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13 May 2012 12:38:10 AM IST
Last Updated : 13 May 2012 12:38:10 AM IST

सत्यमेव जयते

सुधीश पचौरी
लेखक
सत्यमेव जयते
सत्यमेव जयते

 

आमिर खान ने इस बार एक गंभीर डाक्यूड्रामा कमेंटरी दी. यह अलग ढंग का ‘रियलिटी शो’ रहा.

उसका असर हुआ. राजस्थान के सीएम ने उन्हें बुलाया और वे शो के बाद मिलने गए. सीएम ने कहा कि वे इन केसों पर जल्द कार्रवाई कराएंगे. केस छह साल पुराने हैं जब एक पत्रकार ने कन्याभ्रूण हत्या के जघन्य बिजनेस को अपने खुफिया कैमरे के जरिए स्टिंग किया.

दो दर्जन मामले में सबकी कहानी यही नजर आई कि माता-पिता को गर्भ में आए भ्रूण की जांच करवाने की जरूरत इसलिए है कि वे कन्या को नहीं चाहते. इस काम में सोनोग्राफी वाले डाक्टर मदद करते हैं. इन डाक्टरों के रिकार्डेड बयानों से साफ लगता था कि वे इसे एक सामान्य धंधे की तरह लेते हैं. अपने किए पर उन्हें कोई अफसोस नहीं है. यह निर्ममता हृदयविदारक थी.

इसी तरह आमिर ने उन माता-पिताओं की उन डाक्टरों से बातचीत दिखाई और ज्यों-ज्यों दृश्य-कमेंट सामने आते गए, त्यों-त्यों ‘सत्यमेव जयते’ शो आकषर्क होता गया और अब कहा जा रहा है कि एक ऐसा शो सामने आया है जिसने रामायण-महाभारत के दिनों की याद दिला दी. पूरे शो में आमिर खान कई बार रोते दिखे. जब एंकर इतना हिला हुआ दिखे तब दर्शक पीछे कैसे रह जाते? सो, कन्याभ्रूण हत्या पर ‘करुण भाव’ का निर्माण हुआ. सतही मनेरंजन के बीच यह दुर्लभ निर्माण था.

आज के भारत में कन्याभ्रूण हत्या! माता-पिता कन्या का जन्म नहीं चाहते. डाक्टर कुछ हजार रुपये के लिए उनकी भ्रूण हत्या करने में मदद करते हैं. हत्यारे माता-पिताओं की पुर्लिंगी कामना कि बेटा ही हो, शहरी लोगों को हास्यास्पद लगती है और उनके पिछड़ेपन पर घिन आती है. यही वह कोना है जो सत्यमेव जयते ने बनाया और लोगों के मन के सोए हुए भावों को जगाया. जिन लोगों ने कन्याभ्रूण हत्या कराई उनके मन पर इस शो को देख क्या गुजरी होगी, यह बात गूंजती रह गई.

वे लड़कियां जो मारे जाने से बच गई वे इस कहानी का दूसरा पूरक रहीं. वे माता-पिता जो अचानक ‘मारने’ के निर्णय को बदलकर कन्या को संसार में आने देने की ओर मुड़े वे धन्यवाद के पात्र हुए. इस तरह आमिर खान के ‘सत्यमेव जयते’ में कन्याभ्रूण हत्याओं का सत्य उजागर हुआ. शो अच्छी तरह से डाक्यूमेंटेड रहा और सबके ऊपर आमिर खान की अभिनीत उपस्थिति रही और उनसे भी ऊपर उन स्पांसरों की बार-बार की विज्ञापन की ताकत रही, जो हर ब्रेक के बाद आते रहे. ये छह-सात बड़ी कंपनियां थीं जो इस कार्यक्रम की मुख्य प्रायोजक रहीं. एक बड़े चैनल ने इस कार्यक्रम के बीच में अन्य उपभोक्ता ब्रांडों के विज्ञापन दिखाए और जमकर कमाई की. देश भर में बैठे दर्शक उनके उपभोक्ता बने.

इस शो का प्रचार हफ्तों पहले टीवी पर और प्रिंट में शुरू हुआ. आमिर खान आते रहे, अपने शो के बारे में बताते रहे. सत्यमेव जयते की कैच लाइन ध्यान देने योग्य रही- अखबारों के फ्रंट कवर पर आमिर होते. उनके नीचे एक बड़ी मोबाइल कंपनी होती. बाकी की और कंपनियां होतीं. कैच लाइन बड़े अक्षरों में लिखी आती, ‘दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी’.

