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04 Feb 2012 12:45:21 AM IST
Last Updated : 04 Feb 2012 12:45:21 AM IST

जांचना होगा चुनाव प्रणाली को

जवाहरलाल कौल
लेखक
जांचना होगा चुनाव प्रणाली को
जांचना होगा चुनाव प्रणाली को

 

पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में इस बार अब तक हुए मतदान में किसी बड़ी हिंसा की कोई खबर नहीं आई है.

आशा है सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही होगा. पिछले एक दशक से न्यायालयों की ही तरह चुनाव आयोग भी पहले से कहीं अधिक सक्रिय हो गया है. मायावती के लगवाए पार्कों में और चौराहों पर हाथियों को ढकने का आदेश इसी सक्रियता का संकेत है लेकिन ऐसे आदेश चुनावों के विकृत होते चरित्र को बदलने वाले नहीं. चुनाव होते रहेंगे और यह शिकायतें आतीं रहेगी कि हमारी चुनाव-व्यवस्था कुछ निहित स्वार्थों के लिए ही उपयोगी बन गई है.

इसमें आम मतदाता की आवाज अक्सर नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जाती है. यह शिकायत भी हर चुनाव से पहले और बाद में होती है कि हमारी निर्वाचन प्रणाली सही मायने में अल्पमत को ही न केवल सिरे से ही खारिज कर देती है अपितु बहुमत का शासन भी स्थापित नहीं करती. इसलिए कुछ विषेशज्ञों के अनुसार भारत की चुनाव प्रणाली के ही कारण खंडित जानदेश आते रहें हैं और आम जनता में आक्रोश पनपता जा रहा है. जनप्रतिनिधियों और आम जनता में बढ़ती खाई में भी इसकी भूमिका देखी जा सकती है.

ऐसा नहीं है कि समय-समय पर चुनाव प्रणाली में सुधारों की वकालत नहीं की गई. विभिन्न चुनाव आयोगों ने कई तरह के सुधारों का सुझाव दिया जिनमें से कुछ पर अमल भी किया गया. कानून मंत्रालय ने भी इसके लिए समितियों का गठन किया लेकिन इनका असर केवल चुनाव आयोजित करने और उम्मीदवारों के आचरण सम्बधी मामलों पर ही पड़ा है. मौलिक प्रश्नों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है लेकिन अब तक सरकार सार्थक कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और न ही बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने पर्याप्त रुचि दिखाई है. शायद यही मुख्य कारण हो कि इस प्रणाली में किसी बड़े बदलाव का जोखिम सत्तारूढ़ दल नहीं उठाते.

चुनाव प्रणाली में अब तक दो प्रकार के सुधार हुए हैं. एक चुनाव खर्चे के बारे में और दूसरा प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों के आचरण के बारे में. इन सुधारों के बाद भी समस्याएं पूरी तरह नहीं सुलझ पाईं हैं. चुनाव लड़ने के लिए आरम्भ में उम्मीदवारों के लिए व्यय की जो सीमाएं तय की गई थीं, वे इतनी अव्यावहारिक थीं कि उनका पालन करते हुए कोई भी उम्मीदवार, विशेष रूप से लोकसभा उम्मीदवार चुनाव लड़ ही नहीं सकता था. इन्हें तर्कसंगत बनाना आवश्यक था. फिर भी धनबल की भूमिका समाप्त नहीं हुई है. बहुत समय से यह सुझाव दिया जाता रहा है कि चुनाव खच्रे का सरकार वहन करे. उम्मीद की जाती है कि इससे पैसे का बेजा इस्तेमाल रोका जा सकेगा. वर्तमान मुख्य चुनाव अधिकारी इससे सहमत नहीं हैं.

उन की असहमति के पीछे एक वाजिब तर्क है. इस बात का आासन कौन दे सकेगा कि सरकार खर्च के बारे में भेदभाव नहीं करेगी. आर्थिक घोटालों के इस दौर में सरकारी एजेंसियों पर सही आवंटन का भरोसा करना मुश्किल ही है. पिछले चुनाव आयोग ने चुनावों में उम्मीदवारों की भरमार रोकने के लिए जमानत राशि बढ़ाकर लोकसभा और विधान सभा चुनाव के लिए बीस हजार और दस हजार रखने की सिफारिश की थी.

इससे उम्मीदवारों की संख्या कम अवश्य हो जाएगी, लेकिन यह कदम निर्धन उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर रखने का बड़ा कारण बन सकता है. लोकतंत्र में आम जन की भागीदारी का लक्ष्य इससे तो नहीं प्राप्त हो सकता है लेकिन ये सारे सुधार हो जाने पर भी यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि क्या हमारी चुनाव प्रणाली संसदीय लोकतंत्र और जनप्रतिनिधित्व के लक्ष्यों को पूरा करने की क्षमता रखती है?

