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केन्द्र सरकार ने सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्यमों के लिए सार्वजनिक खरीद नीति घोषित की है, जिसके तहत केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों एवं सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों द्वारा कुल वाषिर्क खरीद का 20 प्रतिशत हिस्सा सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्यमों से खरीदा जाएगा. 20 प्रतिशत में से चार प्रतिशत खरीद अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के उद्यमियों के लिए आरक्षित होगी. सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्योगों से करीब 35000 करोड़ रुपये की वाषिर्क खरीद का अनुमान है. यूपीए सरकार 2004 से ही प्रयास कर रही थी कि उद्योग जगत दलितों एवं आदिवासियों को नौकरियों में आरक्षण देने का वादा करे और इस मामले में जरूरी पहल करे पर सरकारी प्रयास मीडिया में सुर्खियां तो बने, लेकिन उद्योग जगत आरक्षण के लिए किसी भी रूप में तैयार नहीं हो पाया. 2004 में जब उक्त मुद्दे पर चर्चा गर्म थी, तो फिक्की के तत्कालीन प्रवक्ता ने कहा था कि अगर सरकार द्वारा उद्योग जगत को दलितों को आरक्षण देने के लिए बाध्य किया गया, तो वह दलितों को काम पर रखने के बजाय उन्हें घर बैठे-बैठे वेतन देना ज्यादा पसंद करेंगे. संविधान में दलितों एवं आदिवासियों के लिए 22.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है. 20 प्रतिशत में से चार प्रतिशत का हिसाब लगाया जाए तो यह एक प्रतिशत से भी कम यानी मात्र 0.8 प्रतिशत बनता है. इतने कम आरक्षण को तो ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ कहना भी मुश्किल होगा. उक्त फैसला इस दृष्टि से तो ऐतिहासिक एवं स्वागत योग्य है कि उद्यमों में आरक्षण पहली बार घोषित हुआ है पर उक्त वगरें को मिले साढ़े बाईस प्रतिशत संवैधानिक आरक्षण की ऐतिहासिकता इस मामले में दरकिनार कर दी गई है. अब दावे किए जा रहे हैं कि दलित एवं आदिवासी उद्यमियों से सात हजार करोड़ की खरीद की जाएगी. जबकि 35 हजार करोड़ राशि का चार प्रतिशत मात्र 1400 करोड़ बनता है. खैर यह समय आंकड़ों की बाजीगरी दिखाने का नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर कुछ करने का है. इतना कम आरक्षण इस तर्क पर दिया गया है कि दलितों एवं आदिवासियों में इतने उद्यमी हैं ही नहीं कि उन्हें इससे अधिक आरक्षण दिया जा सके. सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्योगों की चौथी अखिल भारतीय गणना 2006-7 के आंकड़ों के मुताबिक 15.64 लाख पंजीकृत उद्यमों में से अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के स्वामित्व में क्रमश: 1.19 लाख (7.6 ) और 0.45 लाख (2.87) उद्यम थे. यानी उद्यमों में उक्त वगरें को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है. उक्त खरीद नीति में कहा गया है कि यदि अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के उद्यमी निविदा शर्त पूरा करने में विफल रहते हैं तो चार प्रतिशत आरक्षित खरीद के उप लक्ष्य को अन्य वगरें के उद्यमियों से पूरा कर लिया जाएगा. यानी जिस तरह योग्य उम्मीदवार न मिलने पर सरकारी नौकरियों के आरक्षित पद भरने में कोताही बरती जाती है, चार प्रतिशत की खरीद के मामले में भी ऐसी ही संभावनाएं बनी रहेंगी. आर्थिक गणना-2005 के आंकड़ों के अनुसार गैर अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के उद्यमियों की संख्या गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है और अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के उद्यमियों की संख्या शहरों की अपेक्षा गांवों में अधिक है. गैर दलित-आदिवासी वर्ग के स्वामित्व में करीब 86 प्रतिशत उद्यम थे, जिनमें से ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 84 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 