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मुंबई। भारत ने आज संकेत दिये कि परमाणु ऊर्जा उत्पादन निर्णायक मोड पर खड़ा है और कहा कि ऊर्जा सोतों की अनुपलब्धता के चलते इसके विकास में अधिक देरी खतरनाक साबित हो सकती है।
परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने बीजिंग में आईएईए के एक सम्मेलन में कहा एकमात्र व्यावहारिक तरीका तकनीक आधारित हल ढूंढ़ने का हो सकता है जो इन सभी मुद्दों का समेकित जवाब दे सके। उन्होंने कहा हम निर्णायक मोड़ पर हैं। एक तरफ हमें तेजी से घट रहे जीवाश्म ईंधन के संसाधनों की चुनौती और जलवायु परिवर्तन के खतरों पर ध्यान देना है दूसरी ओर हम सुरक्षा और प्रसार की आशंकाओं से जूझ रहे है। काकोडकर ने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा निर्मित कर संस्थागत नियंत्रण करना जरूरी है क्योंकि बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा जरूरतों के संदर्भ में इन चिंताओं से संस्थानों के निपट पाने की संभावना कम है।
उन्होंने कहा कि हमारे नजरिये से एकमात्र व्यवहार्य तरीका तकनीक आधारित हल ढूंढ़ने का है ताकि इन सभी मुद्दों का समेकित जवाब मुहैया कराया जा सके और समाधान को जितना जल्द संभव हो सके अपनाया जा सके। यह निश्चित तौर पर विश्व के उस नजरिये से नहीं किया जा सकता जो भेदभाव करता है और सभी साझेदारों की भागीदारी को लेकर असमान रूख अपनाता है। काकोडकर ने कहा कि आईएईए अपने ओहदे के चलते इन मुद्दों को समग्र तरीके से देखता है। वह अपने वैज्ञानिक तथा तकनीकी संसाधनों और उपयुक्त जवाब ढूंढ़ने की अपनी क्षमताओं की बदौलत अच्छा काम कर सकता है।
उन्होंने कहा हमारे टिकाऊ भविष्य के लिये यही शायद एकमात्र रास्ता है।
सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से विकासशील देशों की परमाणु ऊर्जा तक पहुंच उपलब्ध कराने की पर्याप्त कोशिशें नहीं करने के लिये आईएईए की आलोचना करते हुए काकोडकर ने कहा कि वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के 55 फीसदी से अधिक संसाधन परमाणु कार्यों के सत्यापन और प्रशासन में खर्च हो जाते हैं। जबकि तकनीकी सहयोग ईंधन चक्र और परमाणु विज्ञान को 10-10 फीसदी से भी कम संसाधन प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि अगर परमाणु पुनर्जागरण से उत्पन्न आकांक्षाओं को पूरा करने का कोई मौका है तो इसके लिये आईएईए और उसके सदस्य देशों को संसाधनों का प्राथमिकीकरण करना होगा।