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15 Apr 2012 12:36:30 AM IST
Last Updated : 15 Apr 2012 12:36:30 AM IST

हंसो कि हंसना मना है

सुधीश पचौरी
लेखक
हंसो कि हंसना मना है
हंसो कि हंसना मना है

 

ममता को एक अंग्रेजी संपादकीय में ‘टिनपॉट टाइकून’ कहा गया है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के  कार्यकर्ताओं ने एक ऑनलाइन कार्टून से नाराज होकर एक प्रोफेसर के खिलाफ मानहानि का आरोप लगाया. पुलिस ने एक रात के लिए कॉटरूनकार को गिरफ्तार किया. बाद में वह जमानत पर छूटा. तबसे अब तक मीडिया में ममता के उपहासास्पद एक्शन को लेकर चरचाएं जारी हैं. जिस कार्टून को वे नापसंद करती थीं,  वही कार्टून हर जगह छप गया. फेसबुक पर तो मारामारी जारी ही थी अब संपादकीयों तक में ममता के इस एक्शन पर नाराजी भरे कटाक्ष हो रहे हैं.

साथ ही पहले पेज की बड़ी खबर में उस कार्टून  को संदर्भ सहित छापा गया है. संदर्भ बड़ा मजेदार है. सत्यजित रे की रहस्यकथा ‘सोनार केल्ला’ का संकेत है. इसका नायक  छह-सात साल का बच्चा है, जिसका नाम मुकुल है.

उसकी कल्पना में एक सोने का किला आता-जाता है. ऐसा लगता है कि पहले जन्म में मुकुल ने इस किले को देखा था, वह उसकी खोज में निकल पड़ता है. किले में एक दुष्ट आदमी  रहता है, जिसका नाम डॉक्टर हाजरा है. वह ‘पारासाइक्लोजिस्ट’ है. वह मुकुल के साथ रहता है. मुकुल उसे किले की एक चोटी से फेंक देता है और कहता है ‘दुष्टो लोक वेनिश’ यानी ‘बुरा आदमी गायब हो गया’.

कार्टून ‘रेखांकन’ नहीं ‘चित्रात्मक’ है. भारतीय रेल का चिह्न सोने के रंग में दाएं छपा है. उसके बाएं ममता और नए रेल मंत्री मुकुल राय खड़े हैं. ममता मुकुल से पूछती हैं : मुकुल क्या तुम्हें सोनारकेला नहीं दिख रहा? नीचे मुकुल का चित्र है जिसके आगे दिनेश त्रिवेदी का चित्र छपा है, इसे देख मुकुल कहते हैं कि ‘अरे वो दुष्ट आदमी है.’ नीचे ममता का चित्र है, जिसमें वे कहती हैं : ‘दुष्ट आदमी? गायब’! सच बात तो यह है कि यह चित्र काटरून से भी कुछ खास नहीं कहता.

चित्रों के सामने जो लिखा है, उसमें सत्यजित रे के सोनार केल्ला की कहानी के नायक मुकुल और ममता द्वारा रातों रात बनाए नए  रेल मंत्री मुकुल के नाम में साम्य है. इसके कारण कहानी के दुष्ट आदमी ‘हाजरा’ दिनेश त्रिवेदी बन जाते हैं, जो मुकुल के सोने के किले यानी रेल को परेशान करते रहते हैं. ममता जी त्रिवेदी जी को देख कहती हैं कि दुष्ट आदमी? गायब! यह  त्रिवेदी को हटाने का संकेत है. कायदे से इस कार्टून से त्रिवेदी को नाराज होना चाहिए था; वे न हुए. ममता नाराज हुई. संग में उनके कार्यकर्ता नाराज हुए.

यह समूचा प्रसंग ही चुटकुले की मानिंद है. ममता जी ने तो साक्षात चुटकुला बनाकर मजाक किया है उनके ‘आबरा का डाबरा गिली गिली फू’ के कहते ही एक बजट पेश करने वाला मंत्री गायब हो जाता है और उसकी जगह दूसरा मंत्री आ जाता है. कार्टून ममता जी की ‘आबरा का डाबरा गिली गिली फू’ राजनीतिक शैली पर केंद्रित है. वह उनकी ताली बजाते ही बदल देने वाली शैली पर चोट करता है. यह कार्टून सिर्फ यही नहीं करता. वह कुछ और भी करता है. वह ममता की ताकत को भी बताता है.

