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पड़ोसी मालदीव के उदार राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की सूझबूझ से यह द्वीपराष्ट्र भारत विरोधी केन्द्र बनने से रुक गया. टीवी के पूर्व एंकर डॉ. मोहम्मद वहीद हसन मानिक के पड़ोसी राष्ट्र मालदीव के नये राष्ट्रपति बनते ही एक आस्था दृढ़ हो गई है कि अब भी सूफी इस्लाम के अनुयायी जन आम आदमी की पसन्द हैं. राजधानी माले में यही हुआ. पड़ोसी मालदीव के उदार राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की सूझबूझ से यह द्वीपराष्ट्र भारत विरोधी केन्द्र बनने से रुक गया. त्यागपत्र देकर नशीद ने पुलिस और सेना तथा कट्टरपंथियों की सांठगांठ के खतरे को ध्वस्त कर मालदीव को लोकतांत्रिक बनाये रखा. अन्यथा पाकिस्तान द्वारा दक्षेस सम्मेलन में भेंट दिए स्मारक से यह अंदेशा था कि उग्रवादी मजहबी लोग यहां सिविल युद्ध छेड़ देंगे. पाकिस्तान ने मोहम्मद अली जिन्ना की एक प्रतिमा भेंट की थी जिसमें कट्टर इस्लामीजन की नजर में कई ईशानिन्दा की बातें थीं. दरअसल, उन्होंने मूर्ति पर हमला किया मगर कारण अन्य थे. कुछ सामन्तों के पर्यटक स्थलों पर नशीद शासन ने सख्ती की थी क्योंकि वे आर्थिक अपराध में लिप्त थे. इन लोगों ने मजहब की ओट में बचाव तलाशा. नशीद को विद्रोह का सामना करना पड़ा. सालभर पूर्व ही राष्ट्रपति निर्वाचित नशीद का किस्सा भी दिलचस्प है. सलाखों के पीछे से सत्ता की चोटी तक पहुंचनेवालों की मिसालें इतिहास में कई मिल जाएंगी मगर पड़ोसी मालदीव में श्रमजीवी पत्रकार मोहम्मद अन्नी नशीद का राष्ट्रपति निर्वाचित होना अनोखा दृष्टान्त था. एशिया के लघुतम राष्ट्र के दीर्घतम अवधि (तीन दशक) तक शासक रहे इकहत्तर-वर्षीय मायूम अब्दुल गयूम को इकतालीस-वर्षीय मोहम्मद नशीद ने हराया. इस प्रवालद्वीप वलय में लोकशाही का यह प्रथम प्रयोग था. नव निर्वाचित राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद वहीद को दोनों पूर्व राष्ट्रपतियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो नये मुखिया का रोल भिन्न ही होगा. मोहम्मद नशीद ने चौवन प्रतिशत वोट पाकर जीत के दिन ही छियालीस फीसदी वोट पाये अपने प्रतिद्वन्द्वी गयूम के साथ संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में ऐलान किया कि पराजित राष्ट्रपति को राजकाज में माफिक स्थान दिया जाएगा. उनसे भिन्न रहे गयूम. उन्होंने श्रीलंका में आरंम्भिक अध्ययन के बाद काहिरा के अल अजहर विविद्यालय से इस्लामी शास्त्रों का अध्ययन कर, शरीयत कानून में निपुणता पाई. उग्रवादी मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन के प्रणोता सैय्यद कुतुब से प्रभावित हुए. फिर लीबिया इस्लामी गणराज्य में कर्नल गद्दाफी के निजामे मुस्तफा से अभिभूत हुए. उत्तर कोरिया जाकर तानाशाह किम इल सुंग की शासन-व्यवस्था का अध्ययन किया. मालदीव लौटकर एक पार्टी शासनतंत्र रचा जिसमें वे अकेले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होते थे और नब्बे प्रतिशत वोट पाकर चार बार चुने जाते रहे. उन्होंने मालदीव में शरीयत कानून को सर्वोच्च बनाया. इस्लामी राष्ट्रों के संगठन (ओआईसी), जो कश्मीर को पाकिस्तान का भूभाग मानता है, में सक्रिय भूमिका निभाई. राष्ट्रमंडल में रहे. वर्तमान सियासत का विश्लेषण करने के पहले निवर्तमान हालत पर गौर कर लें. ग्यारह सौ द्वीपों वाला मालदीव मूंगों से बनी चट्टानों का कंगनानुमा संयोजन है जिसका मात्र दस प्रतिशत भूभाग समुद्र की सतह से केवल सात फुट ऊपर है. यहां हर दशक में समुद्री लहरें सवा इंच तक उठ जाती हैं. आज के मालदीवियन रूफिया के पूर्व समुद्री कौड़ियां ही यहां विनिमय की मुद्रा थीं. तमिलनाडु के वैभवी चोल साम्राज्य का उपनिवेश रहा मालदीव सुन्नी इस्लाम के पूर्व शैव हिन्दू क्षेत्र था. फिर सम्राट अशोक ने यहां बौद्ध धर्म चलवाया. बारहवीं सदी में अरब व्यापरियों ने मालदीव के राजा को कलमा पढ़वाया और सारी रियाया मुसलमान हो गई. यहां पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और अंत में अंग्रेज आये. आठ सदियों बाद यहां सुल्तान की हुकूमत का खात्मा हुआ, ठीक जब पड़ोस के केरल में विधानसभा गठित हुई. मगर यह गणराज्य केवल आठ माह चला क्योंकि जनमत संग्रह से जीते प्रथम राष्ट्रपति मोहम्मद अमीनदीदी का तख्ता पलट दिया गया. उन्होंने तम्बाकू पर पाबन्दी लगा दी थी. 