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26 Apr 2014 01:53:02 AM IST
Last Updated : 26 Apr 2014 02:01:09 AM IST

खाप पंचायतों का हृदय परिवर्तन!

खाप पंचायतों का हृदय परिवर्तन!

सतरौला खाप के एक निर्णय में अब बयालीस गांवों के लोग आपस में अपने बच्चों का विवाह कर पाएंगे.

अंतरजातीय शादियों पर से भी प्रतिबंध हटा लिया गया है. गत बीस अप्रैल को हरियाणा के हिसार जिले में सतरौला खाप पंचायत में लोगों ने कहा कि समय बदल गया है, इसलिए छह सौ साल पुराने नियम बदलने चाहिए. हालांकि गांव के अंदर तथा गांव से सटे दूसरे गांव में शादी तथा सगोत्र विवाह पर प्रतिबन्ध बना रहेगा. सतरौला खाप के पंचों का यह कहना कि जमाना बदल गया है और हमें भी बदलना होगा, एक कदम आगे का फैसला है. उम्मीद है कि धीरे-धीरे दूसरी पंचायतों में भी विचार विमर्श की प्रक्रिया शुरू होगी तथा वे भी रवैया बदलेंगी.

लेकिन फिलहाल तो कई अन्य पंचायतों ने इसका विरोध किया है तथा वर्चस्व की लड़ाई बढ़ेगी, ऐसा भी लग रहा है. बलियान खाप पंचायत के चौधरियों ने चौधरी नरेश सिंह टिकैत के नेतृत्व में महाखाप पंचायत  की बात कही है. अब तक आम तौर पर हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतें अपने जनविरोधी फैसलों तथा लोगों के निजी मामलों में दखल के कारण चर्चा में रही हैं. इज्जत के नाम पर उत्पीड़न व हत्याओं तक का फरमान सुनाने के लिए ये दुनिया भर में कुख्यात हैं. ऐसे में कहीं से भी कोई सकारात्मक फैसला सुनाई देता है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए तथा उसे इतना समर्थन मिलना चाहिए ताकि अन्य पंचायतें उसका अनुसरण करने के लिए तथा इससे भी आगे समाज सुधार के लिए कदम बढ़ाने के बारे में सोचें.

यद्यपि यह सवाल बरकरार है कि एक जनतांत्रिक देश में जहां चुनी हुई पंचायतों की गतिविधियों तथा भूमिका से जनजीवन अधिक प्रभावित होना चाहिए, वहां पारंपारिक पंचायतों का इतना दबदबा क्यों है!  चुनी गयी इकाइयों को अधिक सशक्त और प्रभावी क्यों नहीं बनाया जा सका है. जबकि स्वयंभू खाप पंचायतें जिसमें न सभी की भागीदारी है और न इन्हें बनाये जाने का कोई वैध तरीका है, लोगों के निजी मामलों में फैसले देती रहती हैं जो अक्सर गैरकानूनी-गैरसंवैधानिक होते हैं. संविधान एक निश्चित उम्र के बाद लोगों को जीवन साथी चुनने का अधिकार देता है लेकिन ये पंचायतें खुद तय करती हैं कि क्या मंजूर होगा और क्या नहीं.

सतरौला खाप पंचायत की मानसिकता बदलने के पीछे लोगों का प्रतिरोध बड़ा कारण माना जा रहा है. एक तरफ गांव से बाहर चले गए युवा अपनी मर्जी की शादी कर रहे हैं, लेकिन गांव में रहने वालों बच्चों की शादी ब्याह के मामले में तमाम प्रतिबंध लागू हैं. इसलिए ऐसी रूढ़ियों का विरोध बढ़ रहा है. कन्या भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम भी सामने हैं. पुरुषों की तुलना में लगातर कम होते महिला अनुपात के कारण शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही हैं. यही मजबूरी है कि प्रतिबंध हटाने पर राय बन रही है.

सतरौला पंचायत के फैसले को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. इतना ही नहीं, न्यायपालिका के स्तर पर भी खापों की मनमानी पर अंकुश की कवायद बढ़ी है. जैसे, करनाल के सत्र न्यायालय ने 2007 में ग्राम करोरा में सामने आए मनोज-बबली हत्याकांड के खिलाफ दोषियों को दंडित करने का ऐलान किया. याद रहे कि इन दोनों ने शादी करने के बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगायी थी. कुछ समय पहले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने संविधान प्रदत्त कानूनों को धता बतानेवाली इन जाति पंचायतों पर अंकुश के लिए इन्हें गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेन्शन एक्ट) के दायरे में लेने की बात की थी.