जिस पैमाने पर हमारी राजनीति खंडित अवस्था में है उससे खंडित जनादेश ही आ सकता है. राजनीतिक, आर्थिक विचारधाराओं के हृास का युग तो तभी से आरम्भ हुआ था जब आया राम गया राम की प्रथा चल पड़ी. दलबदल राजनीति के खेल में बीच मैदान में पाला बदलने का रोग है.

इसे रोकने के लिए जो कानून बना, उसे तब तक का सब से बड़ा चुनाव सुधार कहा गया था लेकिन जैसा पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह ने अपनी एक रपट में कहा है कि दलबदल कानून आज भी अस्पष्ट है. इसके कारण आज भी दलबदल को नहीं रोका जा सका है. समूह में पाला बदलना आम बात हो गई है. यानी अगर आप अपने गिरोह को लेकर पाला बदलते हैं तो कोई आपत्ति नहीं है.

सदन के अध्यक्षों की इस सिलसिले में महवपूर्ण भूमिका होती है. तो क्या चुनाव आयोग को ही यह अधिकार दिया जाए कि दलबदल के बारे में सही या गलत का निणर्य करे? चुनाव आयोग को यह अधिकार देना विधायिका को शायद ही स्वीकार हो. अपनी राजनैतिक विचारधार को निजी हितों, धन या पद के लोभ में बदलने का रोग विकासशील देशों में राजनीतिक अनश्चिय का बहुत बड़ा कारण रहा है. भारतीय उपमहाद्वीप में लोकतंत्र को कमजोर करने का भी यह कारण बन गया है. मतदाता को ही यह विास नहीं होता कि उनका उम्मीदवार उसी दल में रहेगा जिसके मंच से वह वोट मांग रहा है.

स्वाभविक है कि मतदाता भी अपने मत का वैसा इस्तेमाल नहीं करता जैसा करना चाहिए. पिछले एक चुनाव के दौरान पाकिस्तान के एक गांव में मतदाताओं ने अपने उम्मीदवार से कहा कि वोट वे तब देंगे जब हर मतदाता को एक निश्चित राशि मिलेगी. मतदाताओं की दलील थी कि जीत कर विधायक अपना वोट पैसे या पद के लिए बेचेगा तो हम से मुफ्त में क्यों ले जाएगा?
सामान्य रूप से हमारे देश में पचास प्रतिशत तक मतदान होता है.

अगर उम्मीदवारों की संख्या अधिक हो तो जीतने वाले को बीस पचीस प्रतिशत मत मिल जाएंगे. यानी वह उस क्षेत्र के कुल मतदाताओं के बारह तेरह प्रतिशत मतदाताओं का प्रतिनिधि है. अनुमान लगाया जा सकता है कि हम जिसे बहुमत कहते हैं वह कुल मतदाताओं के अल्पमत का ही शासन होता है. बहुमत तो बाहर होता है जो क्षुब्ध और कुंठित रहता है और अपना आक्रोश कई हिंसक तरीकों से व्यक्त करता रहता है.

क्या अब समय आ गया है कि हमें अपने चुनावों को अधिक प्रतिनिधि चरित्र देने के लिए तैयार रहना चाहिए? इस सिलसिले में कई प्रकार के सुझाव दिए गए हैं लेकिन मौलिक स्वरूप को बदलते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उपचार ही नया रोग न बन जाए. उदाहरण के रूप में एक सुझाव यह है कि चुनाव उम्मीदवारों के नाम पर नहीं, केवल पार्टियों के नाम पर कराया जाना चाहिए. इसे लिस्ट प्रणाली कहा जाता है. राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणाओं के आधार पर चुनाव लड़ें और चुनाव के बाद प्राप्त मत प्रतिशत के आधार पर अपने सांसदों या विधायकों को मनोनीत करें.

इसे प्रतिनिधियों की गुणवत्ता बढ़ाने का साधन माना जाता है. साथ ही इससे अल्पसंख्यक वगोर्ं को भी अपने कुछ प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलेगा जो आज नहीं चुन सकते. लेकिन इससे मतदाता को अपने उम्मीदवार को जांचने-परखने का मौका ही नहीं मिलेगा और दलों की मनमानी पर ही निर्भर रहना होगा. प्रतिनिधि और मतदाता एक-दूसरे के लिए पूरी तरह अजनबी बन जाएंगे लेकिन सानुपातिक निर्वाचन सबसे तर्क संगत और हमारे देश के लिए सब से उपयोगी सुझाव है.

लिंगदेाह ने भी अपनी रपट में जीतने के लिए पचास प्रतिशत मतों की शर्त लगाने की वकालत की थी. उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए पचास प्रतिशत और एक मत प्राप्त करना होगा. कई चक्रों के इस चुनाव में जब तक कोई उम्मीदवार पचास प्रतिशत का आंकड़ा पार नहीं करता, तब तक उसे विजेता घोषित नहीं किया जाएगा. बड़े दलों में अपनी घोषित विचार धाराओं से अलगाव, आरक्षण के नाम पर खंचों में बांटने की प्रवृत्ति और अल्पमत वाले वर्गों के प्रति उदासीनता हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आई है जहां से सही दिशा तय करना आवश्यक है.


 

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