1968 में जब सुल्तान अहमद फरीद को हटाकर गणराज्य गठित हो गया, दस वर्ष बाद मायूम अब्दुल गयूम प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. विश्व के इस पूर्णत: इस्लामी देश, जहां अन्य सभी आस्थायें कानूनन वर्जित हैं, सिर्फ सुन्नी मुसलमान ही नागरिक तथा वोटर हो सकते है. राष्ट्र का शासकीय केन्द्र भी मस्जिदे सुल्तान मोहम्मद है. इसीलिए मोहम्मद नशीद की विजय सूफीवादी उदार इस्लाम की फतह थी. अपने चुनावी अभियान में राष्ट्रपति गयूम ने प्रचार भी किया था कि उन्हें अपदस्थ कर पश्चिमी देश मालदीव में ईसाइत थोपने की फिराक में हैं. साल भर से यहां भी मुस्लिम आतंकवादी प्रगट हो गये हैं. गैर मुस्लिम पर्यटकों पर कातिलाना हमले दर्ज हुए हैं. दक्षिण में लिट्टेवाला जाफना, उत्तर में मकबूजा मुजफ्फराबाद, पूर्वीत्तर में माओवादी नेपाल और फौजशासित ढाका तथा तालिबान-ग्रस्त पश्चिमी पंजाब से घिरे भारत पर एक नये छोर से आतंक का साया पड़ने का अंदेशा था. अत: मोहम्मद नशीद के राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाने से तब कुछ राहत मिली थी. मोहम्मद नशीद से दक्षिण पूर्वी राष्ट्रों (सार्क), विशेषकर भारत को आशा बंधना स्वाभाविक था कि मालदीव लाकतांत्रिक राह पर अग्रसर हो कर विकास मार्ग पर चलेगा. मुस्लिम आतंकवाद का कार्यस्थल नहीं बनेगा. नशीद ने पन्द्रह वर्ष गुजारे हैं गयूम की जेल में. संगू पत्रिका में आलोचनात्मक लेखों के कारण उन्हें सजा होती रही. उन पर आतंक और राजद्रोह का मुकदमा चला. जेल की एकान्त कोठरी में उन पर थूका जाता था. बूट की कील से प्रहार होता था, भूखा रखा जाता था. उनके पत्रकार सहयोगी मोहम्मद शफीक को उनके खिलाफ वादामाफ गवाह बनाने को साजिश भी गयूम ने की. मगर नशीद हिम्मत नहीं हारे. नशीद नाविक इंजीनियर की डिग्री पाकर बजाय सरकारी नौकरी के लोकतंत्र लाओ संघर्ष के सरबराह बने. श्रीलंका और ब्रिटेन में निर्वासित जीवन बिताया. मगर जैसे ही प्रतिबंध की अवधि खत्म हुई, मालदीव लौट आये. राजधानी माले के पूर्वी भाग में ऐतिहासिक चौखम्भा स्मारक के बगीचे में दो दशकों से दिनरात विरोध प्रदर्शन, धरना और गिरफ्तारी देते रहे. भारत में दफा 144 में चार से अधिक प्रदर्शनकारी साथ नहीं आ सकते, मालदीव में यह संख्या केवल तीन है मगर इसका नशीद के समर्थकों ने कई बार उल्लंघन किया. नशीद की तुलना लोग नेल्सन मंडेला और सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान से करते हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन्हें अंतरात्मा का बंदी कहा. विश्व के राजनेताओं और मीडिया का गयूम पर अनवरत दबाव पड़ा कि उन्हें रिहा किया जाय. विडम्बना रही कि हर देश की स्वाधीनता और लोकतंत्र के सदैव समर्थक रहे भारतवासी मालदीव के बारे में खामोश बने रहे. शायद इसलिए कि वहां का राष्ट्रपति इस्लामी कट्टरवादी था. लेकिन आज अपने अथक संघर्ष से स्वयं यातना झेलकर मोहम्मद नशीद ने दिखा दिया कि तानाशाही अमानवीय होती है, अपराजेय नहीं. उनकी बगावत कामयाब रही. वह लोकतांत्रिक क्रांति कहलाएगी. हालांकि नशीद के पदत्याग से विकल्प सीमित हैं. मजहबी आग का शमन हो जाएगा या मालदीव पुन: गय्यूम जैसे कट्टरवादी के सुपुर्द कर दिया जाय. क्या विडम्बना है कि 1988 में तत्कालीन राष्ट्रपति का तख्ता पलट कर कुछ श्रीलंकाई लुटेरों ने मालदीव पर कब्जा किया तो गय्यूम की अपील पर राजीव गांधी ने नौसेना भेजकर सरकार बचा ली थी निवर्तमान राष्ट्रपति नशीद ने भारत से मदद मांगी लेकिन भारत ने इसे आंतरिक मामला कह हस्तक्षेप नहीं किया तो उन्होंने सोच-समझकर खुद पद त्यागते हुए अपने साथी उपराष्ट्रपति डा. मोहम्मद वहीद हसन मानिक को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलवा दी. विद्रोह की आग शान्तिपूर्व बुझ गई. शपथ ग्रहण के तुरन्त बाद मोहम्मद वहीद की पहली घोषणा थी कि द्वीप में आये तीस हजार भारतीय सुरक्षित हैं. डॉ. वहीद ने ही मालदीव के संविधान में मूलाधिकारों को सम्मिलित कराया था. अत: वे इस द्वीप राष्ट्र में मानवाधिकारों की रक्षा करेंगे. उदार परम्पराएं संजोये रखेंगे.
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