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उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हर साल बीस हजार महिलाएं बलात्कार की शिकार हो रही हैं और विगत की तुलना में ये आंकड़ें बढ़े हैं. बलात्कार के विरुद्ध सीमित तथा अपर्याप्त कानूनी परिभाषा में परिवर्तन की जरूरत पर एक सत्र अदालत ने जोर देते हुए कहा कि इसमें अन्य कई प्रकार के यौन अत्याचारों को शामिल किया जाना चाहिए. अदालत के मुताबिक भारतीय दंड विधान की धारा 376 की सीमाओं के कारण यौन अत्याचारी बच निकलते हैं. दिल्ली की रोहिणी अदालत में जज कामिनी लॉ के सामने आए अस्सी साल की एक बुजुर्ग पीड़ित महिला के केस की सुनवाई के दौरान उन्होंने यह आदेश दिया. बुजुर्ग महिला के साथ हुए अत्याचार को उन्होंने डिजिटल रेप की संज्ञा भी दी. अक्सर बुजुर्ग महिलाएं या छोटी बच्चियां इसी प्रकार के अत्याचार का शिकार होती हैं और कानून के मुताबिक मेडिकल जांच में जिसे बलात्कार माना जाता है उसकी पुष्टि न होने पर केस नहीं बनता. आईपीसी की धारा 377, जो अप्राकृतिक यौन अत्याचार के विरुद्ध बनी है, वह भी ओरल और डिजिटल रेप को ठीक से समाहित नहीं करती है. एडिशनल सेशन्स जज डॉ.कामिनी लॉ ने भारतीय कानून निर्माताओं से कहा है कि वे बलात्कार को फिर से परिभाषित करें तथा इसके विरुद्ध कानून बनाने की दिशा में जरूरी कदम उठायें. राष्ट्रीय महिला आयोग में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हर साल बीस हजार महिलाएं बलात्कार की शिकार हो रही हैं और विगत की तुलना में ये आंकड़ें बढ़े हैं. सब जानते हैं कि ऐसे अपराध के जितने मामले दर्ज होते हैं, उनकी तुलना में कई गुणा अधिक आंकड़े होते हैं. दिल्ली की ही बात करें तो हर साल यहां पांच सौ से छह सौ तक बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं और देश भर में यह आंकड़ा ग्यारह हजार की संख्या पार करता है. 2002 में एक राष्ट्रीय पत्रिका के सर्वेक्षण के आधार पर खुलासा हुआ था कि हर 35 मिनट में एक औरत बलात्कार की शिकार होती है. लाजिमी है कि कानून में बलात्कार की परिभाषा में सुधार होता है तो इस संख्या में भी उछाल आएगा. दरअसल काफी लम्बे समय से हमारी विधायिका से यह मांग होती रही है कि वह बलात्कार विरोधी कानून को व्यापक बनायें. कस्टोडियल रेप के अनेक मामले कानून की सीमा के कारण खारिज हो जाते हैं. मालूम हो कि विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट ने ही (20 मार्च 2000) बलात्कार की परिभाषा में दिखनेवाली खामी की तरफ ध्यान दिलाया था. विधि आयोग की प्रस्तुत रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 13 जनवरी 1998 को एक याचिका के सम्बन्ध में जारी निर्देश के बाद सामने आयी थी. पिछले दिनों देश की अग्रणी नारीवादियों एवम वकीलों ने कानून मंत्री वीरप्पा मोइली के नाम खुला पत्र जारी कर बलात्कार के विरुद्ध लागू वर्तमान कानूनों की समीक्षा के लिए विशेष पैनल बनाने और महिला संगठनों के साथ बहस मुबाहिसा आगे बढ़ाने की मांग की. बलात्कार की मौजूदा परिभाषा के मुताबिक पुरुष लिंग द्वारा स्त्री का योनिभेदन ही बलात्कार माना गया है. यह परिभाषा यौन अत्याचार के लिए लकड़ी, उंगली या अन्य किसी वस्तु के प्रयोग को बलात्कार में शामिल नहीं करती. वैवाहिक सम्बन्धों