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08 Feb 2012 12:19:02 AM IST
Last Updated : 08 Feb 2012 12:19:02 AM IST

छोटी ‘फलक’ पर बड़े सवाल

गोविंद चंद्र दास
लेखक
छोटी ‘फलक’ पर बड़े सवाल
छोटी ‘फलक’ पर बड़े सवाल

 

एक मासूम-सी जान ‘फलक’ एम्स में जिंदगी और मौत से जूझ रही है.

ठीक हो भी गई तो उसका भविष्य क्या होगा, बताना बहुत मुश्किल है. इस बच्ची की कहानी ने देश को झकझोर कर रख दिया है. क्या वाकई इतने निर्मम हो सकते हैं माता-पिता, या पैसे की हवस ने उन्हें इतना अंधा कर दिया है कि वे अपने कलेजे के टुकड़े को देह की मंडी में बेच सकते हैं. हालांकि यह कोई एक फलक की कहानी नहीं है. ऐसी अगणित लड़कियां हैं जिनके साथ हर रोज अमानवीय अत्याचार होता है.

कुछ को बमुश्किल न्याय मिल भी जाता है पर अधिकांश सिसिकयों में जिंदगी गुजार देती हैं. आधी आबादी की बदहाली के बारे में जनसंख्या संबंधी सरकारी आंकड़े जितने चौंकानेवाले हैं, कहीं उतनी ही भयावह है लोगों की मानसिकता. देश में नारी सशक्तीकरण की चाहे जितनी बातें होती हों, लेकिन हकीकत इसके बिलकुल विपरीत है.

बेशक आज दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं ने हर बड़े मोर्चे संभाल रखे हों लेकिन आजादी के बाद से देश में महिला-पुरु ष अनुपात में तेजी से गिरावट आई है. शिशु लिंगानुपात में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट पर स्वयं जनगणना आयुक्त भी गंभीर चिंता जता चुके हैं.

यह गिरावट कन्या भ्रूण हत्या में वृद्धि की पुष्टि भी करती है. आंकड़ों के मुताबिक देश में 1000 बालकों के मुकाबले केवल 914 बालिकाएं हैं. यद्यपि देश का राष्ट्रीय औसत के अनुसार प्रति 1000 पुरु षों के मुकाबले 940 महिलाएं है. लेकिन दिल्ली में यह महिला अनुपात 866, चंडीगढ़ में 818, हरियाण में 877 और पंजाब में 893 के चिंताजनक स्तर तक लुढ़क गया है.

केवल दक्षिण भारत की स्थिति ही कुछ बेहतर है. केरल देश का पहला राज्य है जहां प्रति हजार पुरु षों के मुकाबले 1084 महिलाएं हैं.

समाज के कुलीन खानदानों की बात हो या गरीब तबके की; घर में लड़की के पैदा होने पर लक्ष्मी के आगमन का भाव अब नहीं उमड़ता है. एक पल के लिए चाहे खुशी होती भी हो लेकिन उसके लड़की होने का विचार तुरंत मन में घर बना लेता है.

एक तरफ जहां हमारे वेद और शास्त्रों में नारी को पूजे जाने का उपदेश दिया गया है, वहीं हमारे मौजूदा पितृसत्तात्मक समाज में कहीं बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है, तो कहीं सरेआम उसकी अस्मत को बेरहमी से कुचला जाता है. कहीं पुरु ष मनोग्रंथि के चलते, तो कहीं समाज में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए स्त्री के शरीर को जागीर समझकर उस पर जुल्म ढाए जाते हैं.

समाज पर पुरुष की प्रधानता का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है कि जितनी भी गालियां प्रचलित हैं वह मां और बहन के अपमान से ही संबंधित हैं.

देश के कुछ हिस्सों में महिला-पुरुष अनुपात में गैरबराबरी बेहद चिंता का विषय है. हालात ऐसे बन गए हैं कि कुछ जगहों पर तो लड़कों को शादी के लिए लड़कियां तक नहीं मिल रही हैं.