मालूम हो कि उच्च न्यायालय के प्रस्ताव पर हरियाणा सरकार ने दलील दी थी कि इन जाति पंचायतों पर ऐसे अधिनियम का इस्तेमाल होगा तो सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है. वैसे अदालत की सख्ती के बाद प्रशासन को सख्त होना पड़ा था और फिर उसने रोहतक के कुछ राजस्व अधिकारियों को निलम्बित किया था जिन्होंने एक ऐसी पंचायत में हिस्सेदारी की थी जिसने सगोत्र विवाह करनेवाले पति पत्नी को एक-दूसरे को भाई-बहन कहने का आदेश दिया था. महज अदालतें ही नहीं, यह भी देखने में आया है कि सामाजिक संगठन तथा जनतांत्रिक हकों के पक्षधर भी अब खुल कर खाप पंचायतों के खिलाफ सामने आने लगे हैं.

ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जिसमें इन खाप पंचायतों के मनमाने निर्णयों के खिलाफ पीड़ित महिलाओं ने कानूनी लड़ाई लड़ने का साहस किया. मसला चाहे रोहतक की कविता और सतीश का हो या जींद के फरमाणा गांव की नीलम की शादी का, दोनों मामलों में खाप पंचायतों को झुकना पड़ा. मालूम हो कि महमखेरी गांव की कविता और सतीश का एक बच्चा भी है लेकिन पंचायत ने दोनों को भाई-बहन घोषित कर दिया. कविता ने परिवार बिखरता देख पंचायत के खिलाफ लड़ने का मन बनाया. उसने रोहतक के एसएसपी के दफ्तर जाकर 21 पंचायत सदस्यों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा हाईकोर्ट जाने की धमकी दी. पंचायत के अड़ियल रुख के खिलाफ दोनों ने आत्मदाह की धमकी भी दी.

सामाजिक संगठनों ने भी कविता और सतीश की लड़ाई में सहयोग दिया. अंतत: पंचायत को झुकना पड़ा. जींद जिले के बुढ़ाखेड़ा गांव के नवीन और फरमाणा की नीलम के मामले में भी पंचायत ने फरमान जारी कर दिया कि यदि शादी सम्पन्न हुई तो इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी. दोनों के घरवालों ने पुलिस से शिकायत की तथा शादी पुलिस के पहरे के बीच जींद के शीशमहल होटल में सम्पन्न हुई.

जिन दिनों खाप पंचायतों के ये मनमाने फैसले सुर्खियां बन रहे थे उन्हीं दिनों विभिन्न संगठनों ने रोहतक के मेहम में एक सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें महिलाओं की अच्छी खासी भागीदारी थी. सम्मेलन ने खाप पंचायतों की शक्ति को चुनौती देने के आह्वान के साथ अपील थी कि वे इन्हें हाशिए पर डाल दें. लोगों ने मंच से कहा कि गोत्र का मु्द्दा बेतुका और निराधार है. उन्हीं दिनों यह बात रेखांकित की गयी कि सामाजिक संगठनों का संयुक्त मोर्चा अपनी उपस्थिति व सक्रियता बनाए रहता है तो निश्चित ही इन मध्ययुगीन फरमानों पर अमल बीते दिनों की बात बन जाएगी.

दरअसल इस मनमानी के पीछे यही वजह है कि सरकारों व प्रशासन ने इनके प्रति ढुलमुल रवैया अपनाया तथा नेताओं ने वोटबैंक खिसकने की आशंका से इनके खिलाफ कदम नहीं उठाया. अब न सिर्फ हरियाणा बल्कि देशभर में ऐसी निरंकुश ताकतों के खिलाफ आवाज उठी है और मीडिया में भी इनकी फजीहत हुई है. यदि प्रतिरोध मजबूत होता है तो न सिर्फ खाप पंचायतें अपने को बदलेंगी या कमजोर होंगी बल्कि दूसरी सामाजिक बुराइयों पर भी इसका असर पड़ेगा और उनके खिलाफ भी आवाज उठाने की प्रेरणा मिलेगी-मसलन कन्याभ्रूण का गर्भपात हो या दहेज की समस्या या महिलाओं के खिलाफ होनेवाली अन्य प्रकार की हिंसा.


Source:PTI, Other Agencies, Staff Reporters
अंजलि सिन्हा
लेखक
 
 

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