में बलात्कार के मसले का भी कोई समाधान नहीं दिया गया है. सुश्री कामिनी लॉ के सामने आए मामले में 19 वर्षीय अभियुक्त ने 80 वर्षीय महिला के साथ यौन अत्याचार में लकड़ी के डंडे का प्रयोग किया था, जिसके लिए जज ने उसको दस साल की सजा सुनायी है. वैसे बलात्कार को लेकर जेंडर न्युट्रल कानून बनाने का मसला मानव संसाधन विकास मंत्रालय से सम्बद्ध संसदीय समिति की तरफ से हाल में दिए सुझावों से भी चर्चा में आ चुका है. संसदीय समिति ने यौन अत्याचार के मामलों में पुरुषों के भी पीड़ित होने की बात कही है. संसदीय समिति का सुझाव है कि पुरुषों को भी यौन उत्पीड़न के मामले में संरक्षण दिया जाए. समिति कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न विरोधी विधेयक का परीक्षण कर रही थी. उसने सरकार को इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट सौंपी है. कुछ पुरुष संगठनों ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न विरोधी कानूनो में महिला विरोधी शब्द जुड़े होने का विरोध किया है. समिति का सुझाव है कि पुरुषों के यौन उत्पीड़न का नियमित सर्वेक्षण हो तथा पीड़ित पुरुष कर्मचारी को कानूनी संरक्षण मिले. नियोक्ता या प्रतिष्ठान की वाषिर्क रिपोर्ट में पुरुषों के यौन उत्पीड़न के मामलों को भी शामिल किया जाए. पश्चिमी देशों की बात करें तो डेनमार्क, ब्रिटेन, आयरलैंड, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैंड, आदि देशों के अलावा दुनिया के कई देशों में बलात्कार विरोधी कानून जेंडर न्युट्रल हैं. वहां तो भाषा को भी अधिकाधिक जेंडर तटस्थ बनाने की कोशिशें चलती रहती हैं. यह भी माना जा सकता है कि वहां के उदाहरणों से ही यहां के कानून को भी जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग तेज हुई है. अगर हम जेंडरन्युट्रल कानून से जुड़ी बहस आगे बढ़ाएं तो यह भी पा सकते हैं कि हमारे यहां अधिकतर कानून- चाहे प्रापर्टी के अधिकार के हों या तलाक सम्बन्धी हों, स्त्री के खिलाफ जेंडर पूर्वाग्रह से लैस हैं. आधे-अधूरे कानूनों के साथ ही पितृसत्तात्मक सोच और धारणा भी पीड़ितो को न्याय नहीं मिलने देती है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मथुरा केस. 1978 में 16 वर्षीय आदिवासी लड़की मथुरा के साथ महाराष्ट्र के ठाणो पुलिस थाने में सामूहिक बलात्कार हुआ. केस चला तो आरोपितों को इस आधार पर छूट मिली कि मथुरा यौन सम्बन्ध बनाने की आदी थी. यानी कथित खराब चरित्रवाली स्त्री के साथ यौन दुराचार अपराध नहीं. इस केस के विरोध में देशभर में गुस्सा भड़का. महिला संगठनों तथा न्यायप्रिय लोगों ने जगह-जगह प्रदर्शन किया. लम्बे आन्दोलन के बाद 1983 में बलात्कार विरोधी कानून में संशोधन भी हुआ जिसके तहत बलात्कार में शील भंग शब्द की जगह यौन हिंसा कहा गया. यह सकारात्मक बदलाव तो था किन्तु अधूरा संशोधन. तभी इसमें पुन: संशोधन के रूप में पुख्ता कानून की मांग होती रही है. जेलों में बंद महिला राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ अक्सर ऐसा यौन अत्याचार होता है जो बलात्कार के रूप में साबित हो ही नहीं सकता है. रायपुर जेल में बन्द आदिवासी अध्यापिका सोनी सीढ़ह का मामला इसका ताजा उदाहरण है.
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