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10 Feb 2012 01:39:40 AM IST
Last Updated : 10 Feb 2012 01:39:40 AM IST

उम्र विवाद की बढ़ती मियाद

कमलेश जैन
लेखक
उम्र विवाद की बढ़ती मियाद
उम्र विवाद की बढ़ती मियाद

 

आर्मी चीफ विजय कुमार सिंह (वीके सिंह) का जन्म किस वर्ष हुआ, यह एक बड़ा सवाल बन गया है .

और शायद बेवजह. 29 जुलाई, 1965 को 14 वर्षीय वीके सिंह ने यूपीएससी के फॉर्म पर हस्ताक्षर किये थे. उनकी इच्छा थी अपने पिता तथा दादा की तरह सेना की नौकरी कर देशसेवा करना. यूपीएससी का यह फॉर्म भर कर वह नेशनल डिफेंस एकेडमी में प्रवेश पा सकते थे. फार्म भरते वक्त वीके सिंह बिड़ला पब्लिक स्कूल की कक्षा दसवीं के छात्र थे. उस समय फॉर्म क्लर्क या टीचर को भरना होता था और आवेदक को उस पर मात्र हस्ताक्षर करना होता था. इसी फॉर्म में उनकी उम्र 10 मई, 1950 लिखी गई. लेकिन 11 मई, 1966 को सेना द्वारा तैयार की गई मेडिकल एक्जामिनेशन रिपोर्ट में वीके सिंह का जन्म वर्ष 1951 लिखा था. 13 जून, 1966 में सिंह की कक्षा दसवीं की मार्कशीट आ गई. इसमें भी उनका जन्म वर्ष 1951 में दिखाया गया था.

18 जून, 1966 में यूपीएससी के अंडर सेक्रेटरी श्री कृष्ण ने एक चिट्ठी लिखकर श्री सिंह से पूछा कि उनकी जन्मतिथि में यह अंतर क्यों है और सही तिथि कौन-सी है तो उन्होंने जवाब दिया कि 1950 की तिथि का होना एक लिपकीय भूल है और उनका सही जन्मतिथि वर्ष वही है जो कक्षा दसवीं की मार्कशीट में दर्ज है. 13 जुलाई, 1966 को सिंह ने एनडीए ज्वायन कर लिया. एकेडमी की बायोशीट में उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1951 ही दर्ज है. यह बायोशीट सिंह द्वारा भरी गई थी. उस समय तक उनका मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट जारी नहीं हुआ था. वीके सिंह की पर्सनल फाइल में भी 1951 ही उनके जन्म का साल दर्ज था. जून, 1970 में इंडियन मिलिटरी एकेडमी से उनको परिचय पत्र प्राप्त हुआ. इसमें उनका जन्म वर्ष 1951 दर्ज है, पर जेंटलमैन कैडेट डोसियर द्वारा भरे गए डोसियर में 1950 ही दर्ज हुआ. 1971 में सिंह को स्कूल से मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट प्राप्त हुआ. इसमें उनका जन्मवर्ष 1951 अंकित था. यही एक सर्टिफिकेट है जो हर जगह उनकी जन्मतिथि दर्शाने के लिए प्रयोग हुआ है. यह सर्टिफिकेट एडज्यूटेंट जनरल की ब्रांच में फाइल हुआ और यहां के रिकार्ड्स में 1951 ही दर्ज है.

वीके सिंह के प्रमोशन, पोस्टिंग, व्यक्तिगत रिकार्ड, व्यक्तिगत डोसियर, सर्विस रिकार्ड, आइडेंटिटी कार्ड, नॉन मिलिटरी रिकार्ड्स, पासपोर्ट, पेन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि सभी पर उनकी जन्मतिथि 1951 ही दर्ज है. गौरतलब यह है कि उन्हें कभी कोई पत्र सेना की ओर से प्राप्त नहीं हुआ जिसमें कहा गया हो कि जन्मतिथि में यह कैसी विसंगति है और इसे दूर करें. बाद में पता चला कि आर्मी के मिलिटरी सेक्रेट्री ब्रांच (एमएस ब्रांच) में कभी भी इस विसंगति की अपडेटिंग नहीं हुई. सिंह ने खुद-ब-खुद कहा भी कि इसे अपडेट करें.

वर्ष 1985 तथा 2002 में श्री सिंह ने एमएस ब्रांच का ध्यान इस ओर आकषिर्त भी किया तो उसने बताया कि एजी ब्रांच में तो जन्म तिथि 1951 दर्ज है ही. अब और कुछ करने की जरूरत नहीं है. लेकिन 20 दिसम्बर, 2007 का एक पत्र, जो मिलिटरी सर्विस सेक्रेट्री पीआर गंगाधरन का है, कहता है कि एजी ब्रांच से इस डिपार्टमेंट का कोई पत्राचार रिकार्ड में नहीं है.

