपा के बारे में भ्रांत धारणाएं बना लेते हैं और उनको ही योगी के मुख्यमंत्री बनने पर अचंभा हो रहा है. भाजपा के संकल्प पत्र को देख लीजिए. सरकार गठित होते ही बूचड़खानों को बंद करने और ‘एंटी रोमियो स्क्वॉड’ बनाना क्या है?

राम जन्मभूमि के निर्माण के लिए कानूनी और संवैधानिक रास्ता आसान करना क्या है? हिन्दुत्व ही तो है. पहले चरण के चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिलना आखिर किस बात का परिचायक था? निस्संदेह, योगी को अपनी काबिलियत साबित करनी होगी. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘सबका साथ सबका विकास’ की नीति को आगे बढ़ाएंगे. उनका दो ही एजेंडा है-सुशासन और विकास. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश विकास के पथ पर अग्रसर होगा. यह एक संतुलित वक्तव्य है. उत्तर प्रदेश को इन दोनों की जरूरत है तथा योगी को इसे साकार करके दिखाना होगा. उम्मीद करनी चाहिए कि वे इस पर खरा उतरेंगे. इसी में उत्तर प्रदेश और देश का हित है.


 
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