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10 Oct 2012 12:30:42 AM IST
Last Updated : 10 Oct 2012 12:35:53 AM IST

यह दवा है कि जहर

यह दवा है कि जहर

अर्थव्यवस्था में इन सट्टेबाजों का ‘विश्वास’ खत्म हुआ और उन्होंने अपना पैसा वापस खींच लिया तो इस विश्वास को बहाल करने के लिए सरकार को मजबूरन और कदम उठाने पड़ेंगे.

भारत में जब 1991 में नव-उदारवादी ‘सुधार’ शुरू किए गए थे तो इसके आलोचकों का यह कहना था कि मॉलों, सेवाओं तथा पूंजी के मुक्त प्रवाह के लिए अर्थव्यवस्था को खोलने से देश के लाखों-लाख मेहनतकश लोगों का जीवनस्तर अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजों के एक समूह की स्वेच्छाचारिता तथा सनक का शिकार हो जाएगा. अगर अर्थव्यवस्था में इन सट्टेबाजों का ‘विश्वास’ खत्म हुआ और उन्होंने अपना पैसा वापस खींच लिया तो इस विश्वास को बहाल करने के लिए सरकार को मजबूरन और कदम उठाने पड़ेंगे.

इससे जनता बुरी तरह प्रभावित होगी क्योंकि सरकार को सिर्फ ऐसे ही कदम उठाने पड़ेंगे, जिनसे उनका विश्वास बहाल हो, और दूसरे कदमों का अर्थात ऐसे कदमों का जो अमीरों तथा फाइनेंसरों के खिलाफ हों, स्वाभाविक रूप से इसके विपरीत प्रभाव पड़ेगा. इस तरह जैसे एक अंग्रेजी कहावत के मुताबिक कुत्ता पूंछ को नहीं, बल्कि पूंछ कुत्ते को हिलाने लगती है, उसी तरह अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजों के गिरोह की सनक लाखों-लाख लोगों का जीवन तय करेगी, जिसका अर्थ है जनतंत्र, समानता तथा संप्रभुता को नकारना.

तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह और नव-उदारवाद के अन्य हिमायतियों ने इन ‘सुधारों’ के आलोचकों की इस दलील का मजाक बनाया था और अपने आलोचकों को आदतन निशाराजनक भविष्यवाणियां करनेवाला बताया था. उनकी दलील थी कि अर्थव्यवस्था को खोले जाने से वह इतनी मजबूत, दक्ष और अंतरराष्ट्रीय रूप से प्रतियोगी बन जाएगी कि वह एक सफल निर्यातक के रूप में उभरकर सामने आएगी और अंतरराष्ट्रीय पूंजी की मनपसंद मंजिल बन जाएगी. देश में 1991 में भुगतान संतुलन का जो संकट आया था और जिसकी पृष्ठभूमि में ये ‘सुधार’ शुरू किए गए थे, वह सुधारों के इन हिमायतियों के अनुसार सुधार-पूर्व के अंतर्मुखी निजाम में निहित अक्षमताओं का ही परिणाम था. उनके अनुसार एक बार सुधारों के जरिए जब इस विरासत से मुक्ति पा ली जाएगी तो इस तरह के भुगतान संकट अतीत की बात हो जाएंगे.

गत 21 सितम्बर का देश के प्रधानमंत्री का टेलीविजन के जरिए देश को संबोधन स्पष्ट रूप से इसी की स्वीकृति है कि उनके उस समय के आलोचक सही थे और उनकी खुद की नव-उदारवादी दलीलें गलत थीं. उन्होंने 1991 के संकट की आज से तुलना की.

लेकिन अगर 1991 की तरह का संकट 2012 में हमारी अर्थव्यवस्था में आया है, जबकि अंतमरुखी रणनीति को अरसे पहले दफनाया जा चुका है, तो इसका अर्थ साफ है कि उस रणनीति को दोष नहीं दिया जा सकता है. जबकि 1991 के संकट का भी उस रणनीति से कोई लेना-देना नहीं था और 1991 का संकट इस रणनीति के चलते नहीं आया था, बल्कि ठीक इसके उलट कारणों के चलते ही आया था. जैसा कि इन सुधारों के आलोचकों ने तब कहा था. और यह कारण था कि 1980 के दशक से उस रणनीति का क्रमिक परित्याग, जब अर्थव्यवस्था को आज यहां तो कल वहां पहुंचने वाली और संभावित रूप से चंचल एनआरआई जमाराशियों के रूप में, वैश्विक वित्तीय प्रवाह के लिए खोला गया था.