मतलब यह कि वीके सिंह के आर्मी में प्रवेश करने के 35 वर्षो बाद उम्र का विवाद उभर आया. जब सिंह के आर्मी चीफ बनने का समय आया तब एमएस ब्रांच ने कहा कि उनका जन्म वर्ष 1950 है. 3 मई, 2006 में वीके सिंह के पास इस आशय का पहला पत्र एमएस ब्रांच से आया. पत्र कहता है कि एजी ब्रांच में उनका जन्म वर्ष 1951 है और उनके ब्रांच में 1950. ऐसा क्यों? 10 मई, 2006 को पत्र पाने के तीन दिनों के भीतर वीके सिंह ने पत्र का जवाब देते हुए कहा कि एजी ब्रांज में उनका जन्म वर्ष सही है इसीलिए उन्होंने एमएस ब्रांच में इसे सही कराने के लिए कोई खास प्रयास नहीं किया लेकिन अब इसे सही कर दिया जाय. सात महीनों बाद 20, दिसम्बर 2007 को लेफ्टिनेंट जनरल गंगाधरन विस्तारपूर्वक एक नोट बनाते हैं और कहते हैं कि प्रमोशन और रिटायरमेंट के लिए 1950 को ही बतौर जन्मवर्ष आधार बनाने के लिए दीपक कपूर (तत्कालीन सेनाध्यक्ष) भी इसका अनुमोदन करते हैं और यही अनुशंसा डिफेंस मिनिस्ट्री को भेज देते हैं. लगभग उसी वक्त आर्मी नेतृत्व द्वारा वीके सिंह से चिट्ठियों-फोन द्वारा कहा जाता है कि वे अपना जन्मवर्ष 1950 मान लें अन्यथा उनके विरुद्ध कार्रवाई प्रारंभ की जाएगी. उनको कमांडर नहीं बनाया जाएगा और वे आर्मी चीफ नहीं बन पायेंगे.

21 जनवरी, 2008 को गंगाधरन अधिकृत रूप से वीके सिंह से कहते हैं कि उनका जन्म वर्ष 1950 है तथा एजी ब्रांच को अपना रिकार्ड सही करने के लिए कह दिया गया है. यह समय सिंह के आर्मी कमांडर बनने का था. आर्मी चीफ बनने के लिए उनका आर्मी कमांडर होना आवश्यक था. 24 जनवरी, 2008 को वीके सिंह कहते हैं कि उन्होंने कभी भी जन्म वर्ष ठीक करने के लिए प्रार्थना नहीं की. उन्होंने अपने संपूर्ण क रियर में एक ही जन्म तिथि प्रमाण दिया और उसमें 1951 बतौर जन्मवर्ष दर्ज है. उनके सारे दस्तावेजों में यही वर्ष दर्ज है, फिर भी आर्मी के हित में जो सही हो वह करें. कुछ ही घंटों में सिंह के पास संदेश आता है कि उनका जवाब वह नहीं है जैसा प्रश्न किया गया था. वे स्वीकार करे कि उनका जन्म वर्ष 1950 है, अन्यथा उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी. जवाब देते हुए वीके सिंह ने कहा कि संस्था (सेना) के हक में लिया गया निर्णय मुझे मान्य है. 30, जनवरी 2008 को सिंह लिखते हैं कि वे अब वही जन्म वर्ष लिखेंगे जैसा कि आर्मी का निर्देश है.

यह बात नए सिरे से तब उभरी जब एक आरटीआई द्वारा मांगी गई सूचना पर कानून मंत्रालय ने जवाब दिया कि सिंह का जन्म वर्ष 1951 है. इधर ग्रिनेडियर्स एसोसिएशन (रिटार्यड आर्मी अफसरों का एक संगठन) रोहतक चैप्टर ने एक जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल कर दी. यह देखकर वीके सिंह ने भी सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. उनके मुताबिक उक्त जनहित याचिका में किन्हीं गलत तथ्यों पर आधारित फैसला न आ जाए, इसलिए उन्होंने सही तथ्यों को अदालत में रखना अपना कर्त्तव्य समझा. लिहाजा जनहित याचिका की सुनवाई के पहले सिंह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में आ गई. चूंकि नौकरी संबंधित मामले जनहित याचिका के विषय नहीं होते, लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त याचिका खारिज कर दी. 3 फरवरी, 2012 को सिंह की याचिका पर सुनवाई हुई. न्यायमूर्ति ने कहा सरकार की उम्र निर्धारण प्रक्रिया प्राकृतिक कानून तथा संविधान के विरुद्ध है. संबंधित पीठ ने यह भी कहा कि जब 21 जुलाई 2011 को अटार्नी जनरल से सरकार ने राय ले ली कि जनरल सिंह का जन्म वर्ष 1950 है तो बार-बार उन्हीं से राय क्यों ली जाती रही?

बड़ा सवाल है कि जब जन्म प्रमाण पत्र के तौर पर मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट ही एकमात्र सबूत होता है. जनरल सिंह के मामले में यह आर्मी और सरकार के पास एक ही है और उसमें जन्म तिथि 1951 है तो उसे 1950 मानने या मनवाने का कोई आधार या तरीका कहां है?

जोर जबरदस्ती से किसी से कुछ भी मनवाया जा सकता है पर यह कोई सबूत नहीं है. आर्मी के पास कानून की पर्याप्त जानकारी होना जरूरी नहीं है पर सरकार के पास कानून के विशेषज्ञ हैं. वह किस प्रकार इतने संवेदनशील प्रश्न पर ऐसी गलतियां कर सकती है. यह मामला देश में और अंतरराष्ट्रीय तौर पर गलत संदेश भेजता है. वीके सिंह मामले में तो हद ही पार हो गई है. जिस तरह उन जैसे प्रतिष्ठित, ईमानदार और सर्वोच्च अधिकारी को बाध्य होकर न्यायालय आना पड़ा है, वह भारत जैसे गरिमामय राष्ट्र की छवि के अनुकूल नहीं है. सरकार को इस मामले में कानूनन सटीक निर्णय लेकर अपनी बिगड़ी हुई छवि को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए.


 

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