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उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में हो रहे राज्य विधानसभा चुनावों के शोरगुल बीच क्या किन्ही नए रूझानों को पहचाना जा सकता है? अपनी सामाजिक संरचना, राजनीतिक रंग-रूप और राजनीति के इतिहास एवं संस्कृति में ये पांचों राज्य आपस में इतने भिन्न हैं कि कोई सामान्यीकरण नहीं करना ही बेहतर है. भारत में अक्सर ही अपनी गलत भविष्यवाणियों के चलते बदनाम जनमत संग्रह किसी काम के नहीं. फिर भी राज्य-वार कुछ शुरुआती रुझानों को, जो अभी भी उभर ही रहे हैं, देखा जा सकता है. उस धुरी के आसपास कुछ महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे लगते हैं जिसके सहारे मतदाता अपनी पसंद को तय करते हैं और इसमें पार्टी की मोटी तस्वीर, सरकार का प्रदर्शन और जवाबदेही, सामाजिक समूहों के गठजोड़- जैसे कि जाति, कुल, धर्म एवं जातीयता और प्रमुख हस्तियां तथा अभियान चलाने के उनके ढंग जैसी कम महत्वपूर्ण चीजें शामिल हैं. सबसे उलझी हुई स्थिति निसंदेह उत्तर प्रदेश की है जो अधर में लटकी विधानसभा की ओर बढ़ता लग रहा है, लेकिन इस बार वहां मतों का विभाजन और सामाजिक गुटों की विरचना पहले से अलग होगी. पंजाब में 2009 के लोक सभा चुनावों का पैटर्न अगर अपने हल्के रूप में भी दोहराया जाता है तो मौजूदा, आज तक के सर्वाधिक मतदान के (79 फीसद) रुझानों को देखते हुए ऐसा लगता है कि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन को नुकसान हो सकता है. इस बार 70 फीसद मतदान वाले उत्तराखंड में भाजपा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के महा-भ्रष्ट राज के चलते हुए नुकसान को सीमित रखने की कोशिश में लगी है, जिनको हटा कर पिछले साल भुवन चंद्र खंडूरी को राजपाट दिया गया था. लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इससे कांग्रेस को होने वाले लाभ से दूर रखा जा सकेगा. गोवा की अस्थिर परिस्थिति में कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का पलड़ा भारी लग रहा है. जबकि मणिपुर में संभावना यह है कि जातीय तादात्म्य एक बड़ी भूमिका अदा करेगा, जिसका लाभ कदाचित कांग्रेस को मिलेगा. अन्ना हजारे के आंदोलन और उससे उत्पन्न नैतिक विकषर्ण के कारण कुछ सप्ताह पहले तक प्रचलित मध्यवर्गी समझ कि इन चुनावों में भ्रष्टाचार मुख्य भूमिका अदा करेगा, के विपरीत भ्रष्टाचार अनेक में से केवल एक मुद्दा होगा जिन पर लोग अपना मत दे सकते है. भ्रष्टाचार किसी भी तरह से अप्रासंगिक नहीं हुआ है लेकिन इसको प्राथमिक तौर पर एक नैतिक प्रश्न नहीं माना जाता है. लोग इसको प्रशासन की गुणवत्ता और संसाधनों को उस दिशा में मोड़ने जैसे आर्थिक और सामाजिक प्रश्नों से जोड़कर देखते हैं जिनसे सार्वजनिक सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाया जाता है. इसके अलावा भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु धुंधला पड़ गया है और इसके निशाने पर अब केवल कांग्रेस और यूपीए मात्र नहीं, जैसा कि अन्ना के मॉडल में इन्हें भ्रष्टाचार की सवरेपरि मूर्ति के रूप में दिखाया गया था. जहां तक विरोधी अभियान और इस पर आम लोगों की प्रतिक्रिया का सवाल है, मायावती की सरकार और प्रकाश सिंह बादल के कुनबे वाले राज को आम तौर पर बेहद भ्रष्ट के तौर पर देखा जा रहा है. भाजपा बुरी तरह से बदनामी झेल रही है- कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार द्वारा बेल्लारी बंधुओं के मार्फत खनिज संसाधनों की लूट और उत्तराखंड में निशंक राज में छोटे-बड़े घपलों के मामले लोगों के जेहन में हैं. ‘कार्यकाल-विरोध’ के चलन में भी स्पष्ट अंतर दिखाई पड़ता है जो पिछले तीन दशकों से पार्टी राजनीति पर भारी तौर पर हावी रहा है. लोगों ने चुनावों का इस्तेमाल शासक पार्टियों के काम पर एक तरह से जनमत संग्रह अथवा मत संगह के तौर पर किया और उनमें से अस्सी फीसद का पत्ता साफ कर दिया था. परंतु हाल में चीजें बदली हैं; बिहार, गुजरात, हरियाणा, ओडिशा में शासक पार्टियां जीतकर सत्ता में वापस लौटीं और 2009 के चुनावों में संप्रग ने केंद्र में दोबारा सरकार बनाई. ऐसा लगता है कि अंध कार्यकाल विरोध अब एक अधिक विभेदीकृत समझ को रास्ता दे रहा है, जिसमें महत्व सरकार के कामकाज के साथ-साथ, हाशिए पर पड़े समूहों के प्रतिनिधित्व के