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बृहस्पतिवार, 17 मई, 2012 |
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08 Feb 2012 12:13:57 AM IST
Last Updated : 08 Feb 2012 12:13:57 AM IST

न चाहते हुए भी इकसठ के हो गए

अशोक चक्रधर
लेखक
न चाहते हुए भी इकसठ के हो गए
न चाहते हुए भी इकसठ के हो गए

 

चौंरे चम्पू! आज तौ तेरौ जनमदिन ऐ, कैसे मनायगौ ?

-चचा, मैं इस बार अपना जनमदिन सिर्फ घर के सदस्यों के साथ मनाना चाहता हूं. मेरे भाई आएं, उनकी बहुएं आएं, उनके बच्चे आएं, मेरी मां रहे साथ में.

-और सुसराल वारेन कूं नायं बुलायगौ का ?

-नहीं-नहीं, वे भी आएं, वे परिवार के अंग हैं.

-तू ये बता कै इकसठ साल कौ है जायगौ न ?

-चचा, पिछले साल जब मैं साठ का हुआ था, तो मैंने संकल्प लिया था कि मैं ताउम्र इकसठ का नहीं होऊंगा, लेकिन कमबख्त हो गया. सोचाई वही है, जो साठ का होने पर आई थी. लोग समझते हैं कि इस उम्र का इंसान चुका हुआ होता है, लेकिन वह चुका हुआ तो नहीं ही होता, हालांकि आवश्यकताओं से अधिक सब कुछ कर चुका होता है. उम्र के खेत में कफी मेहनत बो चुका होता है. बोई हुई फसलों से कफी कुछ पाता है. पाने पर मजा आता है. बहुत वजन ढो चुका होता है, थककर खूब सो चुका होता है. सबके सामने मुस्कराता है, लेकिन अकेले में कई बार रो चुका होता है.

-रोइबे की का बात दिक्कत का आमै जा उमर पै.

-जो तुम्हें आई होंगी चचा!

-ना, हमें कोई दिक्कत नायं आई! हम तौ बगीची पै अलेल रहिबे वारे प्रानी ऐं लल्ला. जे दिक्कतबाजी तौ सहर कौ मरज ऐ.

-हां चचा! गांव-कस्बे में इस तरह की दिक्कतें नहीं आतीं. शहर में इस उम्र पर आकर नसीहत देने के बाद बंदा आहत होता है. इनायत की आयतें बेमानी हो जाती हैं. फिर वह शिकायतों को पीना सीखता है, क्योंकि अब आकर वह भरपूर जीना चाहता है. अपनी कामनाओं में बेहद सच्चा होता है. और चचा! असल बात ये कि फिर से बच्चा होता है. जो कुछ उसके पास है, जितना कुछ उसे आता है, वह दूसरों को देना चाहता है. हर कोई उसे भाता है. तरह-तरह के झटके झेल चुका होता है.

जमाने से मान-सम्मान पाता है, तब कहीं ये ज्ञान पाता है कि उसे कुछ भी नहीं आता है. सबके लिए रास्ता साफ करता है, दुष्टों को हृदय से माफ करता है. उसे पड़े-पौधे, दारू पिए औंधे, सब बच्चे नजर आते हैं. उसे सब घड़े कच्चे नजर आते हैं. वह उन्हें बड़े प्यार से ठोकता है ताकि टूट न जाएं. वह उन्हें पकाना चाहता है. वह घर की खिचड़ी में मूंग की दाल की तरह घुल जाता है, पर किसी की छाती पर मूंग दलना नहीं चाहता. वह दूसरों के लिए झरना होता है, पर खुद झरना नहीं चाहता. वह कुछ भी ऐसा-वैसा करके मरना नहीं चाहता.

-लल्ला, मरिबे की का चलाई. इकसठ की उमर में सोलह कौ महसूस कर. तेरी बातन ते निरासा की गंध आय रई ऐ.

-नहीं चचा नहीं, निराशा नहीं है. तुम बड़े हो, तुमसे क्या कहूं. इस उम्र का आदमी अपना दिल हमउम्रों के साथ भी मुश्किल से खोलता है. देखिए, जी तो उसका भी डोलता है. चाय में उतनी ही चीनी डालता है, जितना कि उसका शरीर घोलता है. ये नन्हा राजू, वक्त की तराजू होता है.

सच उसके आजू-बाजू होता है. चचा, जवानी तो जीवन की गलियों में एक खोया हुआ मोती है. ये बात मेरी नहीं है, एक दोहा सुना था, ‘झुकी कमर की डोकरी, का ढूंढत मग जाहि जोबन मोती इन गलिन, खोयौ ढूंढत ताहि.’ गनीमत है कि अपनी कमर झुकी नहीं है और जीवन भी भरपूर सा लगता है.

आजकल साठ-इकसठ साल का आदमी कोई लाश नहीं होता, एक तलाश होता है, उस दुकान की, जहां से उम्र खरीदी जा सकती हो. विडंबना ये है कि वह अपने आपको तेज दौड़ने वाली कार का टायर समझता है, लेकिन जमाना उसे रिटायर समझता है.

-फिर निरासा में आय गयौ तू!

-चचा, ये उम्र ही आशा और निराशा का लक्ष्मण-झूला है. पंगाखोर हो तो लक्ष्मण रेखाएं परिवार के लिए ज्यादा खींचता है. भविष्यवादी हो तो सारी नकारात्मक चीजों की तरफ से आंख मींचता है. मैं अपनी नहीं इस उम्र के दूसरों की बात कर रहा हूं.


 

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