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हेअर्जुन! पुत्र मोह से बड़ा कोई मोह नहीं. यह सारी धन-दौलत, उलटी-सीधी कमाई, सब हम अपनी संतानों के लिए ही तो जमा करते हैं. अगर बच्चे की जिद है, वह मैदान में उतरने को उद्यत है तो उसकी जिद का लालन-पालन भी तुम्हारा राजनीतिक धर्म है. तुम प्रसिद्ध धुरंधर हो. तुम्हारे लिए क्या कठिन है? किसी भी समर भूमि में उतरकर विजयश्री का वरण करने में सक्षम हो. अब समय आ गया है. युवाशक्ति को आगे आने दो. अपनी वर्तमान सीट का, किसी और के लिए नहीं, अपने बेटे के लिए त्याग करो. उसे भी विधायक पद का सुख भोगने का अवसर दो और लोकतंत्र में यश के भागी बनो. आज के युग का यही यथार्थ है. अनेक राजपिताओं ने अपने पुत्र-पुत्रादिकों के लिए सिंहासन खाली किए हैं. जो नहीं कर पा रहे, वे भविष्य में करेंगे. अर्जुनलाल के राजनीतिक सलाहकार और चुनाव सारथी श्री किशनलाल उसे समझाते हैं. अर्जुनलाल अपनी सीट को लेकर मोहग्रस्त है. वह दल के प्रमुख की ओर से समर भूमि में उतरने का प्रवेशपत्र, जिसे टिकट कहा जाता है, प्राप्त कर चुका है. उधर उसकी अपनी ही संतान जिद पर अड़ी है कि वह भी उसी पुराने क्षेत्र में उतरने की आकांक्षा पाले हुए है. अर्जुनलाल क्षेत्र का धनीमानी व्यक्ति है, निवर्तमान विधायक है. आर्थिक तौर पर संपन्न है इसीलिए राजनीति में भी सफल है. अर्जुनलाल के पास करोड़ों की घोषित संपत्ति है. जो राजनीति का नामी इंसान हो, उसके पास बेनामी संपत्ति न हो, ऐसा न संभव है, न विश्वास योग्य है. अर्जुनलाल और उनके सगे-संबंधियों ने अरबों का अघोषित साम्राज्य खड़ा किया है. जो इतना खड़ा कर सकता है, चुनाव में खड़ा होना उसके लिए उलटे हाथ का खेल है. जिस तरह बिना पंख के कौआ नहीं उड़ता, वैसे ही बिना धन के राजनीति भी नहीं सधती. अर्जुनलाल का इकलौता पुत्र अभिमन्युलाल अभी-अभी चुनाव योग्य जवान हुआ है. इसकी तसदीक आए दिन इलाके के पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज होते उसके कारनामे पढ़कर की जा सकती है. इन दिनों वह पिता का नाम सार्थक कर रहा है. जब बाप का नाम अर्जुन हो, तो बेटे का नाम अभिमन्यु होने में ही सार्थकता है. सबसे रोचक बात यह है कि अर्जुनलाल की ज्ञात पत्नियों में से एक का नाम सुभद्रा देवी है. अभिमन्यु इसी माई का लाल है. एक दिन अभिमन्युलाल ने कहा- पिताश्री, इस बार मैं भी चुनावी चक्रव्यूह भेदना चाहता हूं. आपका आशीर्वाद चाहिए. अर्जुनलाल बेटे की कामना से अभिभूत होते हुए बोले- अभिमन्यु, अभी तुम राजनीति के दांवपेंचों से सर्वथा अनभिज्ञ हो. राजनीति में एक से एक घाघ हैं. अपने चाचा श्री दुयरेधनलाल को ही देख लो, कितने घुटे हुए हैं. वे भी इस बार चुनाव मैदान में हैं. भला तुम उन और उनके ही जैसे बारंबार चुनावी रणभूमि में उतर चुके महारथियों से किस भांति मुकाबला कर पाओगे? अभिन्युलाल अपनी नवागत मूछों पर ताव देता हुआ बोला-आपको कदाचित मेरे पराक्रम, बाहुबल और क्षेत्र में मेरी लोकप्रियता और संगठन क्षमता का भान नहीं है. यदि आप आशीर्वाद दे दें, तो आपके स्थान पर मैं इस बार चक्रव्यूह भेदना चाहूंगा. युवा मेरे साथ हैं. आपको कदापि भय करने की आवश्यकता नहीं है. राजनीति मेरे खून में है. अर्जुनलाल को काटो तो खून नहीं. वह वैसे ही विवश दिखे, जैसे कभी कवच-कुंडल मांगते समय कर्ण हुआ होगा. यद्यपि अर्जुनलाल ने प्रचार-प्रसार के लिए पर्याप्त धन व्यय किया था तथापि उसने भाइयों व शुभचिंतकों से मंतण्रा की. किशनलाल की सलाह उन्हें अच्छी लगी कि क्षेत्र बदल लो. मैं तुम्हारे साथ अकेला चलूंगा. तुम्हें अपने रणकौशल से विजयश्री दिलवाऊंगा. अर्जुनलाल ने दल के प्रमुख पर दबाव बना अपनी जगह अभिमन्युलाल को उतार दिया है और स्वयं सुदूर क्षेत्र चले गये हैं. इधर अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस चुका है. प्रथम द्वार पिता ने तोड़कर दे दिया पर विजयश्री का अंतिम द्वार उसको ही तोड़ना है. उसके चाचाश्री दुयरेधनलाल ने अपने स्थान पर अपने विस्त सहयोगी जयद्रथ सेन को समर भूमि में उतार दिया है.
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