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दुनिया के तीन-तीन देशों में इस्राइल के राजनयिकों पर हुए दहशतगर्द हमलों ने अचानक पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर से ईरान की तरफ खींच दिया है. इस संदर्भ में भले ही यह आरोप प्रमाणित करना कठिन है कि इस आतंकी हमले की जिम्मेदारी ईरान की सरकार की है पर इतना साफ है कि इन घटनाओं का सीधा संबंध उस देश के परमाणविक कार्यक्रम से जरूर है. अरसे से इस्राइल तथा अमेरिका ईरान को इस बात की धमकी देते रहे हैं कि यदि उसने अपने परमाणु ऊर्जा संबंधी कार्यक्रम पर रोक नहीं लगाई तो इसके परिणाम किसी भी रूप में अनुकूल नहीं होंगे. गौरतलब है कि इराक में सत्ता परिवर्तन के लिए नाजायज सैनिक दखलंदाजी की भूमिका बनाते वक्त भी ऐसा ही सब किया गया था. व्यापक नरसंहार के हथियारों (वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन ) के निर्माण के आरोप में ही सद्दाम हुसैन को सत्ता से ही नहीं, अपनी जान तक से हाथ धोने पड़े थे. विडम्बना यह है कि अपने आप बेहिचक एटमी हथियारों का इस्तेमाल करने वाला अमेरिका दूसरे देशों की स्वाधीनता-संप्रभुता को किसी रूप में स्वीकार नहीं कर सकता है. यहां तक कि उसे यह भी गवारा नहीं है कि कोई देश अपने यहां शान्तिपूर्ण उपयोग जैसे स्वास्थ्य क्षेत्र में कैंसर के इलाज या ऊर्जा उत्पादन के लिए परमाणु संबंधी शोध कर सकें. जहां तक किसी इस्लामी देश के द्वारा निर्मिंत एटम बम के कट्टरपंथी आतंकवादियों के हाथ में पड़ने के जोखिम का सवाल है तो इसे किसी भी रूप में नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि पाकिस्तानी परमाणविक तस्करी की अनदेखी अमेरिका अपने राष्ट्रहित की रक्षा के लिए खतरनाक तरीके से करता रहा है. बहरहाल, यह अलग से चर्चा का बड़ा प्रश्न है. इस उलझे हुए मुद्दे को समझने के लिए यहां एक दूसरी बात को रेखांकित करना भी बेहद जरूरी है. ईरान के परमाणविक कार्यक्रम में बाधा डालने के लिए बदनाम इस्राइली गुप्तचर सेवा मोसाद खुद ईरान में घुस ईरानी वैज्ञानिकों की हत्या दहशतगर्द तरीके से ऐसे ही चिपकू बमों से करती रही है. उसने बड़े अहंकार के साथ एकाधिक बार यह एलान भी किया है कि उसकी दूरमारक संहारक क्षमता कितनी असरदार है. यहां हम इस्राइल के हाथों दशकों से जारी फिलस्तीनियों के वंशनाश या लेबनान में उस राष्ट्र-राज्य के आतंकवादी आचरण का बखान नहीं कर रहे. हम तो सिर्फ यह याद दिला रहे हैं कि वह इस घड़ी विभर को आक्रमण का नहीं, प्रतिशोध का ही शिकार नजर आ रहा है. एक सरकारी अमेरिकी प्रवक्ता ने यह सुझाव देने भी में देर नहीं लगाई कि अब इस्राइल ज्यादा धैर्य नहीं रख सकता. अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उसे ईरान के परमाणविक ठिकानों को निशाना बनाना ही होगा. कुछ विद्वानों का तो यह भी मानना है कि संभव है खुद मोसाद ने ही इन भड़काने वाली घटनाओं को अंजाम दिया हो ताकि बदले की जवाबी कार्यवाही को जायज ठहराया जा सके. इस परिप्रेक्ष्य में एक बार फिर इराक तथा लीबिया के घटनाक्रम को याद करने की सख्त