90 प्रतिशत उद्यम थे. दलितों एवं आदिवासियों के स्वामित्व में क्रमश: 10 प्रतिशत और 4 प्रतिशत उद्यम थे, जिनमें से ग्रामीण क्षेत्रों में क्रमश: 11.5 और 4.8 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में क्रमश: 7 प्रतिशत और 2 प्रतिशत उद्यम थे. चूंकि शहरों को व्यवसाय के लिए ज्यादा सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्र के दलित-आदिवासी उद्यमियों को ‘चलो शहर की ओर’ अभियान चलाना चाहिए. गैर दलित-आदिवासी वर्ग में उद्यमियों के मुकाबले उद्यमों में नौकरी करने वालों की संख्या अधिक है. उद्यमों में नौकरी या मजदूरी करने वाले गैर दलित-आदिवासी वर्ग के लोगों की संख्या 88.5 प्रतिशत थी और अनुसूिचत जाति एवं जनजाति वर्ग के क्रमश: 8 प्रतिशत और 3.4 प्रतिशत लोग नौकरी कर रहे थे. वर्ष 1918 में डॉ भीमराव अम्बेडकर ने स्टॉक एवं शेयर्स के व्यापारियों को सलाह देने के लिए एक फर्म खोली थी. किसी दलित व्यक्ति द्वारा स्थापित की गई इस तरह की यह पहली फर्म थी, जिसे जातिवाद के कारण बंद करना पड़ा था क्योंकि विषमतावादियों के मस्तिष्क में जातीय पूर्वाग्रह तैरते रहते हैं. मध्य प्रदेश के एक गांव में दबंग जातियों ने आरक्षित सीट से एक दलित मोची को सरपंच केवल इस शर्त पर बनाया कि वह सरपंच बनने के बाद मोचीगिरी का काम नहीं छोड़ेगा, अन्यथा उसकी सरपंची छीन ली जाएगी. डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि ‘भारत में समतावादी आर्थिक प्रगति के लिए राज्य समाजवाद बहुत जरूरी है. जिस पर राज्य का नियंतण्रहोना चाहिए और निजी उद्यमी यह काम नहीं कर सकते.’ भारत में पिछले बीस वर्षों से पूंजीवाद को खुली छूट दी जा रही है. एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था के आंकड़ों के मुताबिक एक सौ बीस करोड़ की आबादी वाले भारत में करीब आठ हजार लोगों की सम्पत्ति भारत की कुल जीडीपी का तीन चौथाई के बराबर है. डॉ. अम्बेडकर की जयंती के अवसर पर 14 अपैल 2005 को मुम्बई में मिलिन्द कांबले की अध्यक्षता में दलित उद्यमियों ने ‘दलित इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री‘ (डिक्की)की स्थापना की थी. दलित चिंतक डॉ. चन्द्र भान प्रसाद ‘डिक्की’ के संरक्षक हैं. गत दिसम्बर में डिक्की द्वारा आयोजित दो दिवसीय ट्रेड फेयर में शिरकत करके उद्योग जगत की जानी-मानी हस्ती रतन टाटा ने सभी को चौंका दिया. उद्यम स्थापित करने के लिए दलितों को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम जैसे अनेक संस्थानों से ऋण उपलब्ध कराया जाता है. पर सरकारी कर्मचारी की गारंटी की शर्त ऋण प्रक्रिया में बाधा बनती है. यदि ऋण मिलता भी है, तो अधिकांशत: उन्हें सरकारी सब्सिडी के बराबर पहले रित देनी पड़ती है. ‘डिक्की’ ने दलित उद्यमियों को सहयोग और सहायता देने के लिए 500 करोड़ का ‘वेंचर फंड’ जुटाने का फैसला किया है. यानी, उद्यमियों के रूप में दलित पूंजीपति समाजवाद से गले मिलने की तैयारी में हैं. यूपी में दलितों के राजनीतिक उत्कर्ष को अपवाद मान लिया जाय तो दलित आन्दोलन नौकरियों में आरक्षण के मुद्दों से आगे नहीं बढ़ पाया है. दलितों को तैयार रहना चाहिए कि यदि नौकरियों का आरक्षण समाप्त हो गया, तब दलित क्या करेंगे! दलित उद्यमी दलितों में रोजगार देने वाला वर्ग पैदा कर रहे हैं. आन्ध्र प्रदेश के एक दलित उद्यमी ने वर्ष 2010-11 में सरकार को 70 करोड़ रुपये टैक्स दिया है. दलित वर्ग ‘स्पेशल इकॉनामिक जोन’ ‘सेज’ की नीति को ‘सवर्ण इकॉनामिक जोन’ के रूप में देखता है. शायद यही कारण है कि दलित उद्यमियों ने ‘फिक्की’ की तर्ज पर ‘डिक्की‘ बनाया. संभवत: भविष्य में ‘सेज’ की तर्ज पर ‘डेज’ यानी ‘दलित इकॉनामिक जोन’ भी बना दिया जाए. बहरहाल आज की तारीख में दलित उद्यमी आर्थिक समाजवाद की नई इबारत लिख रहे हैं. यही इबारत दलित समाज में टाटा-बिरला-अंबानी बनने की संभावनाओं के द्वार खोलेगी.
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