‘बात बनेगी’ बहुलार्थक है. इस एक मुहावरे में कई तरह के मानी हैं. दर्शकों के लिए जो ‘बात बननी’ है, वही बात कारपोरेट के लिए ‘नहीं बननी’ है. अगर यह कार्यक्रम दिल को छूता है तो कारपोरेट की ‘बात बनती’ है. चूंकि कार्यक्रम ‘कारपोरेट सोशल रिसपांसीबिलिटी’ निभाने का संदेश है और फिल्मी दुनिया के सबसे सस्टेनेबल और महंगे ब्रांड अंबेसेडर इस सामाजिक जिम्मेदारी को पेश करने आ गए हैं, इसलिए ‘बात जरूर बनेगी’.

और तय मानिए कि आमिर ने जिस तरह से शो को शूट किया, जिस तरह से उसे सहज भावांदोलित करने वाला बनाया और जमाया, उसमें वे सफल रहे. उन्हें वालीवुड का ‘मिस्टर परफेक्ट’ कहा जाता है. उनके शो में कहीं कमीं नहीं थी, झोल नहीं था. डेढ़ घंटे के कार्यक्रम में एक समस्या और उसका मानवीय समाधान बहता रहा. किसी बड़ी कहानी की तरह वह नजर आया.

आमिर अच्छे प्लानर हैं. सालों पहले किसी चीज पर काम करना शुरू कर देते हैं. अन्ना के साथ रामलीला मैदान में मंच पर देर तक बैठकर उन्होंने उस मंच के जरिए अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता जताई जो उन्हें अन्य हीरोज से अलग करती गई.

आमिर हर अवसर को अपने पक्ष में मोड़ने में माहिर रहे हैं और सबसे बड़ी बात कि इस विवादाकुल समय में वे विवादों से बाहर और ऊपर रहे हैं. उनकी पिछली फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ ने उन्हें पढ़े-लिखे युवा शहरी मिडिल क्लास के बीच लोकप्रिय बनाया. ‘तारे जमीन पर’ देख लोग उनकी संवेदनशीलता की कद्र करने लगे हैं. ये गुण कारपारेट से छिपे नहीं रहते. उनकी नजर काम के आदमी पर तुरत पड़ती है, जैसे आमिर पर पड़ी.

इस शो में उनकी आंखों के आंसू उनकी संवेदनशीलता का ब्रांड बने. यह महत्वपूर्ण है. जिस समय में कोई रोता नजर नहीं आता उस समय में वे समाज की दुर्दशा पर रोते नजर आए. समाज सुधरे, लोगों की चेतना बदले, लेग कन्याभ्रूण को न मारें; यह संदेश उनका अपना बन गया.

लेकिन इस सबके आगे की कहानी कारपोरेट के हाथों में बिकी. कारपोरेट ने उस जगह को छेक लिया जिसमें कभी समाज सुधारक, प्रचारक, संगठनकर्ता अपने विचारों के जरिए नवजागरण की प्रेरणा के जरिए सुधारभाव का निर्माण करते थे. लोगों के दिल से बात करते थे. लोगों का हृदय परिवर्तन होता था और लोगों का व्यवहार बदलने लगता था. अब वह सुधारवादी दौर नहीं रहा. इस शून्य को भरने के लिए कारपोरेट आ गए.

अगर कन्याभ्रूण हत्या का कानून कड़ाई से लागू होता, माता-पिता लड़के-लड़की में फर्क न करते होते, डाक्टर अपना जनहित धर्म निभाते तो आमिर को या उनके पीछे खड़े कारपोरेटों को इस शो को प्रायोजित करने की जरूरत नहीं होती. यह इतना हिट न होता. इससे नतीजा निकलता है कि जब जनसंस्थान-जनआंदेालन बेकार हो गए हों तब ‘समाज को जगाने’ कारपोरेट निकल पड़े हैं. ‘पूंजीवाद जगाता है’ यह सुना था लेकिन आज का निर्मम लुटेरा मारकेट पूंजीवाद किसी को जगाएगा, इसमें संदेह बना रहता है.

इसलिए हमारा कहना होगा कि आप आमिर को भी क्रिटीकली देखें. ‘सत्यमेव जयते’ सत्य का बिजेनस है, इसे भी न भूलें. यह बिजनेस तभी चलता है जब कारपोरेट का ‘समाज हितकारी अवतार’ बन कर आता है. हर ब्रांड आपकी तकलीफ दूर करने की गारंटी लेता है न! सो, आमिर का सत्य भी तकलीफ दूर करने का आासन देता है. आप इससे ज्यादा की उम्मीद करेंगे तो निराश होंगे.

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