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जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और फिलवक्त केंद्रीय मंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने फिर कहा है कि पंडितों के पुनर्वास के बिना कश्मीर अधूरा है. फारूक शायद इस भ्रम में हैं कि लोगों की याददाश्त कमजोर है पर उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि जब उनके घर के सामने सितम्बर, 1989 में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टीकालाल टपलू की हत्या हुई थी और अलगाववादी हड़ताल तथा उग्र प्रदर्शन कर रहे थे, तभी कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन का सिलसिला शुरू हुआ था. उस वक्त जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस तथा नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन की सरकार थी और खुद फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे. लेकिन हालात को नियंत्रित करने की बजाय 20 जनवरी, 1990 को वे यकायक कश्मीर को जलता छोड़ लंदन भाग खड़े हुए थे. अभी भी एक तरह से सत्ता उन्हीं के हाथ है. कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन की सरकार है और उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री हैं लेकिन हकीकत यह है कि कश्मीर के नेता पंडितों की बहाली का विलाप तो करते हैं, किंतु ऐसी कोई कारगर पहल नहीं करते जिससे पुनर्वास का सिलसिला शुरू हो. कश्मीरी अल्पसंख्यकों के पुनर्वास की आस तब भी जगी थी जब हुर्रियत कांफ्रेंस के कट्टरपंथी गुट के अध्यक्ष सैय्यद अली शाह गिलानी ने विस्थापितों को कश्मीर लौटने संबंधी बयान दिया था. गिलानी ने केंद्र व राज्य सरकार के उस सुझाव को भी दरकिनार किया था, जिसमें विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से सुरक्षित क्षेत्र बनाने की पहल की जा रही है. गिलानी ने यहां तक कहा था कि पंडितों को वादी में अलग आवासीय बस्ती बनाकर देने से तो यह अर्थ निकलेगा कि सरकार दोनों समुदायों को गुटों में बांटकर राजनीतिक खेल खेलना चाहती है. ऐसा होता है तो इससे कटुता का विस्तार होगा. हम चाहते हैं कि पंडित भाई दो दशक पहले की तरह समरसता और समभाव के माहौल में रहें. वे अपने उन्हीं गांवों, कस्बों और शहरों में रहें, जहां के वे पुश्तैनी वाशिंदे हैं. गिलानी ने तो यहां तक कहा था कि आप भले ही घाटी में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन आप हमारे बंधु हैं. लेकिन इस बयान के बावजूद उमर अब्दुल्ला सरकार ने विस्थापित पंडितों को कश्मीर में वापस बुलाने के बाबत खास रुचि नहीं दिखाई. पंडितों के विस्थापन के दो दशक बाद किसी कट्टरपंथी गुट के मुखिया का यह पहला बयान था जिसमें पंडितों से कश्मीर लौटने की अपील की गई थी. अन्यथा इसके पहले इस दिशा में जितने भी उपाय किए गए, उनमें अलगाववाद को पुष्ट करने, कश्मीर को और अधिक स्वायत्तता देने और पंडितों के लिए केंद्र शासित अलग से राज्य बना देने के प्रस्ताव ही सामने आते रहे हैं. एक संप्रभुता वाले राष्ट्र-राज्य की संकल्पना वाले नागरिक समाज में न तो ऐसे प्रस्तावों से पंडितों की समस्याएं हल होने वाली हैं और न ही कश्मीर का धर्मनिरपेक्ष चरित्र बहाल होने वाला है, जो भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है. 1990 में शुरू हुए पाक प्रायोजित आतंकवाद के चलते घाटी से कश्मीरी पंडितों को बेदखल करने की सुनियोजित साजिश रची गई थी. इस्लामी कट्टरपंथियों का मूल मकसद घाटी को हिंदू-विहीन कर देना था. इसमें वे सफल भी रहे. देखते-देखते वादी से हिन्दुओं का पलायन शुरू हो गया और वे अपने ही राज्य में शरणार्थी बना दिए गए. फिलहाल पूरे जम्मू-कश्मीर में करीब 45 लाख कश्मीरी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से 7 लाख से भी ज्यादा विस्थापन का दंश झेल रहे हैं. कश्मीर घाटी में विस्थापितों का संगठन अलग से ‘पनुन कश्मीर’ राज्य बनाने की मांग उठाता चला आ रहा है. हालांकि पनुन कश्मीर के संयोजक अग्नि शेखर पृथक राज्य की बजाय घाटी के विस्थापित समुदाय की सुरक्षित वापसी की मांग अरसे से कर रहे हैं. फारूक अब्दुल्ला और गिलानी भी इसी सुर में सुर मिलाते रहे हैं. हाल में नौकरी के बहाने तकरीबन 350 युवक-युवतियों की घाटी में वापसी भी हुई है. यदि उमर अब्दुल्ला सरकार इनका पुश्तैनी घरों में पुनर्वास करने की मंशा जताती तो वाकई कश्मीर के विस्थापित हिन्दुओं के लौटने की उम्मीद बढ़ जाती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. दुर्भाग्य से उमर सरकार जब से कश्मीर में वजूद में आई है तब से ऐसी कोई राजनीतिक इच्छा-शक्ति जताती नहीं दिखी, जिससे विस्थापितों के पुनर्वास का मार्ग सरल होता. केंद्र सरकार द्वारा 25 अप्रैल, 2008 को विस्थापितों के पुनर्वास और रोजगार हेतु 1618.40 करोड़ रुपए मंजूर किए गये थे, किंतु राज्य सरकार ने इसका कतई उपयोग नहीं किया. इस बारे में उमर अब्दुल्ला का बहाना है कि अमरनाथ यात्रा के लिए जो भूमि आंदोलन चला था, उस वजह से आवास और रोजगार के कार्यों को आगे नहीं बढ़ाया जा सका. कश्मीर में कमोबेश शांति के बावजूद पुनर्वास के कोई ठोस उपाय सामने नहीं आए. ऐसा नहीं है कि फारूक अब्दुल्ला को कश्मीरी विस्थापितों की बेहतरी का अवसर न मिला हो. बतौर मुख्यमंत्री दिसम्बर, 1996 में उन्होंने कहा था कि पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है और आने वाले दो वर्षो में सभी का पुनर्वास कर दिया जाएगा. इसके बाद फारूक छह साल मुख्यमंत्री रहे लेकिन एक भी परिवार का पुनर्वास नहीं करा पाए. उलटे इस दौरान विस्थापन का सिलसिला जारी रहा. विस्थापित परिवारों की संख्या 27 हजार से बढ़कर 32 हजार हो गई. इनमें तीन हजार कश्मीरी मुसलमान परिवार भी शामिल हैं. अब जब कश्मीर में उनके पुत्र मुख्यमंत्री हैं और वे कश्मीरी अल्पसंख्यकों के पुनर्वास की बयानबाजी कर रहे हैं, तब उमर अब्दुल्ला के तीन सालों के कार्यकाल में विस्थापित परिवारों की संख्या 32 हजार से बढ़कर 38 हजार से भी ज्यादा हो गई है. इस तथ्य की पुष्टि इस बात से होती है कि केंद्र सरकार से विस्थापित परिवारों को जो राहत राशि मिलती है, वह भी 65 करोड़ से बढ़ाकर 90 करोड़ कर दी गई है. जाहिर है, चाहे फारूक अब्दुल्ला हों अथवा गिलानी, कश्मीरी अल्पसंख्यकों का घाटी में वापसी का विलाप एक नाटकीय पाखंड के अलावा कुछ नहीं है.
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