यह हालत दरअसल उस चिंताजनक सोच का परिणाम है, जिसमें राह चलती लड़कियों में लोगों को सिर्फ अपनी काम वासना शांत करने का सामान ही दिखाई देता है. देश में कन्या भ्रूणहत्या के पीछे महज बेटे की चाहत ही एकमात्र कारण नहीं है. समाज में आज एक लड़की के माता-पिता उसको लेकर हमेशा चिंतित और  किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त रहते हैं. वह हर पल इस चिंता में जीते हैं कि कहीं उनकी बेटी केसाथ कुछ ऐसी-वैसी.. बात न हो जाए.

महानगरों में लड़कियों और महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध ने अभिभावकों को भीतर तक भयभीत कर दिया है. दिल्ली तो घोषित रूप से महिलाओं के लिए असुरक्षित  शहर बन गया है, जहां सुरक्षा के इतने भारी बंदोबस्त के बावजूद हर दूसरे दिन किसी लड़की के साथ यौन अत्याचार होता है. मुंबई में भी महिलाओं के प्रति लोगों का रवैया खास अलग नहीं है. दरअसल, यह रवैया समाज की नारी विरोधी मानसिकता को दर्शाता है. आज बदलते दौर के साथ नारी कहीं भी पुरु षों से पीछे नहीं रहना चाहती और प्रतिस्पर्धा की भावना से छोटे-छोटे गांवों और कस्बों से लड़कियां महानगरों का रु ख कर रही हैं, लेकिन शहर उनके लिए बुरे सपने जैसे साबित हो रहे हैं.

महिलाओं के साथ होने वाले ऐसे जघन्य अपराधों के पीछे समाज की दूषित सोच ही जिम्मेदार है. नतीजा यह कि स्कूल, कॉलेज और नौकरी के लिए लड़कियां घर से बाहर जरूर निकलती हैं, लेकिन वापस उनके वापस आने तक मां-बाप बेचैन रहते हैं. स्वयं घर से बाहर कदम रखते समय लड़कियां बहादुर और आत्मविास से भरे होने का आवरण जरूर ओढ़े रहती हैं, लेकिन वे हमेशा अनहोनी की आशंका के साए में जीती हैं.

महिलाओं में इस प्रकार का डर निराधार नहीं है. पुरुष प्रधान समाज में लड़कों पर कोई आंच आ जाए तो उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यदि अथक सतर्कता के बावजूद लड़की के दामन पर कोई दाग लग जाए तो वह और उसके माता-पिता जीवन भर उस कलंक के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते हैं, बावजूद कि इसके लिए लड़की कतई जिम्मेदार नहीं होती. यह विकृत सामाजिक सोच का ही  नतीजा है कि कोई भी व्यक्ति ऐसी लड़की को अपनाने के लिए तैयार नहीं होता. मां-बाप जीवन भर अपने भाग्य को कोसते रहते हैं. तब वे यही सोचते हैं कि काश हमारी औलाद लड़की नहीं होती.

महिलाओं और लड़कियों के प्रति समाज की ऐसी ही सोच के कारण कन्या भ्रूण हत्या का चलन बढ़ गया है और हालात ऐसे बन गए हैं कि बेटियां कम होती जा रही हैं. हालांकि कई राज्यों में सरकारों ने कन्या जन्म प्रोत्साहन के लिए कई योजनाएं प्रारंभ की हैं, लेकिन उनके बहुत अच्छे और सकारात्मक परिणाम अब तक सामने नहीं आ पाए हैं.

यह विचारणीय है कि आखिर क्यों सरकारी योजनाएं भी लड़कियों के प्रति समाज की मानसिकता बदलने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं? इसका जवाब लोगों को अपने अंदर खोजना पड़ेगा. विचारों और नजरिए का शुद्धिकरण करना होगा अन्यथा ऐसे ही बेटियां कोख में मारी जाती रहेंगी.


 

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