सहित, सामाजिक-राजनीतिक कारणों का भी है. दलित, अंबेडकर समग्र ग्राम योजना जैसे कार्यक्रमों की मांग कर रहे और हासिल भी कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ा जा रहा है और उनको हैंडपंप, शौचालय, सोलर ऊर्जा प्रणालियां तथा बच्चों को अंग्रेजी की ट्यूशन मुहैया कराई जा रही है. इसी तरह से एक अन्य 30 साल पुराना बड़ा रूझान, अन्य पिछडी जातियों (ओबीसी) का आगे बढ़ता अभियान आज भी महत्वपूर्ण बना हुआ है, लेकिन ओबीसी की निचली जातियों (मुख्यतया गैर-यादव) के बीच आंतरिक विभेदीकरण तेज हो रहा है, जो अधिक प्रतिनिधित्व और अधिक आरक्षण की मांग कर रहे हैं. प्रमुख राजनीतिक दल ओबीसी के सोपान क्रम में न केवल अपेक्षाकृत खाते-पीते कुर्मियों को, बल्कि कुशवाहा और लोध को भी अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं. प्रतिनिधित्व के मामले में सबसे पिछड़े वर्ग (एमबीसी) अब अधिक जोर दे रहे हैं. उत्तर प्रदेश में दो अन्य समूहों के लिए भी जबरदस्त होड़ लगी है. ये है राज्य की आबादी में 18 फीसद तक भागीदार मुस्लिम और वे ऊंची जातियां जिनका पांच साल पहले मायावती द्वारा दलितों के साथ बनाए गए गठजोड से मोहभंग हो चुका है. ब्राह्मणों और वैश्यों को इस गठजोड़ से बहुत कम हासिल हुआ है और इसलिए अब वे कहीं और ठौर तलाश कर रहे हैं. दशकों बाद उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी के बतौर पहली मुस्लिम प्रधान पार्टी पैदा हुई है. ऐसा नहीं लगता कि यह बड़ी संख्या में सीटें जीत पाएगी, लेकिन जिन 100 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिमों की आबादी की 20 से 45 फीसद तक है, उनमें यह खेल बिगाड़ने का काम कर सकती है. देखना है कि यह किस पार्टी की मदद करती है. जो भी हो ओबीसी कोटे के 27 फीसद में से 4.5 फीसद मुस्लिमों को देने की पेशकश करके और जीतने पर उसे दोगुना करने का वादा कर कांग्रेस मुस्लिमों को अपनी ओर करने का सुस्पष्ट प्रयास कर रही है. समाजवादी पार्टी मुस्लिमों के लिए नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में 18 फीसद आरक्षण देने का वादा कर रही है. अभी तक बसपा ने तुलनात्मक संख्या का ऐलान नहीं किया है, लेकिन समाजवादी पार्टी के 75 और कांग्रेस के 61 की तुलना में इसने 84 मुस्लिमों को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. ऊंची जाति के वोटों को अपनी ओर खींचने के लिए भाजपा ‘अल्पसंख्यक कोटा राजनीति’ का सख्ती से विरोध कर रही है. अपने अभियान में भाजपा हद दज्रे की सांप्रदायिकता और रूढ़िवादिता की ओर वापस लौटती हुई राम मंदिर बनाने और मथुरा में एक ‘आध्यात्मिक डिज़नीलेंड’ बनाने का वादा कर रही है. कांग्रेस और भाजपा दोनों सूबे के दो सबसे ऊपर की पायदान की दौड़ से बाहर नजर आ रहे हैं, जो सपा और बसपा के बीच चल रही लगती है. लेकिन यह इस पर निर्भर है कि गैर-दलित वोट बसपा विरोधियों के बीच कैसे बंटते हैं और मायावती अपने ‘सर्वजन’ एजेंडा को कैसे आगे बढ़ा पाती हैं. अगर सपा को बड़ी संख्या में सीटें मिलती हैं तो यह कांग्रेस के साथ मिल कर गठबंधन बना सकती है. इससे राष्ट्रीय राजनीति पर भारी असर पड़ सकता है. पंजाब की तस्वीर अलग है. वहां अकाली दल-भाजपा गठबंधन बचाव की मुद्रा में है क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनावों में उसे धूल चाटनी पड़ी थी. भ्रष्टाचार और सार्वजनिक सेवा प्रावधान के पैसे को इधर-उधर और इसकी परिवार केंद्रित राजनीति के खिलाफ भारी आक्रोश दिखाई पड़ता है. पंजाब में एक दिलचस्प और सेहतमंद परिघटना धक्काशाही या बाहुबल राज का विरोध है. पंजाब ने ‘जिसकी सरकार उसी का सब कुछ’ की एक ऐसी व्यवस्था का विकास कर लिया है जिसके तहत सत्ता में आने के बाद पुलिस और पंचायतों, नगर पालिकाओं, मंडी समितियों और केबल नेटवकरे सहित तमाम सार्वजनिक संस्थाओं पर कांग्रेस अथवा अकालियों का एकछत्र राज हो जाता है. यहां लोगों में नशीली दवाओं और नशाखोरी को लेकर चिंता बढ़ रही है. इस बार धर्म आधारित राजनीति का असर कुछ कम होता लग रहा है. तरणतारन जो ‘सिखों का गढ़’ कहा जाता है, में पहली बार एक हिंदू और हिंदू बहुमत वाले बटाला में एक सिख उम्मीदवार मैदान में है. यह एक अच्छा रुझान है. (आलेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है)
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