वह यूपीए टू की मजबूरी को भी संदर्भित करता है. वह हमारी राजनीति के भीतर पनप गई क्षुद्रताओं और अनित्यताओं की ओर संकेत करता है. यह समग्र राजनीतिक स्थिति ही एक महाकामेडी की तरह है. कार्टून पढ़ने वाले के लिए कोई भी काटरून ‘एकार्थी’ नहीं होता. कार्टून में पात्र बनना महत्त्व की बात है. यहां तक कि जब आपकी कोई बेवकूफी अहम हो जाती है तो वही आपको मशहूर करने लगती है.

ऐसी बेवकूफियां मीडिया का भोजन होती है क्योंकि उसके पाठक-दर्शक ऐसे विद्रूपों के लिए तरसते हैं. मीडिया ने जो मनहूसियत, नकली गंभीरता और नकली चिंतन का माहौल बनाया है, वह  हास्यविहीन और बीमार सा लगता है. पहले से बताई जा सकने वाली सपाट किस्म की स्कूली प्रतियोगिताओं के स्तर की हाहाकारी बहसों को मीडिया ने आदर्श विचार-विमर्श की तरह बनाया है.

आम पाठक आम दर्शक उन हल्के प्रसंगों को देखने पढ़ने को तरस जाता है, जो उसकी समझ के अनुसार हर महानता के ड्रामे के पीछे काम करते रहते हैं. ऊपर की खुशबू के नीचे की बदबू को जनता पहले ही पढ़ लेती है और पढ़ना चाहती है.

कभी-कभी जब ऐसी चीजें नहीं दबतीं तो मीडिया भी उन्हें उठा लेता है और इस तरह मामूली बातें और भी मामूली होकर बेकार हो जाती हैं. मीडिया में खुद सही जगह पर हंसने की तमीज नहीं है.

आप बताइए कि एनडीटीवी के गुस्ताखी माफ, आईबीएनसेवन के 2जी, सीएनएन-आइबीएन (अंग्रेजी) पर साइरस भडूचा के कटाक्ष शो ‘द वीक दैट वाज नॉट’ और विनोद दुआ के बुलेटिन के बीच की अपनी व्यंजनात्मक छींटाकशी को छोड़ कौन ऐसा एंकर है; जिसमें कुछ हल्के-फुल्के प्रसंग पैदा कर कथित भारी-भरकम राजनीति और उसकी फूली हुई महानता के बोझ से हल्का करने की कोशिश होती हो.

‘गुस्ताखी माफ’ एक निराला ‘पपेट शो’ है, जिसमें देश-विदेश के तमाम बड़े नेता कार्टून बने नजर आते रहे हैं. लालू की लाठी-गमछा तो इसका ट्रेडमार्क है. लालू अकेले ऐसे नेता हैं, जो अपने ठेठ भोजपुरी अंदाज में हंसते हुए सबकी खिंचाई करते हैं और अपनी खिंचाई पर कभी नाराज नहीं होते बल्कि उसे एंजॉय करते हैं. उनकी टक्कर का दूसरा नेता नहीं, जो अपने यहां की नाटकीय राजनीति को उसकी कथित सामाजिकता और महानता के बोझ से हल्का करके चलता है.

गुस्ताखी माफ में सोनिया गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक पर कटाक्ष रहते हैं लेकिन किसी ने आज तक कोई आपत्ति नहीं जताई. इससे इनका कद बढ़ा ही. ‘जनतंत्र में इतना तो चलता है’ यह भाव जिस नेता ने जान लिया, वही ज्यादा चलता है. जो नेता अपनी राजनीति के नाटकीय बोझ को हल्का नहीं  कर सकता  वह जनता के बोझ को क्या हल्का करेगा?

इस मामले में हमारा मीडिया भी ‘जोक और जनतंत्र’ के बीच सही संबंध नहीं समझ पाया है. मनोरंजन के नाम पर जिस तरह के कामेडी शोज आजकल आते हैं; वे न केवल फूहड़ होते हैं बल्कि एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए होते हैं. उनमें बढ़ती अश्लीलता और निहित हिंसा नजर आती है. आप ‘बतबढ़’ और हास्य में फर्क नहीं कर पाते. मीडिया में नकली गंभीरता व्यापी हुई है.

एंकरों के घमंडी चेहरे उनकी दपरेद्धत बॉडी लैंग्वेज, उनकी आयोजित चरचाओं में नकली हाई मिडिक्लासी हंसी उन्हें सहज इंसान तक नहीं रहने देती. हमारे कथित चिंतक चरचाकार टीवी पर आकर अपनी ओपिनियन को सुकरात के विचार से कम नहीं मानते. मीडिया चाहे तो इस नकली गंभीरता को छोड़कर स्वस्थ गांभीर्य और स्वस्थ हास्य का मिक्स संभव कर सकता है.


 

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