![]() |
पिछले दो-ढाई दशकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के नशे में कृषि क्षेत्र की जमकर उपेक्षा की गई है . और इस कारण कृषि क्षेत्र गहरे संकट में फंसता जा रहा है. राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है. एक समय कृषि क्षेत्र में जीडीपी का योगदान 50 फीसद से अधिक होता था परन्तु आजादी के छह दशक बाद यह घटकर मात्र 14.6 प्रतिशत रह गया है. साफ है कि देश की कुल जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्स्दारी में लगातार गिरावट आ रही है. कृषि क्षेत्र के चौरतफा संकट की कीमत किसानों के साथ-साथ आम उपभोक्ता चुका रहे हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आने वाले समय में भारत खाद्य संकट और भुखमरी की समस्या से कैसे निपटेगा. देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता घटती जा रही है. हकीकत यह है कि अगर देश में सभी लोग दो जून भरपेट भोजन करने लगें तो अनाज की भारी किल्लत पैदा हो जाएगी. विडम्बना है कि देश के लगभग 32 करोड़ लोगों को भूखे पेट जिंदगी बसर करनी पड़ती है. भुखमरी की यह तस्वीर कृषि संकट का ही एक चेहरा है. भारतीय किसान खेती को घाटे का सौदा मानते हैं और रोजगार का दूसरा विकल्प न होने के कारण मजबूरी में खेती के रोजगार से जुड़े हैं. देश के 40 प्रतिशत किसान कहते हैं कि उन्हें आजीविका का कोई विकल्प मिल जाए, तो वे खेती को एक पल गंवाए बिना तिलांजलि दे देंगे. हाल के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि 98.2 प्रतिशत किसानों की आनेवाली पीढ़ियों में किसानी के प्रति कोई रुचि नहीं है. निश्चय ही यह चिंता का विषय होना चाहिए. वास्तव में कृषि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्वयं इसका अस्तित्व बचाए रखने की है. खेती में लगातार हो रहे घाटे के चलते किसान आत्महत्या के लिए विवश हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से लेकर पिछले साल यानी सोलह सालों में ढाई लाख से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की. यूं किसानों की आत्महत्या की घटनाएं पूरे देश में घटित होती रही हैं पर कुछ राज्यों में यह ज्यादा विकराल रूप में नजर आती हैं. महाराष्ट्र, कनार्टक, आंध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्या की दर सबसे अधिक है. अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2010 में ही देशभर में 15,964 किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं दर्ज हुई. इनमें से 60 फीसद मामले इन्हीं चार राज्यों के हैं. दरअसल, जो खेती कभी मुनाफे का धंधा हुआ करती थी, वह अब घाटे का कारोबार हो गई है. इसकी प्रत्यक्ष वजह मौजूदा सरकारी नीतियों में निहित खामियां ही हैं. खेती के प्रति बढ़ते मोहभंग की कुछ साफ वजहें हैं. हमारी सरकारी नीतियां कृषि और किसान विरोधी हैं. खाद, बीज, डीजल और महंगे मजदूरों के चलते खेती करना आज घाटे का व्यवसाय है. खेती में लागत बढ़ गई है, जबकि कृषि उत्पादों की खरीद में सारा लाभ बिचौलिए हड़प लेते हैं. सबसे बड़ी परेशानी यह है कि सरकार द्वारा दी गयी जरूरी सुविधाएं भी किसानों तक नहीं पहुंच पाती हैं, यदि पहुंचती भी हैं तो संपन्न किसानों के पास ही पहुंचती हैं. ज्यादातर किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से कम है. उन्हें न अपनी उपज का सही मूल्य मिल पाता है और न कृषि को लेकर मौजूदा सरकारी नीति से लाभ पहुंचता है. विडम्बना यह है कि वे कम उत्पादन से भी घाटे में होते हैं और अधिक उत्पादन करने पर भी. दोनों ही स्थितियों में उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं होता. केन्द्र सरकार का नेशनल सैम्पल सर्वे किसानों की हकीकत बयां करता है. उसका आंकलन है कि देश के औसत किसानों को प्रतिमाह गुजारा महज 503 रु पये की आमदनी में करना पड़ रहा है. इसमें केरल और पंजाब जैसे सम्पन्न राज्यों के किसान भी शामिल है. जबकि हिन्दी प्रदेश में यह औसत रकम गिरकर 325 रुपये प्रति महीने के आसपास है. इन किसानों की हालात में कैसे सुधार हो, इस पर सरकारों का कोई ध्यान नहीं है. अगर सरकार की किसानों और कृषि के प्रति यही बेरुखी रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब हम खाद्य असुरक्षा के जाल में फंसते जाएंगे. जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरे का संकेत है. खाद्य पदाथरे की लागातार बढ़ती कीमत हमारे लिए खतरे की घंटी है. बेशक, सरकार ने दूसरी हरित क्रांति का आह्वान किया हैं, लेकिन जब तक खेती को लाभप्रद नहीं बनाया जाएगा और उपजाऊ जमीन को अधिग्रहण के शिकंजे से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसा संभव नहीं है. इसके लिए जरूरी है कि उद्योगों को ही नहीं, कृषि को भी विकास की रूप रेखा में शामिल किया जाए. इसके अलावा कृषि उत्पादों का किसानों को सही मूल्य मिले. जरूरत जमीन अधिग्रहण को किसान हितैषी बनाने की भी है. यह केवल किसानों के ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के हित में है. कृषि की बिगड़ती दशा पर प्रधानमंत्री भी चिन्ता व्यक्त करते रहे हैं. गत नवम्बर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस पर आयोजित एक समारोह में उन्होंने कहा भी कि भविष्य में देश में कृषि क्षेत्र के समक्ष कई चुनौतियां होंगी. पिछले दस सालों के दौरान कृषि उत्पादन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस अवधि में यह औसतन एक प्रतिशत की दर से बढ़ पाया है. खाद्यान्न की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए यह वृद्धि दर काफी नहीं है, इसीलिए उन्होंने भविष्य में देश की बढ़ती खाद्यान्न मांग पूरा करने के लिए खेती के समग्र विकास को केन्द्र में रखते हुए दूसरी हरित क्रांति का आह्वान किया. सरकार मानती है कि अनाज उत्पादन में भले ही देश ने आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, लेकिन दालों और खाद्य तेलों के मामले में अब भी आयात पर निर्भरता है. बहरहाल, खाद्यान्न की समस्या से निपटने के लिए जरूरी है किसानों की दशा ठीक करना. किसानों को समुचित आय कैसे हो इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. यही नहीं, खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत बनने वाले तंत्र को भी किसान हितैषी बनाया जाना चाहिए.
vvv
|
|||||||||||||||||||||||||||||||||||