जरूरत है. जहां तक पश्चिम एवं इस्लामी जगत की मुठभेड़ का प्रश्न है तो तथाकथित अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी विसनीय नहीं समझा जा सकता. उसके द्वारा एक प्रायोजित तरीके से किसी भी देश के राक्षसीकरण का अभियान चलाया जा सकता है. इस मामले में आसानी यह है कि ईरान एक शिया बहुल इस्लामी राष्ट्र है जिसका पारंपरिक बैर सुन्नी शाखा वाले अरबों से रहा है. सऊदियों को ईरानी हमेशा से हिकारत भरी नजरों से देखते रहे हैं. इस बात को नकारना नामुमकिन है कि उनकी तुलना में सऊदी सांस्कृतिक विरासत से वंचित बर्बर ही दिखते हैं. अटपटी बात यह है कि शाह के शासन काल में शीत युद्ध के दौर में सऊदी अरब, ईरान तथा इस्राइल एक साथ अमेरिका के सैनिक गठबंधन में साझीदार रह चुके हैं. बहरहाल, इस घड़ी ईरान ने यह साफ कर दिया है कि वह इस्राइल या अमेरिका की धमकी के सामने किसी भी रूप में घुटने टेकने वाला नहीं. बल्कि उसने यूरोप के छह देशों के लिए किये जाने वाले तेल के निर्यात पर रोक लगाकर विरोध और विद्रोह के साफ-साफ संकेत भी दे दिये हैं. इस रूप में ईरान ने अपने खिलाफ लगाये पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों के प्रतिकार का कड़ा तरीका अपनाया है. अभी भले ही यूरोप इसे मात्र धौंस समझ रहा हो लेकिन देर-सबेर इसका असर उसकी पहले से ही मंदी की चपेट में खस्ता हाल हो चुकी अर्थव्यवस्था पर किसी न किसी रूप में जरूर पड़ेगा. यही नहीं, अमेरिका तथा इस्राइल इस समय ईरान को चीन की ओर से मिलने वाले समर्थन की भी अनदेखा नहीं कर सकते हैं. जहां तक भारत का सवाल है तो उसके लिए यह घटनाक्रम जानलेवा दुविधा पैदा कर रहा है. आजादी के बाद से अब तक हमारा देश फिलिस्तीनियों का समर्थक रहा है. इस्राइल के साथ उसके संबंध हाल में ही सामान्य हुए हैं. चुनाव के दवाब में हमारी केन्द्र सरकार इस समय ईरान की रत्ती भर आलोचना का जोखिम नहीं उठा सकती है, न ही कट्टरपंथी इस्लामी दहशतगर्दी के खिलाफ जंग में इस्राइल से मिलने वाली मदद को ताक पर रख सकती है. भारत अपनी जरूरत के तेल का 12 प्रतिशत ईरान से आयात करता है. मध्य एशिया तक हमारे तमाम रास्ते भी ईरान होकर ही गुजरते हैं. अगर अफगानिस्तान में हम कोई सार्थक भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा रखते है तब भी ईरान सबसे अहम मददगार साबित हो सकता है. इसीलिए हम ना नुकुर करते हुए अब तक अमेरिका के बढ़ते दवाब के बावजूद ईरान का आर्थिक बहिष्कार करने से कतराते रहे हैं. गौरतलब हो कि यहां हम उसके साथ के अपने हजारों सालों के पुराने सांस्कृतिक रिश्तों का नाममात्र को भी उल्लेख नहीं कर रहे. वास्तव मे ईरान का प्रसंग भारत के भविष्य के साथ घनिष्ठ और जटिल रूप से जुड़ा है. यही कसौटी तय करेगी कि हमारी सरकार किस हद तक अमेरिका का दबाव बर्दाश्त कर अपनी विदेश नीति को स्वाधीन रख सके. ऊर्जा सुरक्षा हो या अपने आर्थिक हितों की रखवाली, वह अपनी महत्वाकांक्षा के अनुरूप आचरण करती है. तटस्थता या निरपेक्षता देर तक साथ नहीं देनेवाली.
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