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इधर यू पी में पूरी रौनक जमी है जी. शुरू में जिस तरह करोड़ों में नोट जब्त होने लगे थे, उससे लग रहा था कि यूपी का चुनाव भी तमिलनाडु टाइप होने जा रहा है. मानो लग रहा था कि खूब नोट बंटेंगे. हालांकि नोटों की जब्ती पर थोड़ा कंफ्यूजन भी रहा. इस तरह की खबरें भी आयीं कि जोश-जोश में एटीएम के नोट भी जब्त हो गए. खैर, बाद में पता नहीं चल पाया कि वे सचमुच एटीएम के ही नोट थे या बंटनेवाले नोट थे. क्योंकि जल्द ही नोटों की जब्ती चर्चा से बाहर हो गयी और विकास चर्चा में आ गया. यह अलग बात है कि बिना नोटों के विकास नहीं हो सकता. हजार-पांच सौ के नोट मिल जाएं तो एक-आध दिन का विकास तो हो ही जाता है. बहरहाल, यूपी के चुनाव में शुरू में नोट खूब जब्त हो रहे थे. करोड़ों में. समझ में बस यही नहीं आ रहा था कि राजा ने तो पौने दो लाख करोड़ का घोटाला किया है, सो वहां तो नोटों की कमी है नहीं, वहां बांटे जा सकते हैं पर यूपी में इतना बड़ा घोटाला किसने किया जो नोट यूं जब्त हो रहे हैं. बाद में राहुलजी ने बताया कि यहां भी घोटाला हुआ है- ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में. मनरेगा में भी घोटाले का मामला बताया गया. पर ले-देकर एक स्वास्थ्य मिशनवाला घोटाला ही इतना बड़ा घोटाला बताया गया, जो थोड़ी बहुत टू जी से टक्कर ले सकता है. अब हर कहीं तो येदियुरप्पा की सरकार नहीं होती न जी कि हर कदम पर वे टू जी को टक्कर देते नजर आएं. हालांकि राहुलजी की निरंतर शिकायत रही कि केंद्र तो खूब नोट देता है, पता नहीं कहां चले जाते हैं. खैर जी, चुनाव की रौनक ज्यों-ज्यों जमती गयी, नोटों का ज्यादा जिक्र रहा नहीं. जब्त होना भी बंद हो गया. फिर कोई खबर नहीं आयी. बस एक जयंत चौधरी के नोट बांटने की खबर आयी. पर वो हजारों में ही बताए गए. तमिलनाडु चुनाव ने नोटों का जो स्टैंर्डड तय किया था, उसका तो वह पासंग भी नहीं निकले. यह घोटालों की रुसवाई है. घोटाले कम से कम चुनाव में दिखने चाहिए. चुनाव में पता चलना चाहिए कि हां भई, करोड़ों के घोटाले हुए हैं. देख लो, अभी तक बंट रहे हैं. चुनावों में जो दूसरी चीज बंटती है, वह शराब है. यह नोटों से पहले से बंटती आ रही है. शायद आगे भी बंटती रहेगी. कभी चलन से बाहर नहीं होती. पर उसके बंटने का भी बहुत जिक्र नहीं आया. हां, किसी शराब व्यापारी का जिक्र जरूर आया जिसके यहां रेड भी पड़ी. आरक्षण ने भी खूब जमायी. आरक्षण देने का जोश इतना दिखाई दिया, जितना शायद मंडल के जमाने में भी नहीं दिखाई दिया होगा. नेताओं ने चुनाव आयोग की परवाह ही नहीं की. जोश इतना था कि बोले, चाहे फांसी चढ़ा दो, आरक्षण तो दिलाकर रहेंगे. फांसी चढ़ने का ऐसा जोश स्वतंत्रता आंदोलन के बाद पहली बार देखने को मिला. पर फिर ऐसा पंगा पड़ा कि शिकायत राष्ट्रपति तक पंहुच गयी. सलमान खुर्शीद साहब ने जैसे-तैसे माफी मांगी तो बेनी बाबू को जोश आ गया. मंडल का मुकाबला कमंडल से करनेवाले भाजपाइयों को कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने चुनाव के सांप्रदायीकरण का आरोप लगा दिया. सांप्रदायीकरण का आरोप हमेशा उन्हीं पर क्यों लगे. वे भी तो दूसरों पर लगा सकते हैं. उन्होंने लगाकर दिखा दिया. ऐसा जोश न हो तो चुनावों में रौनक नहीं जमती. राहुलजी में गजब का जोश दिखा. वे सभाओं पर सभाएं करते रहे हैं. नाराज होते रहे हैं. गुस्सा करते रहे हैं. गुस्से में एक बार तो कागज फाड़ने की हद तक चले गए. पहले खबर आयी कि उन्होंने किसी का घोषणापत्र फाड़ दिया, जो वादे किए गए, उनकी सूची फाड़ डाली पर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं निकला. सिर्फ उनका गुस्सा ही निकलता दिखा. जैसी रौनक उनके गुस्से ने जमायी, वैसी ही प्रियंकाजी की मुस्कुराहट ने भी जमायी. उनके अपनापे भरे प्रचार ने जमायी. पर दूसरे भी रौनक जमाने में पीछे नहीं रहे. यूपी में हर कोई जैसे विकास करने पर अड़ा है. लगता है जैसे बंदा विकास करे बिना मानेगा नहीं. कमी बस नरेंद्र मोदी की ही रह गयी. वे भी आ जाते तो रौनक और जमती. अलबत्ता फिल्मी कलाकारों ने उनकी कमी पूरी करने की कोशिश की. पर वह हो नहीं सकती. क्योंकि इस बार फिल्मी कलाकार भी कांग्रेस के साथ ही ज्यादा हैं.
vvv
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