उसी पैमाने से, नव-उदारवादी निजाम के तहत भारत के निर्यात में सफल रहने की तमाम बातों के बावजूद और एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत के उभरकर सामने आने के सारे हल्ले-गुल्ले के बावजूद, वह अभी भी कमजोर बना हुआ है. ठीक वैसे ही जैसे कि नव-उदारवाद के आलोचकों ने पूर्वानुमान लगाया था. सट्टेबाजों का विश्वास खत्म हो गया है, जो रातों-रात उसे धराशायी कर सकता है और उसने सरकार को ऐसे बौखलाहट भरे कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया है, जो जनता की बदहाली को और बढ़ाएंगे. संक्षेप में यह वित्तीय प्रवाह के लिए अर्थव्यवस्था का खुलापन ही है जिसने उसे वित्तीय संकट के सामने कमजोर बनाया है और एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहां सट्टेबाजों का विश्वास भारी महत्व अख्तियार कर लेता है और लोगों की जीवन स्थितियों को इस विश्वास को बनाए रखने के लिए एडजस्ट करना पड़ता है.

चलिए, हम मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिन कथित सुधारवादी कदमों की पहले ही घोषणा कर चुके हैं और आने वाले दिनों में जो कुछ वे करने को उत्सुक हैं- जैसे, सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को बेचना और जनता के धन को घरेलू तथा विदेशी पूंजीपतियों को फाइनेंस के लिए देना आदि- क्योंकि उससे अर्थव्यवस्था में वित्तीय प्रवाह की लहर चल निकलेगी और रुपए में आ रही गिरावट खत्म हो जाएगी. चलिए, हम इससे भी एक कदम आगे बढ़कर यह मान लेते हैं कि वित्त का प्रवाह और बढ़ेगा जिससे एक नया ‘बुलबुला’ फूलेगा और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि बहाल हो जाएगी लेकिन कुछ समय बाद अगर वैश्विक या घरेलू घटना विकास के चलते सट्टेबाजों का विश्वास फिर टूटता है, जो वक्त-वक्त पर होना ही है, तो यह बुलबुला, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि के साथ एक बार फिर फूटेगा और तब इस विश्वास को फिर से बहाल करने के लिए जनता को निचोड़ने वाले और कदमों की घोषणा की जाएगी.

जिन लोगों को इस विकास का कोई लाभ नहीं मिला है, बल्कि इसके उलट जब विकास हो रहा था, तब भी उनका दरिद्रीकरण ही हो रहा था, उन्हें और ज्यादा निचोड़ा जाएगा ताकि सट्टेबाजों का विश्वास बनाए रखा जा सके. यह हमारे संविधान के उन वादों का मजाक ही बनाना होगा कि हमारे देश में इस तरह की आर्थिक राह अपनाई जा रही है.

नव-उदारवाद के समर्थक यह दावा करेंगे कि इस तरह के रास्ते के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है और वित्त के उपरोक्त वैीकरण समेत, इस वैीकरण को बने ही रहना है और हमें उसी के अनुकूल अपने को ढालना होगा. अगर यह भी मान लें कि ऐसा ही है तो इस आवश्यकता के लिए बहाने बनाने की कोई जरूरत नहीं है. यह दिखाने की कोई जरूरत नहीं है कि जो चीज देश पर जोर-जबर्दस्ती से थोपी जा रही है, वह जनता के लिए बहुत अच्छी होगी.
बहरहाल, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सच नहीं है कि पूंजी नियंत्रण थोपने के जरिए वैीकृत वित्त के भंवर से कोई भी देश कभी भी निकल सकता है, जैसा कि हमारे बिल्कुल पड़ोस में महातिर मोहम्मद के शासन में मलयेशिया ने करके दिखाया था. और अगर किसी सरकार को यह लगता है कि हमारे संविधान की भावना का उल्लंघन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और क्योंकि वित्त के वैीकरण के निजाम के तहत हमें जनता के अधिकारों और उसकी रोजी-रोटी पर हमला करना ही है, तो उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है.  

(लेखक वरिष्ठ समाजविज्ञानी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)


प्रभात पटनायक
वरिष्ठ समाजविज्ञानी
 
 

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