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अब बोलें क्या कहते हैं, भगवा पार्टी को गुजरे जमाने की पार्टी बताने वाले. यूपी में दूर-दूर तक गद्दी तक पहुंचने के कोई आसार नहीं हैं, फिर भी भाइयों ने बड़ी दरियादिली से चुनाव में पब्लिक से लैपटॉप से लेकर टैबलेट तक, हर तरह के चलते-फिरते कंप्यूटर देने का वादा किया है. वह भी मामूली कीमत पर. वैसे इस चुनाव में कंप्यूटर का वादा करने वाले और भी हैं. पर उनके वादे में ऐसी बात कहां? क्या उन्होंने भी कम्प्यूटर को राम मंदिर के आगे न सही, उसकी बगल में जरूर रखा है. खैर! कम्प्यूटर के मामले में अगर साइकिल निशान वालों ने भगवा भाइयों का आइडिया चुरा भी लिया तो क्या हुआ? भगवा भाइयों ने अपने चुनाव घोषणापत्र में पब्लिक से ऐसे और भी कई वादे किए हैं, जिनके पीछे आइडिया एकदम ऑरीजिनल होने की गारंटी है. उनका हरेक गरीब को एक गाय देने का वादा है. सुनते हैं छत्तीसगढ़ में भगवा भाई इससे पहले एक बार ऐसा ही वादा कर चुके थे. पर यह तो घर के घर में आइडिया उधार लेने का मामला हुआ. यानी कंप्यूटर देने के वादे की तरह, इस गाय के मामले में तो वैसा भी कोई कम्पटीशन नहीं है. गाय चिंतन यूपी में भले ही गरीबों को फिलहाल गाय दिलाने के वादे तक ही पहुंचा हो पर आगे मंजिलें और भी हैं. उत्तरांचल में भगवा भाइयों ने गाय के गोबर तथा गोमूत्र से दंत मंजन से लेकर दवाएं तक बनाने के जरिए, राज्य और जनता, दोनों की तरक्की का रास्ता दिखाया है. गाय से शुरुआत हो गयी है. गोबर और गोमूत्र अर्थव्यवस्था तक जाने से अब कोई नहीं रोक सकता है. बस जरा राज मिल जाए! खैर! इससे कोई यह न समझे कि गोबर और गोमूत्र के रास्ते ही सही, भगवा भाइयों की यूपी की पब्लिक की भौतिक खुशहाली में ही दिलचस्पी है. बात इससे उल्टी है. आत्मा की भूख मिटाने के जुगाड़ करने में ही तो उनका असली स्पेशलाइजेशन है. इस आध्यात्मिक देश में आत्मा की भूख मिटाने के मामले में एकदम ऑरीजिनल आइडिया का दावा तो शायद ही कोई कर सकता है. फिर भी भगवा भाइयों ने इस मामले में भी कुछ तो एकदम नया सोचकर दिखाया है- मथुरा-वृंदावन में ‘आध्यात्मिक डिज्नीलैंड’ बनाएंगे! भगवा भाइयों के विरोधियों को भी इस आइडिया की मौलिकता का ही नहीं, घनघोर आधुनिकता का भी कायल होना पड़ेगा. वर्ना सिर्फ और सिर्फ एक उदाहरण दे दें कि इससे पहले किसी ने भी, भारत में ही नहीं, दुनिया भर में कहीं भी, ‘आध्यात्मिक डिज्नीलैंड’ बनाने का वादा किया हो. आध्यात्मिक डिज्नीलैंड बोले तो एकदम थ्री इन वन. अध्यात्म का अध्यात्म, मनोरंजन का मनोरंजन और कारोबार का कारोबार. अब आध्यात्मिक हुआ तो क्या हुआ, आखिरकार वादा तो डिज्नीलैंड, जी हां डिज्नीलैंड बनाने का ही है. कोई तीर्थ नहीं, कोई मंदिर नहीं, कोई नगर-वगर भी नहीं, सिर्फ और सिर्फ डिज्नीलैंड. जब कोई रोजगार दिलाने के वादों में अटका पड़ा है, तो कोई आरक्षण दिलाने के वादे में और कोई किसानों-विसानों की हालत सुधारने की बातों में, डिज्नीलैंड बनाने का वादा करने से ज्यादा आधुनिक भला और क्या हो सकता है? भगवा भाइयों का वादा है तो जाहिर है, आध्यात्मिक डिज्नीलैंड बनेगा तो निजी क्षेत्र में ही. बहुत हुआ तो मामला पीपीपी यानी निजी-सार्वजनिक साझेदारी तक जा सकता है; फिर भी कमान तो निजी क्षेत्र के ही हाथों में रहेगी. यानी अध्यात्म भी और आर्थिक नीति का खुलापन भी. आध्यात्मवाले भी खुश और उदारीकरण वाले भी खुश. अपनी जड़ों पर जमे रहने और आधुनिकता का ऐसा उत्तम संगम और कहां मिलेगा? पता नहीं क्यों इसके बाद भी भगवा भाइयों पर न आध्यात्मिकतावाले भरोसा करने को तैयार हैं और न आधुनिकतावाले? रही पब्लिक, सो वह तो इस बार एकदम गुम्माटा मारे बैठी है. न जाने उसके मन में क्या है! यूपीवालों, इस अनोखे संगम की लाज अब तुम्हारे ही हाथ है. तुम्हें गंगा की सौंह, तीसरी सीढ़ी से नीचे मत खिसकाना.
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