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शार्टकट का दौर है. संक्षिप्तता का चलन है. मसलन, जीएसएम, सीडीएमए, एटीएम, सीएफएल आदि. जो इनका उपयोग कर रहे होते हैं, वे तक नहीं जानते कि इनके फुलफॉर्म क्या हैं! छोटे रास्ते से काम बन रहा हो, तो कोई लंबा रास्ता नहीं चुनता. अब तो इंसानों के नाम भी संक्षिप्त होने लगे हैं. हमारे क्षेत्र के विधायक बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह को ही देखिए. एक जमाने में क्या ही लंबा-चौड़ा नाम हुआ करता था उनका. इसीलिए विधायक बने. पर बनने के तत्काल बाद ही किसी चमचे ने सुझाव दिया- भैयाजी, अब आप माननीय हो लिए हैं. कल को आप मंत्री भी हो सकते हैं. तब आपके नाम के आगे बाबू लगा होने से लोगों को भ्रम हो सकता है कि आप पहले किसी सरकारी दफ्तर में लगे रहे होंगे. तो इसको हटाइए. बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह बोले- वाकई तुमने उचित परामर्श दिया है. अब तो बड़े-बड़े अफसर भी मेरे सामने कुरसी छोड़कर खड़े होते हैं. इसलिए मैं आज से अपने नाम के आगे न बाबू लगाऊंगा और न किसी को लगाने दूंगा. इस तरह बाबू का परित्याग कर वे विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह शेष रह गये. विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह के विधायक बनने के लगभग दो महीनों के बाद एक और वाकया हुआ. किसी नवोदित सजातीय चमचे ने फरमाया- सर, चुनाव में धनबल, गनबल और जनबल के चलते आपकी विजय हुई थी. अब आप जीतकर निश्चिंत् हो लिये हैं. दिन-रात हम सबके विकास की सोचते रहते हैं. उधर आपके विपक्षी दल आप पर आरोप लगाने लगे हैं. वे कहने लगे हैं कि आप जन-जन के नेता नहीं हैं. अपनी जाति के ही लोगों की तरक्की की सोचते हैं. इसलिए मेरा सजेशन मानिए. अपने जातिनाम का त्याग कर दीजिए. बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह को यह परामर्श भी अति सामयिक और समुचित लगा. चुनाव हालांकि जातीय समीकरण और अपने लोगों की मेहनत के बल पर ही जीते जाते हैं, तथापि अन्य जातियों में यह संदेश नहीं जाना चाहिए. आगे भी तो जनता के बीच जाना है वोट मांगने! उस दिन के बाद से विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह का सिंह भी निकल गया. अब तो वह कदाचित लोगों की यादों के जंगल में ही मिले. इस तरह विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह घट घटाकर विश्वमोहन प्रताप नारायण हो गये. एक बार विश्वमोहन प्रताप नारायण पार्टी के आला कमान से मिलने पहुंचे. आला कमान ने कहा- विश्वमोहन प्रताप नारायण जी, बहुत लंबा नाम है आपका. यह नहीं चलेगा. आज की राजनीति को समझिए. अब पार्टियां तक सपा, बसपा, भाजपा, लोद, रालोद, कौएद, सीपीआई, सीपीएम, जदयू बोली जाती हैं. ऐसे नाम पहले भी होते थे. जयप्रकाश नारायण, विनाथ प्रताप सिंह जैसे लोकप्रिय नेता भी जेपी ओर वीपी नामों से पहचाने जाते हैं. आप भी अपने नाम को छोटा कर लें तो अच्छा रहेगा. विश्वमोहन प्रताप नारायण किस मुंह से कहते कि वे पहले ही अपने नाम का आगा-पीछा कटवा चुके. आलाकमान के सामने न किसी का तर्क चलता है, न मुंह खोलने की जुर्रत होती है. वे नतसिर बाहर निकले और घोषणा कर दी- आज से मेरा नाम विश्वमोहन हुआ. आगे मुझे इसी नाम से जाना जाए. कहते हैं, जनता की स्मरणशक्ति कमजोर होती है. वह अपने नेताओं के पिछले कृत्य भुला देती है तो भला बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह के नाम की क्या औकात? सो वे भी अपने क्षेत्र में विश्वमोहन जी के नाम से लोकप्रिय हो गये. बहुतों को तो यह तक याद नहीं रहा कि ये वाले वो ही हैं. इस बीच बाबू विश्वमोहन प्रताप नारायण सिंह ने दलबदल भी कर लिया. चेहरा-मोहरा, स्वास्थ्य, पहनावा, रहन-सहन सब बदल गये. इस बार भी विश्वमोहन जी चुनाव में खड़े हैं. और भी संक्षिप्तीकृत होकर वीएम हो गये हैं. अगर ईवीएम की कृपा हो गयी, तो फिर से एमएलए बनेंगे. सीएम ने चाहा तो वीएम मंत्रिपद की शपथ भी खा लेंगे और डीएम, एसडीएम, सीजीएम, जीएम, डीजीएम, एजीएम एएम से पीएम तक उनकी सेवा में रहेंगे.
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